आज माई रथ बैठे गिरधारी: आज इंदौर में सब तरफ गूंजेगा- व्यंकट रमणा गोविंदा, गोविंदा-गोविंदा
KHULASA FIRST
संवाददाता

श्री ठाकुरजी भक्त के देहरूपी रथ में विराजकर सकल मनोरथ करते हैं पूर्ण
रथ पर आरूढ़ हो प्रभु अपने भक्तों को दर्शन दे तीनों तापों का करेंगे हरण, जगन्नाथपुरी से लेकर अहिल्यानगरी तक पसरा रथयात्रा उत्सव का उल्लास
आज माई रथ बैठे गिरधारी वाम भाग वृषभानु नंदिनी, पहरे कुसुंभी सारी..!
तैसोइ घन उनयो चहुंदिश ते,गरजत है अति भारी तैसेइ दादुर मोर करत रट, तैसी भूमि हरियारी..!
शीतल मंद बहैत मलयानिल लागत है अति सुखकारी, नंदनंदन की या छवि ऊपर गोविंद जन बलिहारी..!
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
अहिल्यानगरी की सड़कों पर आज पुरी-सा नजारा होगा। व्यंकट रमणा गोविंदा के जयघोष के साथ रथोत्सव जो आ गया है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया का वो पावन दिन, जिस घड़ी भक्तवत्सल भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों को दर्शन व शुभाशीर्वाद देने स्वयं सड़क पर आ जाते हैं।
मध्य शहर में आज शाम वो ही दृश्य होगा, जो हजारों मील दूर ओडिशा प्रांत के पुरी शहर में रहेगा। इस नयनाभिराम नजारे की साक्षी बनेगी छत्रीबाग स्थित प्राचीन व्यंकटेश देवस्थानम की रथयात्रा। स्वामी विष्णु प्रपन्नाचार्यजी महाराज के पावन सान्निध्य में निकलने वाली इस रथयात्रा में अनेक नयनाभिराम झांकियां भी रहेंगी। रथोत्सव का मनोरथ इस्कॉन संस्था भी पूर्ण करेगी। इस्कॉन की रथयात्रा में प्रभु के लिए हूबहू जगन्नाथपुरी-सा रथ बनाया गया है।
51 फीट ऊंचे इस रथ में ठाकुरजी विराजेंगे। प्राचीन श्री गोवर्धननाथ मंदिर में रथयात्रा उत्सव के बाद से सेवा विधि में ऋतु परिवर्तन भी हो जाएगा। आज से पावस ऋतु का विधिवत आगाज भी हो जाता है। प्रभु गोवर्धननाथजी को राग मल्हार सुनाया जाएगा।
यह राग वर्षा से जुड़ा है और मान्यता है कि रथयात्रा वाले दिवस से ही ठाकुरजी भगवान इंद्र को वर्षा की आज्ञा करते हैं। आप सभी को रथयात्रा उत्सव की मंगलमय बधाई। प्रभु हमारे देहरूपी रथ में सदा विराजमान रहें, ये मंगल कामना भी।
र थ पर सवार हो गए भक्त वत्सल गिरधारी। उनके वाम भाग, यानी बायीं ओर वृषभानु नंदिनी विराज रही हैं। वृषभानु सुता ने कुसुंभी रंग, यानी सुर्ख लाल रंग की साड़ी पहन रखी है। ठीक उसी समय आसमान में मेघ घनाभूत हो गए हैं।
सब तरफ घटाटोप छा गया है। इधर घन गरज रहे हैं, उधर दादुर, मोर का शोर मचा हुआ है। भूमि भी हरियाली हुई-सी है। शीतल मंद बयार चल रही है, जो मलयानिल है। यानी सुदूर दक्षिण भारत में विराजमान मलयाचल पर्वत की तरफ से आ रही ये शीतल बयार तन-मन को सुखकारी लग रही है। नंदनंदन की रथ पर विराजमान इस छवि पर गोविंद दास सहित कोटि जन-जन बलिहारी जा रहे हैं।
ये कीर्तन उन अष्टसखा कवियों में से एक गोविंददासजी का है, जिन पर जगन्नाथ प्रभु, यानी ठाकुरजी की असीम अनुकंपा थी। अष्टसखा कवि को प्रभु ने अपनी वो लीला का दर्शन करवाया है, जो रथोत्सव के रूप में की गई थी।
कवि ने प्रभु कृपा से उस लीला का साक्षात्कार कलियुग में कर लिया, जो हजारों साल पहले द्वापरयुग में हुई थी। ये ही कृष्ण लीला है, कृष्ण कृपा है, जो श्रीमद् जगतगुरु श्रीवल्लभाचार्य की कृपा बिन असंभव है। रथयात्रा के साथ आज से विधिवत ऋतु परिवर्तन भी हो जाता है। आज सभी वैष्णव मंदिरों में ठाकुरजी रथ पर आरूढ़ होंगे।
प्राचीन श्री गोवर्धननाथ मंदिर में रथयात्रा का मनोरथ उत्सव एक दिन पूर्व ही हो गया। पुष्टिमार्ग में ये उत्सव नक्षत्र प्रधान है। लिहाजा बुधवार को ही मंदिर में रथयात्रा के चार दर्शन हुए। यहां प्रभु की रथयात्रा मंदिर के गर्भगृह में ही संपन्न होती है।
