माणा की पहाड़ियों में दफन द्वापर का रहस्य: जब गुफा में धराशायी हुआ कालयवन का अहंकार
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
माणा की खड़ी चढ़ाइयों पर दफन द्वापरयुगीन रहस्य, व्यास गुफा से आगे की वो कंदरा जो बनी कालजयी इतिहास की गवाह, दो युगों को जोड़ती देवभूमि की ‘मुचुकुंद गुफा’: जहां त्रेता के राजा की एक दृष्टि से भस्म हुआ द्वापर का अजेय योद्धा, आखिर क्यों निहत्थे ही रणभूमि से भागे थे द्वारकाधीश?
जवाब समेटे आज भी मौन खड़ी है चमोली की यह अलौकिक कंदरा, धर्म की सूक्ष्म विजय का सजीव दस्तावेज: जहां अस्त्र-शस्त्र हुए बेअसर, वहां काम आई देवभूमि की यह तांत्रिक वेदी
दे वभूमि उत्तराखंड की गोद में बसा चमोली जिला और पावन बद्रीनाथ धाम केवल अलौकिक अध्यात्म का केंद्र नहीं हैं, बल्कि ये सनातन इतिहास की कई युगांतरकारी कड़ियों के मूक गवाह भी हैं।
बद्रीनाथ से महज तीन किलोमीटर आगे भारत के अंतिम सीमांत गांव ‘माणा’ की ओर बढ़ते ही इतिहास के पन्ने खुद-ब-खुद जीवंत हो उठते हैं। यहां व्यास और गणेश गुफा के बारे में तो अमूमन हर तीर्थयात्री जानता है, लेकिन माणा की पथरीली ढलानों से थोड़ा और ऊपर, खड़ी चढ़ाई पर एक ऐसी रहस्यमयी और विस्मयकारी कंदरा मौजूद है जिसका सीधा संबंध भगवान श्रीकृष्ण की सबसे अनूठी ‘लीला’ से है।
इसे ‘मुचुकुंद गुफा’ कहा जाता है। यह वही ऐतिहासिक स्थल है जहां द्वारकाधीश की विलक्षण चतुराई और कूटनीति के आगे महाप्रतापी यवन योद्धा ‘कालयवन’ जलकर भस्म हो गया था। आज भी यह गुफा अपने भीतर उस द्वापरयुगीन रहस्य को समेटे अडिग खड़ी है।
त्रेता से द्वापर का सेतु और राजा मुचुकुंद का वह अमोघ वरदान... इस गुफा के महात्म्य को समझने के लिए हमें समय के चक्र को पीछे घुमाकर त्रेतायुग के उस कालखंड में ले जाना होगा, जब इक्ष्वाकु वंश के प्रतापी राजा मुचुकुंद (श्रीमदभागवत महापुराण के अनुसार राजा मांधाता के पुत्र) ने देवासुर संग्राम में देवताओं की ओर से असुरों के खिलाफ कई युगों तक निरंतर युद्ध लड़ा था।
कार्तिक स्वामी के देवसेनापति बनने के बाद जब देवताओं को विजय प्राप्त हुई, तो उन्होंने थक चुके राजा मुचुकुंद से विश्राम करने का आग्रह किया।
मुचुकुंद के रण-कौशल से प्रसन्न होकर देवताओं ने उन्हें इच्छित वरदान मांगने को कहा। सदियों की भयंकर थकान के कारण राजा ने केवल एक ही वरदान मांगा एक ऐसी गहरी और शांत निद्रा, जिसमें कोई बाधा न डाले।’
देवताओं ने तथास्तु कहते हुए उन्हें एक अमोघ सुरक्षा कवच भी दे दिया कि जो कोई भी उन्हें अकारण नींद से जगाएगा, मुचुकुंद की पहली दृष्टि पड़ते ही वह वहीं जलकर भस्म हो जाएगा।
इस वरदान को पाकर राजा ने हिमालय की इसी कंदरा को अपना शयनकक्ष चुना और वे गहरी निद्रा में लीन हो गए।
