देखिए वीडियो: लगातार 60 घंटे उतरे दो देशों के सैन्य परिवहन विमान; क्या कुछ बड़ा करने की फिराक में है पड़ोसी, बढ़ी हलचल
KHULASA FIRST
संवाददाता
खुलासा फर्स्ट, नई दिल्ली।
पाकिस्तान और तुर्किये के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग ने क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। 7 अगस्त को सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने मक्का में जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए थे।
समझौते के मुताबिक तीनों देश सामूहिक सुरक्षा और रक्षा सहयोग को मजबूत करेंगे तथा किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमला होने की स्थिति को तीनों के खिलाफ हमला माना जाएगा।
हालांकि तुर्किये और पाकिस्तान दोनों ने स्पष्ट किया है कि यह समझौता किसी खास देश को निशाना बनाकर नहीं किया गया है।
इसी बीच पाकिस्तान में तुर्किये के सैन्य परिवहन विमानों की आवाजाही को लेकर दावे सामने आए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक 19 से 21 अगस्त के बीच करीब 60 घंटे के दौरान तुर्किये के कई सैन्य विमान पाकिस्तान के अलग-अलग एयरबेस पर पहुंचे। इनमें C-130 और A400M जैसे सैन्य परिवहन विमान शामिल बताए गए हैं। इसके अलावा चीनी विमानों की आवाजाही का दावा भी किया गया है।
पाकिस्तानी एयरबेस पर सैन्य विमानों की आवाजाही
रिपोर्टों के अनुसार रावलपिंडी के नूरखान और कराची के मसरूर एयरबेस पर तुर्किये के C-130 विमानों की आवाजाही देखी गई। वहीं एक A400M विमान के मुरीद एयरबेस पहुंचने की भी जानकारी सामने आई है।
इन उड़ानों के जरिए पाकिस्तान को सैन्य उपकरण या ड्रोन पहुंचाए जाने के दावे किए जा रहे हैं। हालांकि इन विमानों में वास्तव में क्या सामग्री लाई गई, इसकी स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
इसलिए ड्रोन की किसी खास खेप, उसकी संख्या या उसे किसी विशेष सैन्य स्टोरेज सुविधा में रखे जाने के दावे को फिलहाल पुष्ट तथ्य के बजाय रिपोर्ट के तौर पर देखना जरूरी है।
तुर्किये के ड्रोन पाकिस्तान की सैन्य क्षमता का हिस्सा
तुर्किये दुनिया के प्रमुख ड्रोन निर्माताओं में शामिल है और पाकिस्तान के साथ उसके रक्षा संबंध पहले से हैं। तुर्किये के Bayraktar TB2 व Akıncı जैसे ड्रोन आधुनिक युद्ध में निगरानी व हमले की क्षमताओं के लिए जाने जाते हैं।
पाकिस्तान और तुर्किये के बीच रक्षा सहयोग में ड्रोन तकनीक के अलावा विमान और अन्य सैन्य उपकरण भी शामिल रहे हैं। हालांकि मौजूदा दावों में बताए गए ड्रोन की संख्या और हालिया डिलीवरी का पूरा विवरण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है।
मक्का समझौते के बाद बढ़ा रणनीतिक महत्व
7 अगस्त को मक्का में सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान ने संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए। आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार इसका उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा और रक्षा सहयोग को मजबूत करना है। समझौते में किसी एक सदस्य पर सशस्त्र हमले को तीनों देशों पर हमला माना गया है।
इसी प्रावधान के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी तुलना NATO के सामूहिक रक्षा सिद्धांत से की जा रही है। हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार इसे NATO का सीधा विकल्प मानना सही नहीं होगा, क्योंकि इस समझौते में NATO जैसी संयुक्त कमान और व्यापक संस्थागत ढांचा नहीं है।
तुर्किये-पाकिस्तान की सैन्य साझेदारी पुरानी
मक्का समझौता दोनों देशों के लिए रक्षा सहयोग का नया आधार जरूर बनाता है, लेकिन तुर्किये और पाकिस्तान के सैन्य संबंध पहले से मजबूत हैं। दोनों देश रक्षा उत्पादन, सैन्य प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग के क्षेत्र में साथ काम करते रहे हैं।
तुर्किये के रक्षा उद्योग की बढ़ती क्षमता पाकिस्तान के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि पाकिस्तान के पास लंबा सैन्य अनुभव और बड़ा रक्षा ढांचा है। ऐसे में दोनों देशों का सहयोग ड्रोन, विमान और अन्य रक्षा प्रणालियों तक आगे बढ़ने की संभावना रखता है।
बलूचिस्तान में सुरक्षा चुनौती भी बड़ी वजह
पाकिस्तान के सामने आंतरिक सुरक्षा की चुनौती भी बनी हुई है। बलूचिस्तान में बलूच विद्रोही संगठनों और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच लंबे समय से संघर्ष चल रहा है। ऐसे में पाकिस्तान के लिए निगरानी ड्रोन और अन्य आधुनिक सैन्य तकनीक की उपयोगिता बढ़ जाती है।
हालांकि बलूचिस्तान के बड़े हिस्से पर किसी विद्रोही संगठन के 70 प्रतिशत नियंत्रण जैसे दावों को स्वतंत्र स्रोतों से पुष्ट किए बिना तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति गंभीर है, लेकिन सरकारी नियंत्रण के इतने बड़े हिस्से के खत्म होने का दावा अलग से सत्यापन मांगता है।
आर्थिक दबाव के बीच बढ़ रहा रक्षा खर्च
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर कर्ज और महंगाई का दबाव बना हुआ है। IMF के मई 2026 के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2026 में औसत उपभोक्ता महंगाई 7.2 प्रतिशत रहने का अनुमान था, जबकि सामान्य सरकारी कर्ज GDP के करीब 67.5 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था।
इसके बावजूद पाकिस्तान का सैन्य खर्च बढ़ा है। SIPRI के अनुसार 2025 में पाकिस्तान का सैन्य खर्च 11.9 अरब डॉलर रहा, जो 2024 की तुलना में 11 प्रतिशत अधिक था।
अब निगाहें तुर्किये से होने वाले रक्षा सहयोग पर
मक्का समझौते और पाकिस्तान-तुर्किये के पुराने सैन्य संबंधों के बीच हालिया सैन्य विमान गतिविधियों ने रक्षा क्षेत्र में नई अटकलों को जन्म दिया है।
यदि ड्रोन और अन्य सैन्य उपकरणों की नई खेप की पुष्टि होती है, तो इससे पाकिस्तान की निगरानी और सैन्य क्षमताओं में इजाफा हो सकता है।
फिलहाल सबसे अहम सवाल यही है कि 19 से 21 अगस्त के बीच पाकिस्तान पहुंचे तुर्किये के सैन्य विमानों में वास्तव में क्या सामग्री थी, कितनी मात्रा में रक्षा उपकरण पहुंचे और क्या यह किसी नए रक्षा समझौते या मौजूदा सैन्य सहयोग का हिस्सा था। इन सवालों का स्पष्ट जवाब आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद ही मिल सकेगा।
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