चिट्ठी से आया ‘मूंगदाल’ में उबाल: शिवराज के पत्र से गरमाई सियासत
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
समर्थन मूल्य पर मूंग की सारी खरीदी सरकार करे, इस मांग को लेकर किसानों ने भोपाल में परसों डेरा डाल दिया था। किसानों के आंदोलन से भोपाल का दैनिक जीवन ठप पड़ गया था। दूसरी ओर किसान मुख्यमंत्री आवास को घेरने के लिए लामबद्ध थे।
इधर, केंद्रीय कृषिमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री के नाम सीधे पत्र लिख दिया कि 25% से अधिक की सरकारी मूंग खरीदी की जिम्मेदारी केंद्र की नहीं, राज्य सरकार की है।
इस तरह हर तरफ दबाव के बाद प्रदेश सरकार ने किसानों के प्रति उदार रवैया अपनाते हुए आंदोलन की मांगों पर सहमत होकर 60% मूंग खरीदी की सहमति दे दी। इसके लिए आंदोलन का नेतृत्व कर रहे संगठनों के साथ भारतीय किसान संघ और अन्य किसान संगठनों से बातचीत के लिए एक मंत्री स्तर की समिति बनाई।
इस समिति ने किसान संगठनों से चर्चा के बाद मांगें मंजूर कर लीं। मुख्यमंत्री इस मामले में बीच में नहीं आए, लेकिन क्राइसिस मैनेजमेंट उनके अनुसार हुआ। जिस समय समझौता वार्ता चल रही थी, तब मुख्यमंत्री उज्जैन में थे, शायद मौसम खराब होने की वजह से भोपाल नहीं पहुंच पाए।
बैठक में सारे मूंग की खरीदी से बातचीत शुरू हुई, जो 60 प्रतिशत पर पूरी हुई। बताते हैं बातचीत में संयुक्त किसान मोर्चा 60 प्रतिशत मूंग खरीदे जाने पर राजी हो गया, जबकि किसान संघ ने 80 प्रतिशत खरीदी की मांग रखी थी।
किसान संघ के प्रदेश संगठन महामंत्री महेश चौधरी अधिकतम सरकारी खरीदी के लिए जोर डाल रहे थे। तब जाकर 60% पर बात बनी।
भोपाल में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर मूंग खरीदी की मांग को लेकर संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले शुरू हुआ उग्र आंदोलन अपनी मांगों को मंजूर करवाकर खत्म हो गया। इस कारण सियासत गरमा गई।
भाजपा की प्रदेश और केंद्र सरकार के बीच डिजिटल इंडिया के इस जमाने में कागजी चिट्ठी-पत्री चलती रही। इस कारण समझौता वार्ता में विलंब हुआ। जनता, किसान और पुलिस प्रशासन परेशान हुए।
अंत में राजधानी की सड़कों पर डेरा डाले किसानों के गुस्से और प्रशासन की सरगर्मी के बीच कल देर रात डॉ. मोहन यादव की सरकार ने फैसला लेते हुए किसानों की प्रमुख मांग पर हां कर दी।
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे दिल्ली और भोपाल की राजनीतिक गलियारों में चली अंदरूनी खींचतान ने सियासी पारा पूरी तरह गरमा दिया था।
किसानों के उग्र प्रदर्शन ने जहां एक ओर मोहन सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था की परीक्षा ली, वहीं केंद्रीय मंत्री शिवराजसिंह चौहान के पत्र ने गेंद पूरी तरह से राज्य सरकार के पाले में डालते हुए कहा कि मोहन सरकार अपने संसाधनों से किसानों का अतिरिक्त मूंग खरीदकर राहत दे सकती है।
इसके बाद प्रदेश सरकार ने एक समिति के माध्यम से किसानों से बातचीत करके किसान संगठनों की मांगें स्वीकार कर लीं। इस पूरे क्राइसिस मैनेजमेंट से मुख्यमंत्री ने दूरी तो बनाई, लेकिन पूरे समय नजर रखी।
