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नहीं थमेगा सियासी चक्रव्यूह का खेल: फिर होंगे मुख्यमंत्री पर ऐसे बड़े राजनीतिक हमले

KHULASA FIRST

संवाददाता

01 जुलाई 2026, 3:37 pm
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नहीं थमेगा सियासी चक्रव्यूह का खेल

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव हाल ही में हुए सियासी हमले से उबर भी नहीं पाए िक एक और हमला बोल दिया गया है। सरकार के नाम एक चिट्ठी सीधे ड्रोन से निशाने पर दाग दी गई। इससे फिर मप्र भाजपा की राजनीति में भूचाल जैसी स्थिति बन गई है। भूमि विवाद ठंडा भी नहीं हुआ था कि मुख्यमंत्री को फिर कठघरे में खड़ा कर दिया गया है। सवाल उनके ही अपने वरिष्ठ और ताकतवर मंत्री ने उठाए हैं।

राजनीति पर निगाह रखने वाले और कुछ वरिष्ठ नेता भी कह रहे हैं मुख्यमंत्री की राह आसान नहीं है। उनके सामने कोई बड़ा संकट भी खड़ा हो सकता है, जैसा हाल ही में हुआ और सरकार असहज हो गई। हो सकता है भविष्य में ऐसी किसी स्थिति से निपटना आसान न हो।

मुख्यमंत्री को पार्टी में ही भितरघात का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस तो है ही हमलावर। जानकार यह भी बताते हैं भूमि विवाद हमला राजनीतिक ड्रोन से इतना सटीक निशाना साधते हुए किया गया कि कुछ समय के लिए सरकार सवालों के घेरे में आ गई।

इस चक्रव्यूह की सफलता से भितरघातियों के हौसले बुलंद बताए जाते हैं। ऐसी स्थिति में विश्लेषक कहते है आगे की संभावनाओं पर विचार करें तो मुख्यमंत्री के लिए चुनौतियां बनी रहेंगी।

उनके अपने संगठन और मंत्री अपने लाड़ले मुख्यमंत्री को कठघरे में खड़ा करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ेंगे या फिर ऐसे अवसर पैदा करने के ऑपरेशन भी हो सकते हैं जिनसे मुख्यमंत्री की मुश्किलें इस बार की अपेक्षा और ज्यादा बढ़ जाए।

यह बाजारवाद के युग की भाजपा है इसलिए कुछ भी हो सकता है। हालात ऐसे भी हो सकते हैं कि संभाले ना संभल पाएं?

हाईकमान का साथ
2023 में सीएम पद की दौड़ में पीछे रह गए कई वरिष्ठ नेता अब भी सक्रिय राजनीति और मंत्रिमंडल में हैं। आगामी फेरबदल में वरिष्ठता को लेकर असहजता की जो चर्चा सामने आ रही हैं, वे संकेत हैं आंतरिक समीकरण पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं।

कुछ को अपने महत्वपूर्ण विभाग हाथ से चले जाने की चिंता भी है वही जिनके पास भारी-भरकम विभाग तो हैं लेकिन उनके हाथ ठाकुर की तरह बांध दिए गए हैं, इसलिए छटपटाहट बनी हुई है।

अब तक हर विवाद में हाईकमान ने मुख्यमंत्री के पक्ष में सार्वजनिक बयान दिए हैं, जिसे पिछड़ा वर्ग प्रतिनिधित्व और सामाजिक समीकरण साधने की रणनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है।

जब तक यह समर्थन बना रहता है, राजनीतिक हमलों का असर सीमित रहने की संभावना ज्यादा है। विपक्ष की सक्रियता भी कम नहीं होगी। कांग्रेस के पास साहसी और ऊर्जावान नेतृत्व है, इसलिए कोई भी मौका नहीं छोड़ रही है।

उसके हमले अक्सर सरकार को बेचैन करने वाले होते हैं। कांग्रेस नेताओं ने साफ किया है मुख्यमंत्री के भूमि घोटाले के मामले को आगे बढ़ाएगी इसलिए विपक्षी हमलों की पुनरावृत्ति की आशंका बनी रहेगी, भले ही उनका राजनीतिक असर सीमित हो।

