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15 दिन में देना थी रिपोर्ट: दो साल बाद भी नहीं हो सकी सार्वजनिक; 92 करोड़ का बहुचर्चित फर्जी बिल भुगतान घोटाला

KHULASA FIRST

संवाददाता

04 जून 2026, 5:56 pm
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15 दिन में देना थी रिपोर्ट

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नगर निगम के बहुचर्चित फर्जी बिल भुगतान घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा 92 करोड़ रुपए की वित्तीय गड़बड़ी के संकेत मिलने के बाद मामला एक बार फिर सुर्खियों में है।

गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, अदालत में सुनवाई जारी है, कई कर्मचारी और अधिकारी कार्रवाई की जद में आ चुके हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी अनुत्तरित है कि आखिर इतने बड़े घोटाले की प्रशासनिक जिम्मेदारी किसकी है?

हैरानी की बात यह है कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर भोपाल से गठित उच्च स्तरीय जांच समिति को 15 दिन में रिपोर्ट सौंपना थी, लेकिन दो साल बाद भी वह रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हो सकी। ऐसे में जांच की पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

नगर निगम की आंतरिक जांच में वर्ष 2010 से 2022 तक के 693 बिलों की पड़ताल की गई थी। इनमें 489 बिल फर्जी पाए गए, जबकि केवल 204 बिल ही वैध निकले। यह तथ्य अपने आप में बताता है कि गड़बड़ी किसी एक विभाग या एक कर्मचारी तक सीमित नहीं थी, बल्कि वर्षों तक सिस्टम के भीतर बैठा एक संगठित तंत्र काम कर रहा था।

जांच में फाइल खुलती गई, इधर होता रहा खुलासा
घोटाले की शुरुआत अप्रैल 2024 में पांच एजेंसियों को किए गए करीब 20 करोड़ रुपए के संदिग्ध भुगतान से हुई थी। जैसे-जैसे फाइलें खुलती गईं, जांच 12 साल पीछे पहुंच गई और कथित फर्जी भुगतान का आंकड़ा बढ़ता गया।

इसी दौरान मूल फाइलों के गायब होने और तत्कालीन कार्यपालन यंत्री सुनील गुप्ता की कार से दस्तावेज चोरी होने जैसी घटनाओं ने मामले को और रहस्यमय बना दिया।

जांच एजेंसियों के अनुसार ग्रीन कंस्ट्रक्शन, नींव कंस्ट्रक्शन, किंग कंस्ट्रक्शन, जाह्नवी एंटरप्राइजेस समेत कई फर्मों के जरिए फर्जी भुगतान का नेटवर्क संचालित किया गया।

मामले में कथित मास्टरमाइंड अभय राठौर निलंबित हैं, जबकि कई कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त की जा चुकी हैं।

मामले में बन सकते हैं और भी आरोपी
पूरे मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण चरण आने वाला है। ईडी की जांच में सामने आए डिजिटल और वित्तीय दस्तावेजों के आधार पर संपत्तियों की कुर्की, मनी ट्रेल की गहन जांच और नए आरोपियों की भूमिका तय हो सकती है।

सूत्रों का मानना है कि यदि वित्तीय लेन-देन की पूरी शृंखला खुलती है तो केवल कर्मचारी ही नहीं, बल्कि उस अवधि में भुगतान स्वीकृत करने वाले अधिकारियों और निगरानी तंत्र की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक होती है तो कई ऐसे नाम सामने आ सकते हैं जिनकी अब तक जांच नहीं हुई है।

वहीं दूसरी ओर नागरिक संगठनों का सवाल है कि यदि 489 बिल फर्जी थे तो सरकारी खजाने को हुए नुकसान की कितनी वसूली हुई और कितनी राशि हमेशा के लिए डूब गई?

फिलहाल ईडी की कार्रवाई, न्यायालयीन प्रक्रिया और लंबित उच्च स्तरीय रिपोर्ट इस पूरे प्रकरण की तीन सबसे महत्वपूर्ण कड़ियां हैं।

आने वाले महीनों में यही तय होगा कि यह मामला कुछ कर्मचारियों तक सीमित रहेगा या फिर नगर निगम के इतिहास के सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में शामिल होकर कई बड़े प्रशासनिक चेहरों तक पहुंचेगा।

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