मेट्रोपॉलिटन एरिया इंदौर में भी होगा मुख्यालय: प्रस्ताव पहले था; चिट्ठी बाद में चली
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मुख्यमंत्री की भावनाओं, उनके विचारों को, इंदौर को लेकर उनकी चिंता-फिक्र को समझे बिना सरकार पर राजनीतिक हमले किए जा रहे या करवाए जा रहे हैं, पर सच्चाई यह भी है कि इंदौर को लेकर सरकार पूरी तरह से संवेदनशील है, संजीदा है और इंदौर को महान महानगर बनाने का प्रयास करते हुए दिखाई दे रही है। ऐसे अथक प्रयास सरकारी तंत्र के माध्यम से सरकार कर भी रही है। बड़े-बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट आकाश में लटके हुए नजर आ रहे हैं।
इनके पूर्ण होने के बाद हो सकता है इंदौर सपनों का शहर बन जाए। यह अलग बात है कि इंदौर को लेकर इंदौरवासियों के सपने शुरू से ही पूरी तरह अलग हैं, जो राजनेताओं और शासन-प्रशासन के ड्रीम प्रोजेक्ट से मेल नहीं खाते।
सरकार सपनों का शहर भले ही बनाती रहे, लेकिन हकीकत यह है कि शहरवासियों को शहर विकास के अक्सर डरावने सपने ही आते हैं, क्योंकि हमेशा राजनेताओं के साथ अफसर तथा योजनाकारों के सपने एकदम अलग रहे हैं।
ये लोग इंदौर को कभी पेरिस, कभी लंदन, कभी न्यूयॉर्क, कभी मैनहट्टन, कभी सिंगापुर और पता नहीं क्या-क्या बनाना चाहते रहे हैं, लेकिन इंदौरवासी चाहते हैं कि इंदौर को इंदौर ही बना रहने दीजिए। जितना बिगाड़ा कर दिया है, उसे ठीक कर एक बेहतर और रहने लायक इंदौर फिर से बना दीजिए।
सरकार ने जो सपना देखा है, उसकी अधिसूचना जारी होने के साथ ही इसमें शामिल गांवों और जिलों की तस्वीर भी साफ हो गई है। प्रदेश सरकार ने छह जिलों के कुल 2781 गांवों को इस क्षेत्र में शामिल किया है, जिनमें इंदौर के सर्वाधिक 654 गांव हैं। गांव का क्या होगा यह किसी को नहीं मालूम।
उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन एरिया में शामिल गांव की अधिसूचना जारी होने के साथ ही गांवों की सूची भी सार्वजनिक कर दी गई है। इंदौर और आसपास के छह जिलों के कुल 2781 गांव इस क्षेत्र में शामिल किए गए हैं। इस तरह एक बड़े विशाल भूभाग में यह एरिया विकसित होगा, जो विवादों में उलझा हुआ है।
टिकाऊ या सतत विकास की अवधारणा के विपरीत यह विशाल भूभाग अपनी आबादी और जरूरत के लिए प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन पर निर्भर रहेगा। इससे जीवन का संकट हर तरह से बढ़ेगा। सरकार इस एरिया के जंगल और पानी को सुरक्षित रखने का दावा कर रही है।
ऐसे भिन्न-भिन्न विवादों के साथ एक बड़ा विवाद उज्जैन-इंदौर नामकरण को लेकर चला आ रहा है और इस विषय पर सांसद व मंत्री भी चिंतित हैं। सबकी मांग है कि इस विशालकाय मेट्रोपॉलिटन एरिया का मुख्यालय इंदौर में रखा जाए, उज्जैन में नहीं।
कहा जाता है कि योजना का रन और सरकार ने इसे फिर अपने तरीके से समझा और बनाया। इस तरह मेट्रोपॉलिटन एरिया की घोषणा कर दी गई। जैसे ही इसकी घोषणा हुई, चारों ओर खुशियों के बजाय विरोध खड़ा हो गया। इस बात के लिए कि इंदौर का नाम पहले लगाना था, मतलब नामकरण इंदौर-उज्जैन मेट्रोपॉलिटन होना था।
मुख्यमंत्री की भावना को समझे बिना चिट्ठी युद्ध शुरू हो गया। पहले लोकसभा सदस्य ने खत लिखा, फिर एक अज्ञात स्रोत द्वारा दूसरा पत्र आ गया। दोनों पत्रों में इतने बड़े एरिया को लेकर कोई सवाल नहीं उठाए गए, कोई जिज्ञासा प्रकट नहीं हुई, सिर्फ इंदौर को मुख्यालय बनाने की बात कही गई।
दूसरी ओर इस सबके बीच मुख्यमंत्री पहले से ही सजग और दूरदर्शिता के साथ मेट्रोपॉलिटन एरिया पर काम कर रहे हैं। शायद उन्हें पहले से ही बड़े भूभाग के क्षेत्र मेट्रोपॉलिटन एरिया की व्यवहारिक समस्याओं के बारे में मालूमात रही। इसीलिए बताया जा रहा है कि इंदौर को एक मुख्यालय के रूप में ही स्थापित किया जाएगा।