कांग्रेस को दूसरा फायदा भाजपा की अंदरूनी और सत्ता संघर्ष से भी मिल सकता है। अपनी ही पार्टी और विपक्ष दोनों में डॉ. मोहन यादव और उनकी जमीन को लेकर यह विवाद कोई पहली बार नहीं सामने आया है। पहले भी अक्सर इस तरह के आरोप-प्रत्यारोप लगते रहे। पिछले सिंहस्थ मे भी ऐसा कुछ हुआ था।

कांग्रेस का इशारा किस ओर?
ताजा भूमि खरीद विवाद के दौरान भी कुछ हलकों में अपुष्ट कयास लगाए गए कि मीडिया रिपोर्ट को दस्तावेज या जानकारी देने वालों में प्रच्छन्न रूप से मुख्यमंत्री से नाराज चल रहे उनके मंत्री और नेताओं का कोई समूह है। एक विधायक को आगे कर हमला बोला गया।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी सार्वजनिक तौर पर बगैर नाम लिए इशारा किया प्रदेश से केंद्र में गए मंत्री ने ही यह मामला ‘प्लांट' किया होगा। ऐसे बयानों को सिरे से खारिज किया गया है। जो भी हो, मोहन अपने नाराज नेताओं का मन मोह क्यों नहीं पा रहे है?

सत्ता के भीतर लगातार संघर्ष के हालात दिन पर दिन गंभीर क्यों होते जाते हैं? क्या नेतृत्व योग्य नहीं है? बाहरी तौर पर इस तरह के कयास नॉरेटिव के रूप में सेट कर दिए गए हैं लेकिन वास्तविकता कहीं और खोजी जाना चाहिए।

इसकी जद में करीब ढाई वर्ष पहले दिसंबर 2023 का वह अप्रत्याशित घटनाक्रम बताया जाता है जिसमें डॉ. मोहन यादव को अचानक मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता सौंप दी गई। भाजपा के करीब आधा दर्जन वरिष्ठ नेताओं को यह घटनाक्रम ऐसे गहरे घाव दे गया, जो उनके इस जन्म में तो नहीं भरेगा क्योंकि सब सत्ता के प्रबल दावेदार थे। बताते हैं तब से अब तक सरकार और संगठनात्मक असंतुलन बरकरार है।

नया नहीं भूमि विवाद
गौर करने वाली बात है भूमि से जुड़ा विवाद डॉ. मोहन यादव के लिए नया नहीं है। जब वे शिवराज कैबिनेट में उच्च शिक्षा मंत्री थे, तब उज्जैन में सिंहस्थ के लिए आरक्षित करीब 50 हेक्टेयर भूमि के आवासीय उपयोग में बदलाव को लेकर विवादों में घिरे थे।

तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के हस्तक्षेप पर जमीन वापस कृषि भूमि की श्रेणी में डाली गई थी। उस दौर में इस फैसले का सबसे मुखर विरोध भाजपा के ही उज्जैन उत्तर से विधायक पारस जैन ने किया था, जो शिवराज कैबिनेट में कद्दावर मंत्री थे।

उज्जैन के तत्कालीन सांसद चिंतामणि मालवीय से भी डॉ. मोहन यादव की तनातनी की खबरें उस दौर में सामने आती रही थीं। कुछ महीना पहले, जैसा कहा गया था, मालवीय ने मजबूरी वश एक प्रेस कांफ्रेंस से सरकार को घेरने की कोशिश की थी।

कैबिनेट के ही एक वरिष्ठ मंत्री ने मालवीय को हाईकमान से मिलवाया था और बाकायदा इसके फोटो भी जारी किए गए थे। उस समय अटकलें लगाई गई थी कि इसके माध्यम से मुख्यमंत्री को सीधा लेकिन कठोर संदेश देने की कोशिश की गई। बताते हैं सारा झगड़ा सरकार में प्रभुत्व को लेकर है।

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