भगवा का नया लड़ाका: कर भला तो करबला; मित्र अब शहर के नए हिंदू वीर
KHULASA FIRST
संवाददाता

मोहर्रम : मेले की अनुमति मुद्दे पर संघ परिवार में बढ़े मेयर के ‘नंबर’
महापौर ने मोहर्रम मेले की अनुमति न देकर ‘भगवा ब्रिगेड’ के ‘एजेंडे’ को पूरा किया
इंदौर की टॉप ब्यूरोक्रेसी भी जानती थी, अफसरों को ताकीद भी थी कि मेले की अनुमति नहीं देना है
भोपाल से आए एक फोन के बाद बदले हालात, प्रिंसिपल सेक्रेटरी स्तर पर हुआ राजधानी से दखल
वक्फ मुखिया सनवर पटेल ने आखिरी तक लड़ाया किला, उज्जैन निवासी होना काम आया
ऐनवक्त पर अनुमति निरस्त करने पर कोर्ट से राहत नहीं मिलने की बात मेयर सहित एमआईसी को भी थी
महापौर ही लाए थे कर्बला पर मालिकाना हक, मैदान का मालिक अब नगर निगम, मुस्लिम समाज ने किराया देकर हक खोया
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
पहली नजर में महापौर पुष्यमित्र भार्गव ‘नौसिखिए’ करार दिए गए। उनके मामले में कहा गया कि कानून के जानकार होने के बावजूद उन्होंने न सिर्फ अपनी, बल्कि पूरी एमआईसी की भद् पिटवा ली।
मसला मोहर्रम के मौके पर बरस-ओ-बरस से धोबी घाट उर्फ कर्बला मैदान पर लगने वाले सालाना मेले का है।
इस मामले में राजनीति व ब्यूरोक्रेसी के बीच दो दिन ‘शह-मात’ का खेल चला। मामला कोर्ट के दखल तक गया। न्याय की चौखट के हस्तक्षेप के बाद निगम के हिस्से में मात आई।
बस, इस हार के बाद से ही शहरभर में ये शोर मचा हुआ है कि मेयर व उनकी मेयर इन काउंसिल ने अपनी भद् पिटवा ली।
तो क्या इस शह-मात के खेल में बात ‘इत्ती’ सी ही है? या शहर का व भगवा वाहिनी के कैंप में ‘भगवा’ का नया ‘लड़ाका’ बनने की थी?
मे यर ने मोहर्रम मेले की अनुमति के मामले में घर बैठे ही बवाल क्यों खड़ा कर लिया। बवाल भी ऐसा, जिसमें भाजपाई निगम परिषद, मेयर, निगमायुक्त, सरकार सबकी भद् पिटवा दी?
ये सवाल हर उस व्यक्ति के दिलो-दिमाग को मथ रहा है, जो मेयर, मेयर इन काउंसिल, मोहर्रम, कर्बला व मेले से थोड़ा बहुत भी वाकिफ है। शहर के लिए तो सबसे पहले ये खबर ही हतप्रभ करने वाली थी कि इस बार मोहर्रम पर कर्बला मैदान में तीन दिवसीय मेला नहीं लगेगा।
शहर चौंका ही इसलिए कि ऐसा कभी हुआ ही नहीं। अकलियत कौन-सा सालभर कोई मेले व जश्न का आयोजन करती है। ले-देकर साल में ये एक ही मौका रहता है, जब अकलियत से जुड़े परिवार के परिवार मेले के जरिये मजहबी मेल-मुलाकात व पुरखों की एक विरासत को जी लेते हैं।
वैसे भी ये मेला केवल मुस्लिम समुदाय तक सीमित नहीं रहता आया है। चाहे मेले में दस्तक देने वाले कदम हों या फिर मेले के जरिये खाने-कमाने निकले दुकानदार हों। सब कुछ मिला-जुला ही रहता है।
मौत के कुएं में झांकती भीड़ में दोनों समुदाय के चेहरे चमकते हैं तो बक्कल-बीटी-चूड़ी-कंगन की छोटी-छोटी दुकानों पर भी ये ‘साझा संस्कृति’ जुटती है। वैसे भी मोहर्रम का ये प्रसंग कभी भी एकतरफा नहीं रहा।
ताजियों के नीचे से निकलने से लेकर जियारत तक में बड़ी संख्या में हिंदू शिरकत करते हैं। ‘मन्नत के शेर’ बनकर घूमने वाले बच्चों में क्या सिर्फ मुस्लिम समाज के ही रहते हैं? उन हिंदू माताओं के भी नौनिहाल शेर बनकर शामिल होते हैं, जो किसी हारी-बीमारी के बाद की गई मन्नत के बाद सकुशल रहे।
कुल मिलाकर मोहर्रम, ताजिये, मेला-ठेला हमारी साझा विरासत का हिस्सा हैं। हों भी क्यों नहीं? मोहर्रम पर ये सब सिर्फ हमारे हिंदुस्तान में ही होता जो है। अन्य इस्लामिक मुल्क में मोहर्रम सिर्फ मातम तक सीमित है।
