पुलिस की सख्ती के बावजूद बढ़ती सड़क दुर्घटनाएं तब रुकेंगी: जब नियम तोड़ना पाप माना जाएगा
KHULASA FIRST
संवाददाता

राजकुमार जैन स्वतंत्र लेखकखुलासा फर्स्ट, इंदौर।
हर बड़ी सड़क दुर्घटना के बाद देश में एक परिचित बहस शुरू हो जाती है। पुलिस पर सवाल उठते हैं, चालान बढ़ाने की मांग होती है, अधिक कैमरे लगाने और कठोर दंड का सुझाव दिया जाता है।
ऐसा प्रतीत कराया जाता है मानो सड़क सुरक्षा का पूरा दारोमदार केवल पुलिस और दंड व्यवस्था पर हो। किंतु दशकों का अनुभव बताता है कि यह सोच जितनी लोकप्रिय है, उतनी ही अधूरी भी है।
यदि केवल पुलिस की सख्ती से दुर्घटनाएं रुक सकतीं, तो जिन शहरों में सबसे अधिक चालान काटे जाते हैं, वे आज सबसे सुरक्षित शहर होते। लेकिन ऐसा नहीं है। लाखों चालान, करोड़ों रुपये का जुर्माना, आधुनिक कैमरे और लगातार अभियान—इन सबके बावजूद दुर्घटनाएँ चिंता का विषय बनी हुई हैं। इसका अर्थ स्पष्ट है कि समस्या कानून के अनुपालन की नहीं, समाज की चेतना की है।
कानून किसी भी सभ्य समाज की आवश्यकता है, लेकिन उसकी अपनी सीमाएं हैं। कानून व्यक्ति के व्यवहार को बाहर से नियंत्रित करता है; नैतिकता उसे भीतर से संचालित करती है।
पुलिस केवल चौराहे तक पहुँच सकती है, लेकिन अंतःकरण हर समय मनुष्य के साथ चलता है। इसलिए स्थायी अनुशासन भय से नहीं, बल्कि संस्कार से पैदा होता है।
यहीं हमारा सबसे बड़ा सामाजिक भ्रम सामने आता है। हमने यातायात नियमों को कानूनी विषय तो बनाया, लेकिन नैतिक विषय कभी नहीं बनाया। चोरी को पाप कहा गया, हत्या को महापाप कहा गया, छल और हिंसा को सामाजिक रूप से निंदनीय माना गया। इसलिए अधिकांश लोग ऐसे कर्म पुलिस के भय से नहीं, बल्कि अपने संस्कारों के कारण नहीं करते।
लेकिन क्या हमने कभी अपने बच्चों को यह सिखाया कि लाल बत्ती पार करना भी किसी निर्दोष की मृत्यु का कारण बन सकता है? क्या हमने रॉन्ग साइड वाहन चलाने को संभावित हत्या का प्रयास बताया? क्या ओवरस्पीड
को जीवन के प्रति अनादर कहा? उत्तर स्पष्ट है-नहीं।
यही कारण है कि सड़क पर नियम तोड़ने वाला व्यक्ति स्वयं को अपराधी नहीं मानता। उसके भीतर अपराधबोध जन्म ही नहीं लेता। जब उसका चालान होता है तो वह अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय यह मान बैठता है कि उसके साथ जबरन वसूली हुई है। उसके मन में पुलिस कानून की संरक्षक नहीं, बल्कि विरोधी के रूप में स्थापित हो जाती है।
इसके बाद एक खतरनाक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया शुरू होती है। अगली बार यदि वह पुलिस की आँख बचाकर नियम तोड़ देता है, तो उसे लगता है कि उसने व्यवस्था को मात दे दी है।
उसे यह संतोष होता है कि पिछली बार जो चालान भरना पड़ा था, उसका हिसाब बराबर हो गया। वह नियम पालन को मूर्खता और नियम उल्लंघन को चतुराई समझने लगता है। यही मानसिकता दुर्घटनाओं की सबसे बड़ी जननी है।
स्पष्ट है कि पुलिस अपराधी को पकड़ सकती है, लेकिन अपराधबोध पैदा नहीं कर सकती। अपराधबोध केवल संस्कार पैदा करते हैं। इसलिए यदि सड़क सुरक्षा को वास्तव में जन आंदोलन बनाना है, तो उसका आधार दंड नहीं, नैतिकता बनाना होगा।
अब समय आ गया है कि परिवार बच्चों को यह सिखाएँ कि यातायात नियमों का पालन केवल कानूनी बाध्यता नहीं, बल्कि नैतिक कर्तव्य है। विद्यालय सड़क सुरक्षा को केवल यातायात शिक्षा नहीं, चरित्र निर्माण का विषय बनाएँ।
धार्मिक और सामाजिक संस्थाएँ यह संदेश दें कि ऐसा कोई भी आचरण, जिससे किसी निर्दोष का जीवन संकट में पड़े, पाप है। मीडिया भी नियम तोड़ने वालों को 'स्मार्ट' दिखाने के बजाय जिम्मेदार नागरिकों को आदर्श बनाए।
सभ्यता की पहचान पुलिस की संख्या से नहीं, आत्मानुशासन की गहराई से होती है। जहाँ हर नागरिक के भीतर का नैतिक प्रहरी जागृत होता है, वहाँ कानून को बार-बार हस्तक्षेप नहीं करना पड़ता।
सड़क दुर्घटनाओं के विरुद्ध सबसे प्रभावी हथियार न कैमरे हैं, न चालान और न ही डंडा। सबसे प्रभावी शक्ति है, जागृत अंतःकरण।
जिस दिन भारतीय समाज यह स्वीकार कर लेगा कि यातायात नियमों का उल्लंघन केवल कानूनी अपराध नहीं, बल्कि नैतिक पाप भी है, उसी दिन सड़क सुरक्षा का नया अध्याय प्रारंभ होगा।
तब लोग पुलिस से नहीं, अपने विवेक से डरेंगे; और वही भय नहीं, बल्कि नैतिक बोध लाखों जीवन बचाएगा।
दुर्घटनाएँ सड़कों पर नहीं जन्म लेतीं। वे मनुष्य के मन में जन्म लेती हैं। इसलिए उनका स्थायी समाधान भी चौराहों पर नहीं, बल्कि संस्कारों में खोजा जाना चाहिए।
इंदौर में सड़क दुर्घटनाएं एक गंभीर सार्वजनिक चिंता का विषय बन गई हैं, विशेष रूप से शहर के बाहरी इलाकों और प्रमुख चौराहों पर। साल 2026 के पहले 6 महीनों में शहर में 287 लोगों की जान सड़क हादसों में जा चुकी है। अत्यधिक रफ्तार, शराब पीकर गाड़ी चलाना (ड्रंक एंड ड्राइव), गलत दिशा में ड्राइविंग, और सड़क के गड्ढे इन हादसों के प्रमुख कारण हैं। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
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