जब श्रीकृष्ण की चाल में फंसा कालयवन और कंदरा बनी रणक्षेत्र... युग बदला और द्वापरयुग में जब जरासंध के उकसावे पर महाप्रतापी और क्रूर यवन राजा ‘कालयवन’ ने तीन करोड़ म्लेच्छ सेना के साथ मथुरा को घेरा, तब यादव कुल पर काल का विकराल संकट मंडराने लगा।
कालयवन को वरदान था कि कोई भी अस्त्र-शस्त्र या योद्धा उसे परास्त नहीं कर सकता। इस अजेय विधान को तोड़ने के लिए श्रीकृष्ण ने एक ऐसी चाल चली, जिसने इतिहास में उन्हें ‘रणछोड़’ का नाम दिया।
कन्हा निहत्थे ही रणभूमि से भाग खड़े हुए। कालयवन उन्हें कायर समझकर पीछे दौड़ा। श्रीकृष्ण उसे छकाते हुए सीधे बद्रीनाथ क्षेत्र की इसी मुचुकुंद गुफा के भीतर ले आए।
एक ऐतिहासिक कूटनीति... गुफा के घने अंधेरे में कान्हा ने देखा कि राजा मुचुकुंद सोए हुए हैं। कूटनीति के साक्षात स्वरूप प्रभु ने तुरंत अपनी पीताम्बरी (पीला वस्त्र) उतारी और उसे सोए हुए राजा के ऊपर ओढ़ा दिया, और स्वयं एक गहरे कोने में छिप गए।
अहंकार में अंधा कालयवन भी गुफा में दाखिल हुआ और पीले वस्त्र को देखकर समझा कि यह कृष्ण ही डरकर सो रहे हैं। उसने अट्टहास करते हुए राजा मुचुकुंद को लात मार दी। सदियों की निद्रा से जागे राजा ने जैसे ही क्रोधित आंखें खोलीं और उनकी पहली तीक्ष्ण दृष्टि कालयवन पर पड़ी, देवताओं के वरदान स्वरूप उसके शरीर में स्वतः ही भयंकर अग्नि भड़क उठी और वह राख की ढेरी में तब्दील हो गया।
वर्तमान स्वरूप: आज भी विस्मय जगाती है यह अलौकिक कंदरा... आज के इस दौर में जब श्रद्धालु इस ऐतिहासिक मुचुकुंद गुफा तक पहुंचते हैं, तो वहां का विहंगम और शांत वातावरण उन्हें एक अलग ही कालखंड का अहसास कराता है।
माणा गांव के संकरे और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से होकर जाने वाली इस गुफा का प्रवेश द्वार भले ही छोटा है, लेकिन भीतर जाने पर यह काफी विस्तृत हो जाती है। गुफा के भीतर राजा मुचुकुंद की एक प्राचीन प्रतिमा स्थापित है, जहां उनके उस महान शयन और तपस्या की पूजा की जाती है। इसके ठीक समीप ही वह स्थान भी चिन्हित है, जहां कालयवन के भस्म होने की मान्यता है।
इतिहास और आस्था का सजीव दस्तावेज... आधुनिक विज्ञान और इतिहासकार भले ही इसे महज एक पौराणिक रूपक या लोककथा का हिस्सा मानें, लेकिन स्थानीय भोटिया कबीलों और सदियों से यहां आ रहे संतों के लिए यह गुफा इस बात का जीवंत प्रमाण है कि कैसे देवभूमि का कण-कण ईश्वरीय न्याय से जुड़ा हुआ है।
चार धाम यात्रा पर आने वाले जिज्ञासु पाठकों के लिए बद्रीनाथ धाम के बिल्कुल नजदीक स्थित मुचुकुंद गुफा का यह सफर केवल एक दर्शनीय स्थल की सैर नहीं है, बल्कि सनातन इतिहास के उस स्वर्णिम पन्ने को साक्षात छूना है जहां अहंकार का अंत और धर्म की सूक्ष्म विजय हुई थी।
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