भीषण बस अग्निकांड के बाद परिवहन व्यवस्था कटघरे में: 25 वर्षों से संचालित स्लीपर कोच के पंजीयन; निर्माण व संचालन पर उठे गंभीर सवाल, केंद्रीय मंत्री से मांगा जवाब
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
राजस्थान के दौसा में स्लीपर कोच बस में लगी भीषण आग में आठ लोगों की मौत ने एक बार फिर देश की परिवहन व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। लगातार सामने आ रही बस अग्निकांड की घटनाओं ने केवल सुरक्षा व्यवस्था ही नहीं, बल्कि स्लीपर कोच बसों के निर्माण, पंजीयन, परमिट, फिटनेस और कथित राजस्व अनियमितताओं पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
इसी क्रम में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी से 25 वर्षों से संचालित स्लीपर कोच बसों की वैधानिक स्थिति, पुराने पंजीयनों की वैधता और कथित वित्तीय अनियमितताओं पर जवाब मांगा गया है।
पत्र में दावा किया गया है कि वर्षों से विभागीय स्तर पर नियमों की अनदेखी होती रही, जिससे यात्रियों की सुरक्षा और सरकारी राजस्व दोनों प्रभावित हुए।
पत्र में केंद्रीय मंत्री से पूछा गया
बस बॉडी कोड लागू होने से पहले स्लीपर कोच बसों का संचालन आखिर किस कानून, नियम या अधिसूचना के तहत हो रहा था?
स्लीपर बस बॉडी निर्माण का मूल कानूनी आधार क्या था और वह कब लागू किया गया?
नया बस बॉडी कोड लागू होने के बाद क्या पुराने मानकों वाली स्लीपर बसों का संचालन समाप्त किया जाएगा?
भविष्य में पंजीयन की व्यवस्था क्या होगी और निजी बॉडी बिल्डरों की भूमिका क्या रहेगी?
2009 की ऑडिट रिपोर्ट फिर चर्चा में... पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि मध्य प्रदेश के महालेखाकार ने वर्ष 2009 में स्लीपर बसों से जुड़ी कर एवं राजस्व संबंधी गंभीर अनियमितताओं पर आपत्ति जताई थी।
आरोप लगाया गया है कि यदि उस समय प्रभावी कार्रवाई होती तो सरकारी राजस्व की बड़ी वसूली संभव थी। अब यह मांग उठाई जा रही है कि उस अवधि में हुई संभावित राजस्व हानि की स्वतंत्र जांच कर जिम्मेदारी तय की जाए।
स्टेट के आदेशों के बाद भी जारी रहे परमिट... पत्र में दावा किया गया है कि वर्ष 2010 के बाद भी आपत्तियां दर्ज होने और स्टेट ट्रांसपोर्ट अपीलेट ट्रिब्यूनल (स्टेट) द्वारा कुछ मामलों में परमिट निरस्त करने के आदेश दिए जाने के बावजूद वर्ष 2025 तक स्लीपर बसों के परमिट जारी होते रहे। यदि यह तथ्य सही हैं, तो यह सवाल उठता है कि संबंधित आदेशों के बाद भी अनुमति किस आधार पर दी गई और जवाबदेही किसकी बनती है?
खुलासा फर्स्ट ने पहले भी उठाए थे सवाल
खुलासा फर्स्ट में प्रकाशित रिपोर्टों में स्लीपर कोच बसों के निर्माण, पंजीयन, परमिट और कर व्यवस्था को लेकर विस्तृत सवाल उठाए गए थे। रिपोर्ट में यह मुद्दा प्रमुखता से रखा गया था कि यदि मोटर वाहन कानून में स्लीपर बस की अलग श्रेणी स्पष्ट नहीं है, तो हजारों बसों का संचालन किस वैधानिक व्यवस्था के तहत किया जा रहा है? दौसा हादसे के बाद वही सवाल फिर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गए हैं।
लगातार आग की घटनाएं बढ़ा रहीं चिंता
दौसा अग्निकांड से पहले ग्वालियर-इंदौर मार्ग पर चल रही एक स्लीपर बस में भी आग लगी थी। वहीं आईपीएल फाइनल के बाद गुजरात टाइटंस टीम की बस में आग लगने की घटना ने भी बस सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई।
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार पिछले तीन वर्षों में देशभर में बसों में आग लगने की 45 घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 64 लोगों की मृत्यु हुई और 145 लोग घायल हुए।
अब जवाबदेही तय होना बेहद जरूरी
हर बड़े हादसे के बाद मुआवजे की घोषणा होती है, लेकिन यदि निर्माण, पंजीयन, फिटनेस, अग्नि सुरक्षा और निरीक्षण व्यवस्था में कहीं चूक हुई है, तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि यात्रियों की सुरक्षा केवल नए नियम बनाने से नहीं, बल्कि पुराने पंजीयनों, फिटनेस प्रमाण-पत्रों और निर्माण प्रक्रिया की निष्पक्ष समीक्षा से सुनिश्चित होगी।
केंद्र सरकार के जवाब पर नजर...
दौसा अग्निकांड ने केवल आठ लोगों की जान नहीं ली, बल्कि परिवहन व्यवस्था की पारदर्शिता, जवाबदेही और सुरक्षा मानकों पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। अब देखना यह है कि केंद्र सरकार स्लीपर कोच बसों की वैधानिक स्थिति, पुराने पंजीयनों, ऑडिट रिपोर्ट में उठाई गई आपत्तियों और यात्रियों की सुरक्षा से जुड़े इन सवालों पर क्या आधिकारिक जवाब देती है।
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