लव जिहादी ने धार्मिक पहचान छिपाकर किया था विवाह: कोरोना काल में भर दी थी महिला की मांग; आरोपी मुस्लिम पति को पत्नी-बेटी के भरण-पोषण का आदेश, हाईकोर्ट ने बढ़ाई राशि
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह करने और बाद में प्रताड़ना के आरोपों से जुड़े लव जिहाद के चर्चित मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी महिला के साथ धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह किया गया हो और उससे संतान उत्पन्न हुई हो, तो केवल विवाह की वैधता के आधार पर उसे भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
मामले में याचिकाकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि 23 फरवरी 2020 को कोरोना काल के दौरान मुस्लिम युवक गब्बर उर्फ मुस्तफा ने स्वयं को हिंदू बताकर मंदिर में उसकी मांग में सिंदूर भरकर विवाह किया। बाद में आधार कार्ड देखने पर उसे प्रतिपक्षी की वास्तविक धार्मिक पहचान का पता चला। महिला का आरोप है कि इस बारे में सवाल करने पर उसके साथ मारपीट की गई और जान से मारने की धमकियां दी गईं।
महिला के अनुसार गर्भावस्था के दौरान सोनोग्राफी जांच के समय जून 2020 में उसके आधार कार्ड देख कर पूछने पर कि क्या वह बोहरा है तब मुस्तफा ने उसे गला दबा कर मारने का प्रयास किया और धमकाया कि किसी को बताया तो उसके माता पिता को मार डालेगा। आरोपी ने पीड़िता पत्नी को इसलिए मारा गया क्योंकि उसके बोहरा धर्म स्वीकार करने से स्पष्ट मना कर दिया था।
याचिका के अनुसार, महिला ने धर्म परिवर्तन से इनकार किया तो उसके साथ हिंसा की गई। इसके अलावा दो माह की बच्ची को नुकसान पहुंचाने का प्रयास करने सहित कई गंभीर आरोप लगाए गए, जिनके संबंध में थाना द्वारकापुरी और एमजी रोड में विभिन्न धाराओं तथा मध्यप्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज किए गए।
कुटुंब न्यायालय, इंदौर ने 26 अगस्त 2023 को दिए आदेश में महिला को कानूनी रूप से विवाहित नहीं मानते हुए उसके भरण-पोषण के दावे को खारिज कर दिया था। वहीं नाबालिग पुत्री के लिए केवल 2,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण राशि मंजूर की गई थी।
इस आदेश को चुनौती देते हुए महिला ने हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान महिला की ओर से अधिवक्ता राजेश जोशी ने पक्ष रखा। मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति गजेन्द्र सिंह ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में महिला को केवल तकनीकी आधार पर भरण-पोषण से वंचित करना उसे दोबारा पीड़ित करने जैसा होगा।
हाईकोर्ट ने निचली अदालत का आदेश निरस्त करते हुए लव जिहादी पति को पत्नी को 10,000 रुपये तथा नाबालिग पुत्री को 10,000 रुपये, कुल 20,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण राशि देने का आदेश दिया। न्यायालय ने यह राशि याचिका दायर किए जाने की तिथि से देय मानी है। यह फैसला धार्मिक पहचान छिपाकर विवाह और ऐसे मामलों में महिलाओं एवं बच्चों के भरण-पोषण अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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