ऐसी साझा रिवायत पर पहली बार ‘ग्रहण’ लग जाना क्या सिर्फ नगर निगम के स्तर का ही मामला था? माना कि कर्बला की लड़ाई में मेयर पुष्यमित्र भार्गव विजेता बनकर उभरे थे।
उनकी सदारत व कानूनी पेर-पैंतरों के कारण ही नगर निगम अपनी इस बीच शहर की बेशकीमती जमीन का पुनः मालिक बना। 45 साल चली कानूनी लड़ाई के बाद महापौर भार्गव के कार्यकाल में ही निगम अपनी 6.70 एकड़ ज़मीन को जीत पाया।
इस जमीन पर वक्फ संपत्ति का दावा था। 1979 से कानूनी लड़ाई चल रही थी। जमीन की कीमत भी कई सौ करोड़ हो चुकी। निगम की जीत को वक्फ बोर्ड के लिए बड़ा झटका माना गया था।
मौके पर अपनी एमआईसी को ले जाकर महापौर ने मालिकाना हक का बोर्ड भी ठोंक दिया था। इस बार अनुमति निरस्त कर उन्होंने उसी ठोंके हुए बोर्ड की धमक को साबित किया और ये धमक की हिम्मत उन्हें अपनी ही ‘मातृसंस्था’ से मिली थी।
जी हां, वो ‘मातृसंस्था’ ही थी, जिसकी मंशा ये नहीं थी कि अब धोबी घाट फिर से किसी अन्य तंजीम-इदारा का ठिया-ठिकाना बने। लिहाजा एक अहम बैठक में तय हुआ कि ताजिये की परंपरा को बरकरार रखा जाए, लेकिन मेले-ठेले के जरिये कब्जे की पुरानी मानसिकता को अब पुनः न पनपने दिया जाए।
लिहाजा ‘मातृसंस्था’ ने अपने मंतव्य से जमीन के मालिक नगर निगम को अवगत कराया। निगम मुखिया ने इसका अक्षरशः पालन किया। इस बाबत शहर की टॉप ब्यूरोक्रेसी को भी ताकीद दे दी गई थी। सब कुछ मनोनुकूल ही था कि राजधानी से एक फोन ‘मोतीतबेला’ पहुंचा और निगम दफ्तर से ही मेले की अनुमति जारी हो गई।
लिहाजा शहर फिर चौंका कि ये क्या? एक ही निगम में ये दो-दो मोर्चे कैसे? वह भी मुस्लिम मुद्दे पर और एकछत्र भाजपाई राज में? राज खुला कि इस मामले में राजधानी से प्रिंसिपल सेक्रेटरी स्तर पर सीधा दखल हुआ। नतीजतन आदेश तो होना ही था।
‘सूबे के सरदार’ के शहर का निवासी होने के नाते सनवर पटेल ने आखिरी तक अकलियत के लिए किला लड़ाया। मेहनत रंग लाई और इंदौर में वक्फ के कर्ताधर्ता पटेल व निजाम का शुक्रिया करते नजर आए। जब तक ये शुकराना मुकम्मल मुकाम पाता, तब तक अनुमति फिर मुल्तवी कर दी गई।
इस बार फिर जमीन का मालिक जागा। एमआईसी को भी जगाया गया। दूसरे शहर से वर्चुअल जाजम बिछाई गई और अनुमति फिर निरस्त। अब सवाल फिर वही शहर की राजनीतिक व सामाजिक फिजा में तैरा कि एक ही महापौर दो-दो बार ऐसी ‘हिमाकत’ क्यों व किसके कहने पर कर रहा है?
‘भगवा लड़ाका’ बनने की ये हिम्मत-हिमाकत थी..!
कहानी यहां ही खत्म नहीं हुई। अगले दिन टीम मेयर को कोर्ट की चौखट पर मात मिल गई। मेला सज गया और कई सवाल अनुउत्तरित कर गया कि आखिर कानून के जानकार मेयर ऐसी गलती कैसे कर सकते हैं, जिसमें स्वयं की, एमआईसी की और अपने निगमायुक्त की अवहेलना हो जाए?
खुलासा फर्स्ट इसकी तह में गया तो खुलासा हुआ कि इस पूरे मामले में मेयर ने संघ परिवार के बीच अपने नंबर तेजी से बढ़ा लिए। मेयर ने भगवा वाहिनी की दिली मंशा को ही आगे बढ़ाया था और वह भी स्वयं के मान-अपमान को परे रखकर।
ऐसा कर वे शहर के व भगवा ब्रिगेड की नजरों में नए ‘हिंदू वीर’ बन गए। कर्बला की लड़ाई को पहले कोर्ट में जीतकर, फिर मालिकाना हक का बोर्ड ठोंककर और फिर वक्फ की भाड़ा चिट्ठी काटकर मेयर ‘भगवा’ का एक नया ‘लड़ाका’ बनने की राह पर अग्रसर हो गए।
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