मुख्यमंत्री स्वयं सामने नहीं आए। किसानों से अधिकारियों का और मंत्रियों की समिति का आमना-सामना करवाया। आंदोलनकारी किसानों के साथ पुलिस प्रशासन को उदारतापूर्वक नियंत्रित करने के लिए, यानी बिना लाठी-डंडे के हैंडल करवाया, जबकि आंदोलन में कांग्रेस के किसान संगठन और कक्काजी का किसान मजदूर राष्ट्रीय संगठन मुख्य रूप से थे।
दिल्ली के जंतर-मंतर जैसी सरकारी गलती प्रदेश सरकार नहीं करना चाहती थी। फिलहाल सरकार के इस त्वरित फैसले से आंदोलनरत किसानों को बड़ी राहत मिली है और राजधानी में उपजा तनाव खत्म हो गया है।
शिवराजसिंह चौहान को पत्र प्रदेश के कृषिमंत्री ने लिखा था, लेकिन शिवराज ने जवाब में जो पत्र लिखा, वह मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नाम लिखा। इससे समझा जा सकता है कि शिवराज प्रदेश सरकार की एक चिट्ठी से नाराज हो गए। उन्होंने अपने पत्र में मूंग खरीदी के नीतिगत तथ्य का खुलासा करते हुए प्रदेश सरकार को आड़े हाथों लिया।
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि मध्य प्रदेश के कृषिमंत्री के पत्र में यह कहा गया है कि केंद्र द्वारा राज्य को 4.54 लाख मीट्रिक टन मूंग खरीद का "लक्ष्य’ प्रदान किया गया है, जबकि वास्तविकता यह है कि केंद्र सरकार द्वारा किसी भी प्रकार का खरीद लक्ष्य प्रदान नहीं किया जाता, बल्कि यह अनुमानित उत्पादन की अधिकतम सीमा (स्वीकृति) होती है।
प्रदेश पर सर्वाधिक 87 प्रतिशत हिस्सा
पत्र में यह स्पष्ट किया गया है कि पीएम-आशा योजना के दिशा-निर्देशों के अनुसार केंद्र सरकार केवल 25 प्रतिशत तक ही खरीद की स्वीकृति देती है और अतिरिक्त खरीदी का जिम्मा राज्य सरकार का होता है। इसके बावजूद केंद्र ने देश की कुल स्वीकृति का 87% हिस्सा अकेले मध्य प्रदेश को दिया, जो सर्वाधिक है।
खरीद की धीमी गति पर सवाल
पत्र के अंत में उल्लेख किया गया है कि 29 जुलाई 2026 तक प्राप्त आंकड़ों के अनुसार राज्य में मूंग की खरीदी लगभग 60 हजार मीट्रिक टन ही हुई है। किसानों के हित में त्वरित कार्रवाई का अनुरोध करते हुए शिवराज ने किसानों के व्यापक हित का हवाला देकर राज्य सरकार से अनुरोध किया कि वह मूंग खरीदी शीघ्रता से सुनिश्चित करे, जिससे यह संकेत मिलता है कि राज्य स्तर पर खरीदी की गति सुस्त है।
जितनी खरीदी अब तक होनी चाहिए थी उसका एक चौथाई मूंग ही खरीदा जा सका। पूरा 25% मूंग अभी खरीदी केंद्रों तक पहुंचा ही नहीं है। इसके बाद मामले की नजाकत को समझते हुए मुख्यमंत्री ने तमाम आर्थिक और भंडारण की समस्याओं के बावजूद किसान संगठनों की मांगें मान लीं।
समर्थन मूल्य को लेकर स्थायी प्रावधान जरूरी
इस पूरे मामले में भारतीय किसान संघ के महेश चौधरी और प्रदेश अध्यक्ष कमलसिंह आंजना कहते हैं कि समर्थन मूल्य पर उपज खरीदी के लिए स्थायी प्रावधान किए जाना जरूरी है। सरकार ने समर्थन मूल्य पर खरीदी को अपने सिर पर बोझ समझ लिया है, जबकि ऐसा नहीं है।
सरकार चाहे तो सब कुछ हो सकता है। समाधान के कई सारे सीधे उपाय मौजूद हैं, लेकिन शासन में बैठे अधिकारी ऐसा होने नहीं देते, जिसके चलते किसान आंदोलन होते हैं।
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