प्रेस कॉन्फ्रेंस से ‘प्रेस’ ही गायब: न पत्रकार, न माइक; फिर भी साहब ने कर दी वार्ता
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
प्रेस कॉन्फ्रेंस सुनते ही माइक की कतार, कैमरों की चमक, पत्रकारों के सवाल और चैनलों के लोगो दिखाई देते हैं लेकिन एक ऐसी ‘प्रेस कॉन्फ्रेंस’ चर्चा में है, जिसमें न पत्रकार थे, न कैमरमैन की भीड़ न चैनलों के माइक आईडी। इसके बावजूद प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई और साहब ने अपनी बात रखी। फर्क सिर्फ इतना था रिकॉर्डिंग कुछ निजी लोगों के मोबाइल कैमरों से हुई।
सवाल है जब पत्रकार ही नहीं थे तो प्रेस कॉन्फ्रेंस आखिर किसके लिए थी? और मीडिया से बातचीत नहीं करना थी तो इसे प्रेस कॉन्फ्रेंस का नाम देने की जरूरत क्यों पड़ी? इंदौर जैसे मीडिया के लिहाज से जागरूक शहर में यह पूरा घटनाक्रम सवालों के घेरे में है।
इंदौर के मीडिया को ‘समझने’ में अफसरों को क्यों लगता है वक्त? : इंदौर प्रेस क्लब और यहां से जुड़े पत्रकारों ने वर्षों से शहर की आवाज को प्रदेश ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया है। सामाजिक, राजनीतिक, प्रशासनिक और पुलिस से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने में इंदौर के मीडिया की अलग पहचान रही है।
ऐसे में किसी अधिकारी का मीडिया से दूरी बनाना केवल व्यक्तिगत पसंद का विषय नहीं रह जाता, बल्कि सवाल खड़ा करता है आखिर जनता से जुड़े सवालों के जवाब कौन देगा?
जो तस्वीर सामने आई है, वह इंदौर पुलिस के जोन-3 से जुड़ी है। डीसीपी अभिषेक रंजन की प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों की गैरमौजूदगी और निजी लोगों के मोबाइल से रिकॉर्डिंग का मामला मीडिया जगत में चर्चा का विषय है।
इंदौर की तासीर ही ऐसी है—यहां सवाल पूछे जाते हैं और जवाब भी मांगे जाते हैं। पत्रकार सिर्फ कैमरा लेकर खड़े रहने के लिए नहीं आते, बल्कि पुलिस-प्रशासन से जनता से जुड़े सवाल पूछते हैं। ऐसे में यदि कोई अधिकारी मीडिया से बचता है तो सवाल स्वाभाविक है दूरी की जरूरत क्यों पड़ रही है?
‘हम आईपीएस हैं, जैसा चाहेंगे वैसा करेंगे’- यही संवाद का तरीका है?: मीडिया से दूरी को लेकर विभागीय स्तर पर चर्चा है अधिकारी आईपीएस हैं और अपनी सुविधा से मीडिया से संवाद कर सकते हैं। निश्चित रूप से प्रत्येक अधिकारी को अपनी कार्यप्रणाली तय करने का अधिकार है, लेकिन सवाल है पुलिस और मीडिया के बीच संवाद का यह रिश्ता आखिर किस आधार पर चलेगा?
पुलिस का काम सिर्फ अपराधियों को पकड़ना नहीं, पुलिस कार्रवाई, उपलब्धियां, कानून-व्यवस्था और जनता की समस्याएं मीडिया के माध्यम से ही आम लोगों तक पहुंचती हैं। ऐसे में मीडिया को नजरअंदाज कर पुलिस और जनता के बीच संवाद मजबूत कैसे होगा?
इंदौर के मीडिया ने कोविड काल से लेकर आज तक कई मौकों पर प्रशासन और पुलिस की कमियों को भी बेबाकी से सामने रखा है और अच्छे कामों को उतनी ही मजबूती से जनता तक पहुंचाया है। यही वजह है किसी एक अधिकारी की नाराजगी या दूरी का असर सिर्फ उस अधिकारी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे विभाग की छवि पर सवाल खड़े होते हैं।
जब मास्क का सवाल भी बन गया था राष्ट्रीय मुद्दा
इंदौर के मीडिया के तेवरों का इतिहास छिपा नहीं है। कोविड काल में मास्क से जुड़े एक विवाद के दौरान तत्कालीन गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को लेकर इंदौर के मीडिया में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली थी। इसकी गूंज राष्ट्रीय स्तर तक पहुंची। तत्कालीन आईजी अनुराधा शंकर से जुड़ा मीडिया के माइक हटाने का मामला भी लंबे समय सुर्खियों में रहा था।
जोन-3 के एडीसीपी आलोक शर्मा का भी पत्रकार से बदसलूकी का मामला इतना तूल पकड़ा कि बहुत जल्द उनकी इंदौर से रवानगी हो गई। इसके अलावा जोन-1 में पदस्थ रहे आईपीएस विनोद मीणा के कार्यकाल में पत्रकारों के नंबर ब्लॉक करने और मीडिया के साथ कथित व्यवहार भी चर्चित रहा। यानी इंदौर के मीडिया के साथ संवाद को लेकर पहले भी कई अधिकारियों के रवैये पर सवाल उठ चुके हैं। वर्तमान घटनाक्रम पुराने विवादों की याद भी ताजा कर रहा है।
सवाल पत्रकार ही पूछते हैं
पत्रकार का काम सवाल पूछना है। कभी तीखे हो सकते हैं, कभी असहज करने वाले भी। ये लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। पुलिस अधिकारी यदि सही काम कर रहे हैं तो मीडिया के सवालों से बचने की बजाय तथ्यों के साथ जवाब देना चाहिए।
मीडिया से फर्क नहीं पड़ता तो खबरों की कटिंग क्यों?
सबसे बड़ा सवाल है। किसी अधिकारी या उनके अधीनस्थों को पत्रकारों के आने न आने से फर्क नहीं पड़ता तो खबरों की कटिंग और टीवी चैनलों की क्लिपिंग वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाने की जरूरत क्या है? जब पुलिस की कार्रवाई की खबर अखबार में प्रमुखता से छपती है, टीवी चैनल पर पुलिस की उपलब्धि दिखाई जाती है या डिजिटल प्लेटफॉर्म पर किसी बड़ी कार्रवाई को जगह मिलती है, तब यही मीडिया विभाग की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने का सबसे बड़ा माध्यम बनता है। मीडिया की जरूरत नहीं है तो विभागीय उपलब्धियों की खबरें और चैनल क्लिपिंग वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाकर प्रशंसा और पुरस्कार लेने की कवायद क्यों?
कुछ अफसरों की अकड़ से पूरे विभाग की छवि पर न लगे दाग
इंदौर के मीडिया ने हमेशा पुलिस के अच्छे कामों में सहयोग किया है। अपराधियों की धरपकड़ हो, बड़ी कार्रवाई हो, नशे के खिलाफ अभियान हो या कानून-व्यवस्था से जुड़ा कोई संवेदनशील मामला—मीडिया ने पुलिस की कार्रवाई को जनता तक पहुंचाने में अपनी भूमिका निभाई है। समस्या तब खड़ी होती है, जब किसी अधिकारी का व्यक्तिगत रवैया पूरे विभाग की छवि पर भारी पड़ने लगता है। कुछ अधिकारियों की कथित अकड़ और मीडिया से दूरी के कारण पूरे पुलिस विभाग को मीडिया के सवालों का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति न पुलिस के हित में है और न ही जनता के।
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