ट्रांसफर की फाइलें घूमती रहीं लेकिन सब इंजीनियर नहीं हिले: एक साल में आधा दर्जन आदेश; हर बार हाईकोर्ट से राहत
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नगरीय प्रशासन विभाग पिछले एक साल से इंदौर नगर निगम के कुछ सब इंजीनियरों को बाहर भेजने की कवायद में जुटा है, लेकिन अब तक उसे सफलता नहीं मिल सकी है। ट्रांसफर, संशोधन, रिलीविंग, ट्रांसफर निरस्तीकरण और नए तबादला आदेशों सहित आधा दर्जन से ज्यादा प्रशासनिक आदेश जारी होने के बावजूद संबंधित अधिकारी अब भी अपनी पुरानी जगहों पर जमे हुए हैं।
दिलचस्प बात यह है कि यह पूरा विभाग प्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के अधीन आता है और मामला लगातार सरकार की किरकिरी का कारण बन रहा है। साल 2025 में कई शिकायतों के बाद कुछ सब इंजीनियरों के तबादले किए गए थे।
इसके बाद आदेशों में संशोधन हुए, अधिकारियों को रिलीव भी किया गया, लेकिन संबंधित कर्मचारी हाईकोर्ट पहुंच गए और स्थगन आदेश (स्टे) हासिल कर लिया। नतीजा यह रहा कि पूरा मामला महीनों तक अदालत में अटका रहा।लंबे समय तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद विभाग ने मई 2026 में पुराने तबादला आदेश ही निरस्त कर दिए।
इसके बाद 15 जून 2026 को नए सिरे से तबादला आदेश जारी किए गए। हालांकि इस बार भी मामला आगे नहीं बढ़ सका। आरोप है कि नगर निगम प्रशासन समय पर संबंधित अधिकारियों को रिलीव नहीं कर पाया और इसी बीच प्रभावित अधिकारी फिर हाईकोर्ट पहुंच गए, जहां से उन्हें राहत मिल गई।
पूरे घटनाक्रम में सब इंजीनियर शैलेंद्र मिश्रा का मामला सबसे ज्यादा चर्चा में है। उनका पहला तबादला 12 जून 2025 को इंदौर से सिंगरौली किया गया था। कुछ ही दिनों बाद 17 जून 2025 को आदेश में संशोधन कर उन्हें खंडवा भेज दिया गया।
18 जून की रात तत्कालीन निगमायुक्त ने उन्हें रिलीव भी कर दिया, लेकिन मिश्रा हाईकोर्ट पहुंच गए और स्थगन आदेश ले आए।करीब एक साल तक मामला लंबित रहने के बाद 27 मई 2026 को खंडवा तबादला आदेश निरस्त कर दिया गया।
इसके बाद 15 जून 2026 को जारी नए आदेश में उन्हें दो वर्ष की प्रतिनियुक्ति पर रतलाम नगर निगम भेजने का निर्णय लिया गया। आदेश में उल्लेख किया गया कि वे वर्ष 2016 से इंदौर में पदस्थ हैं और प्रशासनिक आवश्यकता को देखते हुए उनकी सेवाओं की जरूरत रतलाम में है। हालांकि, इस बार भी उन्हें समय पर रिलीव नहीं किया गया और 18 जून को वे पुनः हाईकोर्ट से स्थगन आदेश लेने में सफल रहे।
हाईकोर्ट में दुर्भावना का आरोप
याचिका में शैलेंद्र मिश्रा ने दावा किया कि उनका तबादला प्रशासनिक आवश्यकता नहीं बल्कि दुर्भावना और प्रतिशोध की भावना से किया जा रहा है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि नगर निगम में पहले से ही सब इंजीनियरों की कमी है और उनकी जगह किसी अन्य अधिकारी की पदस्थापना भी नहीं की गई है। ऐसे में तबादला आदेश उचित नहीं माना जा सकता।
एमआईसी बैठक में भी उठा मामला
उधर, नगर निगम की एमआईसी बैठक में भी यह मुद्दा गूंजा। कुछ एमआईसी सदस्यों ने निगम प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए टिप्पणी की कि यदि समय पर रिलीविंग की कार्रवाई की जाती तो बार-बार स्थगन आदेश की स्थिति नहीं बनती। सदस्यों ने यह भी कहा कि संबंधित अधिकारी लगातार शासन के निर्णयों को चुनौती दे रहे हैं और तबादला आदेशों के बावजूद वर्षों से एक ही स्थान पर बने हुए हैं।
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