सायंकाल में एक सदी पुरानी अश्व जोड़ी से सुसज्जित रथ में प्रभु विराजते हैं। अश्व जोड़ी को चांदी के अनेक आभूषणों से सुसज्जित किया जाता है। भव्य व बड़ी रथयात्रा का मनोरथ प्राचीन व्यंकटेश देवस्थानम, छत्रीबाग में मनाया जाएगा।
अहिल्यानगरी को रथयात्रा से साक्षात्कार व्यंकटेश देवस्थान से ही हुआ है। 78 साल से ये यात्रा निर्बाध गतिमान है। आज शाम 5 बजे ये रथयात्रा मंदिर प्रांगण से शुरू होगी और फिर नगर भ्रमण करेगी। रथयात्रा को लेकर मंदिर में 7 दिन से विशेष तैयारी चल रही थी। इसमें 7 दिवसीय ब्रह्मोत्सव के साथ अद्भुत कलाकारी का पुष्प बंगला मनोरथ भी शामिल है।
ऐसी ही शोभायात्रा गुमास्ता नगर स्थित व्यंकटेश मंदिर से भी निकलेगी, लेकिन वह मंदिर परिसर में ही भ्रमण करेगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर तक कृष्णम वंदे जगद्गुरु का जयघोष गुंजायमान करने वाली संस्था इस्कॉन की रथयात्रा भी नगर भ्रमण करेगी।
यशवंतगंज गौराकुंड स्थित रामानुज कोट मंदिर में आज 10 दिवसीय आयोजित ब्रह्मा उत्सव में स्वर्णजड़ित आभूषणों से शृंगारित भगवान वेंकटेश की चांदी के रथ पर आरूढ़ होकर राजसी सवारी मंदिर प्रांगण में निकली।
ट्रस्टी पुरुषोत्तम आगेश्वर एवं राजगोपाल मानधन्या ने बताया मंदिर के 140 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर गादीस्थ स्वामीजी श्री रंगाचार्यजी महाराज व स्वामी श्री विजयाचार्यजी महाराज के सान्निध्य में भगवान के मूल एवं उत्सव विग्रहों का पंचामृत से लोकांत अभिषेक किया गया।
ट्रस्टी ओमप्रकाश वोरा ने बताया 1887 में वेंकटेश भगवान के मूल विग्रह की प्रतिष्ठा आषाढ़ माह के पुष्य नक्षत्र में की गई थी। यह जानकारी मंदिर के प्रचार-प्रसार प्रमुख देवेंद्र ईनाणी ने दी।
पुरी में जगन्नाथ देवजु के लिए उमड़ा जनसैलाब
आज पुरी में श्री जगन्नाथ देवजू की रथयात्रा है, जहां ऐसा जनसैलाब उमड़ा कि पांव रखने की जगह नहीं। अलसुबह से यहां इंद्रदेव भी मेहरबान हो गए, जिससे भक्ति का उत्साह दूना हो गया है। पुरी में जहां श्री जगन्नाथजी विराजते हैं, उस मंदिर में चार विग्रह हैं।
एक सुदर्शन, एक श्रीकृष्ण, मध्य में सुभद्रा हैं (कृष्ण-बलराम की बहन) और दूसरी तरफ बलरामजी। कृष्ण, सुभद्रा, बलराम और सुदर्शन इन चारों को जगन्नाथ कहा जाता है। यदि हम यह बोलते हैं कि जगन्नाथजी कृपा करें, इसका भाव है कि ये चारों हम पर कृपा करें।
वैष्णवों का भाव यह रहता है कि आज के दिन ये दोनों भाई और सुभद्रा के रक्षक के रूप में सुदर्शन, चारों ब्रज में जाते हैं ब्रजवासियों से मिलने। गुंडिचा को ब्रज का प्रतीक माना गया है। यहां से यात्रा करके यह ब्रज में जाते हैं, वहां ब्रजवासियों श्री राधा आदि गोपीगण से मिलते हैं।
दस-बारह दिन वहां रहते हैं और वहां से वापस द्वारका अर्थात मुख्य मंदिर में आ जाते हैं। जगन्नाथ मंदिर में हिंदुओं के अतिरिक्त किसी का भी प्रवेश नहीं है और ठाकुरजी का नाम है जगन्नाथ।
यह अपने नाम को सिद्ध करते हुए आज खुली सड़क पर यात्रा में पधारते हैं, जिससे सभी जाति वर्ग के लोग इनका वर्ष में कम से कम एक बार दर्शन करके आनंदित हो सके और उनका जगन्नाथ नाम सार्थक हो सके। पूरी में ये नौ दिनों का उत्सव होता हैं।
रथयात्रा गुंडीचा मंदिर तक जाती है। तीनों देव नौ दिनों तक इसी मंदिर में रहते हैं और फिर मुख्य मंदिर श्री जगन्नाथ मंदिर लौटते हैं।तीनों देवताओं के लिए हर साल लकड़ी के तीन नए और भव्य रथ बनाए जाते हैं।
नंदीघोष: भगवान जगन्नाथ का रथ (16 पहियों का, लाल और पीले रंग में)।
तालध्वज: भगवान बलभद्र का रथ (14 पहियों का, लाल और काले रंग में)।
दर्पदलन: देवी सुभद्रा का रथ (12 पहियों का, लाल और काले/नीले रंग में)।
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