मंत्र काम कर गया: तंत्र नहीं कर पाया; प्रदेश के इंटेलिजेंस और टॉप टेन अफसरों पर उठ रहे सवाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

खबर प्रदेश से लीक होने का संकेत नहीं
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सैटेलाइट और एआई युग में भी भारतीय राजनीति में सत्ता बनाने, चलाने और बचाने के साथ में तख्तापलट करने के लिए तंत्र मंत्र हवन यज्ञ अनगिनत कर्मकांड कराए जाते हैं।
गनीमत है सोशल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए ऐसा कोई कर्मकांड अभी नहीं आया है। इसके बाद भी शासन और प्रशासन लगातार सत्ता षड्यंत्रों से जूझते रहते हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मामले में कहा जा रहा है उन्हें अस्थिर करने के लिए किए गए तंत्र-मंत्र किए गए लेकिन इनको रोकने के लिए हर पल तैनात रहने वाला सरकारी सिस्टम काम नहीं कर पाया और एक खबर में प्रदेश ही नहीं पूरे देश में राजनीतिक भूचाल ला दिया। उज्जैन से इंदौर और भोपाल से दिल्ली तक प्रदेश का इंटेलिजेंस और टॉप टेन ऑफिसर सवालों के घेरे में आ गए।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से जुड़े भूमि विवाद के बाद जिस तरह एक प्रतिष्ठित नेशनल मीडिया में रिपोर्ट सामने आई और विपक्ष ने इसे लपकते हुए आक्रामक राजनीतिक मुद्दा बनाया, उससे सरकार शुरुआत में रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई दी।
इससे एक गलत संदेश गया। राजा के खिलाफ इतना बड़ा सुनियोजित मामला, हंगामा खड़ा हो जाए और उसकी सरकार का पूरा तंत्र राजा के साथ हक्का-बक्का नजर आए तो इसे क्या कहा जाएगा। कहां जा रहा है षड्यंत्र का मंत्र चल गया और तंत्र सरकार का जवाबदेह सिस्टम देखता रह गया।
शुरुआत में सिस्टम रहा बेखबर
विश्लेषकों के अनुसार, संकट के शुरुआती चरण में सरकार का पूरा सिस्टम, जो शासन और उसकी सुरक्षा और चौकसी के लिए जवाबदेह होता है, बेखबर प्रतीत हुआ। सरकार का खुफिया, संचार और सुरक्षा तंत्र अपेक्षित गति से काम करता नहीं दिखा।
हालांकि, पूरा सरकारी तंत्र 'फेल' था या किसी 'षड्यंत्र' के सामने पूरी तरह असहाय था, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। हो सकता है किसी स्तर पर इस तरह की कोई जानकारी अधिकारियों को हो लेकिन उसे सरकारी तंत्र और मुख्यमंत्री ने गंभीरता से नहीं लिया होगा जैसा लेना चाहिए था या फिर भरोसे में रह गए होंगे।
सरकार ने बाद में आरोपों का खंडन किया और अपना पक्ष रखा। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को सरकार के संकट-प्रबंधन और राजनीतिक संचार की परीक्षा के रूप में देखा जा सकता है, साथ ही उसके तंत्र की निश्चित विफलता के रूप में भी।'
जनता का विश्वास सर्वोपरि
चाणक्य के अनुसार प्रजा का विश्वास ही राज्य की सबसे बड़ी शक्ति है। शत्रु और आंतरिक विरोध दोनों पर नजर कमजोर होती है तो तख्तापलट होते देर नहीं लगती। बाहरी चुनौतियों के साथ-साथ आंतरिक असंतोष और षड्यंत्रों की समय रहते पहचान आवश्यक है।
समय पर निर्णय और संकट प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सुरक्षा तंत्र। संकट को छोटा रहते ही नियंत्रित करना चाहिए; देर से प्रतिक्रिया देने पर नुकसान बढ़ सकता है। राजा को आत्मसंयम छोड़कर अहंकार, चापलूसी और गलत सूचना से बचते हुए विभिन्न स्रोतों से सत्य की पुष्टि करना चाहिए।
चाणक्य नीति का मूल संदेश है राज्य की मजबूती केवल सेना या सत्ता से नहीं, बल्कि विश्वसनीय सूचना तंत्र, सक्षम प्रशासन, योग्य सलाहकार, पारदर्शी शासन और जनता के विश्वास से सुनिश्चित होती है। इन स्तंभों में कमजोरी आती है तो शासन राजनीतिक और प्रशासनिक संकटों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकता है।
चाणक्य के सूत्र आज भी उपयोगी
यह भी चर्चा है किसी बड़े प्रकरण में जानकारी अनेक स्रोतों से मिलती है और तथ्यों की खोज की जाती है। इसमें समय भी लगता है। संवेदनशील जानकारी उपलब्ध कराने में प्रशासनिक तंत्र से जुड़े लोग भी शामिल हो सकते हैं। मुख्यमंत्री से जुड़े इस मामले में हालांकि किसी अधिकारी की भूमिका सामने नहीं आई है।
कहना उचित है इस घटनाक्रम ने सरकार के राजनीतिक फीडबैक तंत्र, संकट प्रबंधन और संवेदनशील मुद्दों पर पूर्व तैयारी को लेकर गंभीर प्रश्न अवश्य खड़े किए। राजनीतिक विश्लेषण के स्तर पर एक प्रश्न यह भी है यदि लंबे समय तक दस्तावेज़ जुटाए गए, जांच-पड़ताल हुई और विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित हुई, तो क्या सरकार के फीडबैक और सूचना तंत्र को भनक थी?
यहीं से बहस शुरू होती है कि सरकार का राजनीतिक इंटेलिजेंस, फीडबैक सिस्टम और संकट-प्रबंधन तंत्र सक्रिय था या नहीं। वैसे राजनीति में आज भी चाणक्य के सूत्र वाक्य उपयोगी हैं। जब किसी शासक या सरकार के सामने राजनीतिक चुनौतियां, विरोध या षड्यंत्र जैसी परिस्थितियां हों, तब शासन के लिए कुछ प्रमुख सिद्धांत बताए गए हैं।
इन्हें आज भी राजनीतिक और प्रशासनिक प्रबंधन के संदर्भ में उद्धृत किया जाता है। मजबूत सूचना तंत्र शासन के लिए जरूरी है। शासक को अधिकारियों की रिपोर्ट पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि स्वतंत्र व विश्वसनीय सूचना तंत्र भी हो। योग्य और निष्ठावान मंत्र होना चाहिए।
मंत्री और सलाहकार योग्यता एवं निष्ठा के आधार पर चुने जाएं, केवल व्यक्तिगत निकटता के आधार पर नहीं। अधिकारियों पर सतत निगरानी, प्रशासन में भ्रष्टाचार, असंतोष और गुटबाजी पर नियमित निगरानी रखी जाए।
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