अर्थात मेट्रोपॉलिटन एरिया का मुख्यालय उज्जैन के साथ इंदौर में भी होगा। इंदौर का मुख्यालय इंदौर संभाग के क्षेत्र की देखरेख करेगा। इसी तरह उज्जैन संभाग के लिए उज्जैन का मुख्यालय होगा।
इन दोनों मुख्यालय के ऊपर क्या एक और मुख्यालय, जिसे हेड क्वार्टर ऑफ मेट्रोपॉलिटन रीजन उज्जैन-इंदौर कहा जाएगा, ऐसा भी हो सकता है? या फिर ऐसा मुख्यालय नहीं भी हो और दो अलग संभागों का मेट्रो को रिटर्न एरिया बने।
उल्लेखनीय है मेट्रोपॉलिटन एरिया का नोटिफिकेशन जारी होने के पहले कई तरह की शंकाएं थीं। मप्र महानगर क्षेत्र नियोजन एवं विकास अधिनियम-2025 की धारा 3(1) के तहत नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र के गठन की अधिसूचना जारी की है।
इसमें इंदौर और उज्जैन सहित छह जिले शामिल किए गए हैं। एरिया नोटिफिकेशन के अनुसार इंदौर के 654 गांव, देवास के 593, उज्जैन के 624, धार के 224, शाजापुर के 546 और रतलाम के 140 गांव इस क्षेत्र में शामिल किए हैं। इस मेट्रोपॉलिटन एरिया में इंदौर-उज्जैन सहित छह जिलों की 75.34 लाख आबादी शामिल है।
उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन एरिया को लेकर आप और हम चिट्ठी-पत्री लिखने-लिखवाने, पढ़ने और पढ़ाने के खेल खेलने में मस्त हैं। चिट्ठी-पत्री ढूंढ़ने-ढुंढ़वाने, छपवाने और छापने में लगे हैं, यह जाने बिना कि आखिर सरकार का प्लान क्या है? चिट्ठी-पत्री के खेल में उलझे हमारे नेताओं को चाहिए कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भावनाओं को समझें।
ऐसा इसलिए कि मुख्यमंत्री इंदौर को लेकर हमेशा चिंतित रहे हैं। अपुष्ट जानकारी के अनुसार बताया है कि इंदौर का वजूद पूरी तरह कायम रहेगा। इंदौर को उज्जैन से अलग रखा जाएगा। इंदौर संभाग का मुख्यालय इंदौर में ही होगा, ऐसा सुनने में आ रहा है। इसी तरह उज्जैन मैं उज्जैन संभाग का मुख्यालय होगा।
प्रस्ताव है फिर चिट्ठियों का हल्ला क्यों
मेट्रोपॉलिटन एरिया मुख्यालय को लेकर भाजपा में ही विरोधाभासी स्थिति है। हो सकता है यह स्थिति बनाई गई हो ताकि मुख्यमंत्री को इंदौर के नाम पर कटघरे में खड़ा किया जा सके।
यह कहते हुए मुख्यमंत्री के पक्ष में दलील पेश करने वाले बताते हैं पहले भूमि कांड फिर अब चिट्ठी कांड की सियासत बताती है भाजपा के अंदर सब कुछ ठीक नहीं है।
ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन एरिया के भयावह आकार-प्रकार और उससे होने वाली जन समस्याओं को लेकर सरकार, खास कर मुख्यमंत्री पहले से ही सावधानीपूर्वक फैसले ले रहे थे।
पूरी तरह प्रामाणिक तथ्य तो नहीं है पर कहा जा रहा है रीजन का मुख्यालय इंदौर में भी रखने का प्रस्ताव बना है, हालांकि अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है।
एक के बाद एक जिस तरह चिट्ठियों के माध्यम से मुख्यमंत्री पर अपरोक्ष रूप से राजनीतिक हमले करने की कोशिश हुई, उससे लगता है मंत्री, नेताओं को इस प्रस्ताव की जानकारी लगी होगी और जैसी इंदौर की राजनीतिक तासीर है, उन्होंने मुख्यमंत्री को क्रेडिट न मिले, ऐसे दांव-पेंच खेले हो। जैसे बीते ढाई वर्ष से अजमाए जा रहे हैं।
एक के बाद एक पत्राचार भी इसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है ताकि इंदौर को लेकर क्रेडिट स्थानीय नेता अपने-अपने खाते में जमा कर सकें साथ ही यह संदेश भी दे पाएं कि वे अब भी ताकतवर है और जनहित में सरकार के फैसले बदलवा सकते हैं।
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