नर्मदा नदी पर गहराया संकट: बोतल से फिर बाहर आया आठ लेन एक्सप्रेस हाईवे का जिन्न
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
एक बार फिर आठ लेन का नर्मदा एक्सप्रेस हाईवे रूपी जिन्न बोतल से बाहर आता नजर आ रहा है। पहले इसे मध्य प्रदेश के चुनाव के समय बार-बार बाहर निकलवाया जाता रहा, अब उत्तर प्रदेश के चुनाव हैं।
नर्मदा किनारे उसके आसपास से बनाए जाने वाले इस हाईवे की खबरें फिर रिपीट हो रही हैं या करवाई जा रही हैं। यह हाईवे नर्मदा नदी और उसकी तमाम सहायक नदियों के लिए और पर्यावरण के साथ सांस्कृतिक व सामाजिक संकट का कारण बनेगा।
इसका कारण नदियों को जीवन देने वाले पेड़-पौधे, वन भूमि और खेती-किसानी की उपजाऊ जमीन तथा गांव बड़े पैमाने पर इस हाईवे के बनने से नष्ट हो जाएंगे।
फिलहाल अनुमान व्यक्त किया जा रहा है कि 40 से 50 हजार एकड़ खेती और जंगल की जमीन इस प्रोजेक्ट के लिए अधिग्रहित करके हमेशा के लिए नष्ट कर दी जाएगी। लगभग 1 हजार किलोमीटर क्षेत्र में दोनों ओर जनजाति समाज, ग्रामीण, नगरीय जनजीवन, हरियाली और खुशहाली देते हजारों पेड़-पौधे, जीव-जंतु, जो नर्मदा नदी की ऐतिहासिक और पौराणिक संपदा हैं, एक्सप्रेस हाईवे के कारण होने वाले असंतुलित तथाकथित विकास के कारण खत्म कर दिए जाएंगे।
नर्मदा नदी पर बने बड़े बांधों के कारण निमाड़ और बड़े भूभाग की जलवायु में वैसे ही अवांछनीय बदलाव आ रहा है। इस संकट को यह परियोजना और बढ़ा देगी। जलवायु परिवर्तन हर दिन बढ़ता जा रहा है।
जीडीपी के नाम पर शहर और उद्योग के लिए एक्सप्रेस हाईवे और नर्मदा का पानी देने के लिए नर्मदा प्रगति पथ हर तरीके से जुड़े हुए देश को जोड़ने के नाम पर बनाए जाने की खबरें आ रही हैं। शहरों से कनेक्टिविटी सामाजिक, आर्थिक प्रगति इसके फायदे हैं। इसके आगे योजनाकारों के पास बताने के लिए कुछ नहीं है, सिवाय इसके कि टोल टैक्स किस कठोरता से और कितना अधिक वसूला जाएगा।
वैसे भी नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया कृषि की उपजाऊ भूमि और जंगल की वन भूमि, ग्रीन फील्ड पर ही अपने एक्सप्रेस हाईवे बनाना पसंद करती है और विभाग के मंत्री हर सड़क को एक्सप्रेस हाईवे बनाने से कम पर राजी नहीं हैं।
पर्यावरण, सांस्कृतिक, सामाजिक परिणाम जो कुछ भी हों, सिर्फ कंक्रीट के जंगल खड़े करने वाले रियल एस्टेट बड़े-छोटे उद्योग, मेगा सिटी, एयरपोर्ट सरकार की प्रगति हैं।
इस सबके लिए पानी चाहिए। गुजरात के उद्योगों, कॉर्पोरेट घरानों, बड़े-बड़े कारोबारियों की लालची नजर तो मध्य प्रदेश की अब तक कुछ हद तक साफ-सुथरी और पवित्र पावन नदी नर्मदा के पानी पर बहुत पहले से है।
नर्मदा पर बड़े बांध इस खेल का एक बड़ा हिस्सा था। इसका सबसे बड़ा नुकसान मध्य प्रदेश को भुगतना पड़ा। नर्मदा के किनारे लंबे-चौड़े सड़क मार्ग इस खेल का दूसरा हिस्सा हैं।
नर्मदा प्रगति पथ नाम देकर बेचारी नर्मदा को भी छलने से केंद्र के सड़क मंत्री नहीं चुकते। करीब 180 करोड़ रुपए रोज का टोल टैक्स वसूलने का कारोबार करवा रहे मंत्री और उनकी सरकार ऐसा लगता है चीन के रास्ते पर चल रहे हैं।
इसी चक्कर में बनाए जाने वाले एक्सप्रेस हाईवे की प्रस्तावित लंबाई लगभग 906 किमी है और यह अमरकंटक से आलीराजपुर तक नर्मदा घाटी के समानांतर बनाया जाएगा। यह लगभग 30 राष्ट्रीय राजमार्गों और कई राज्य मार्गों को जोड़ने वाली परियोजना मानी जा रही है।
फिलहाल इसका अंतिम डीपीआर और अलाइनमेंट सार्वजनिक नहीं हुआ है, इसलिए भूमि अधिग्रहण और प्रभावित परिवारों की आधिकारिक संख्या अभी घोषित नहीं की गई है।
सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव...
यात्रा समय और ईंधन की खपत कम होगी। उद्योग, पर्यटन और कृषि विपणन को बढ़ावा मिलेगा। अमरकंटक, ओंकारेश्वर और महेश्वर जैसे धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों तक पहुंच आसान होगी। इस तरह की सुविधा तो वैसे ही उपलब्ध है।
हर जगह आसान पहुंच है, लेकिन एक्सप्रेस-वे के कारण इस सबके लिए कितनी बड़ी प्राकृतिक संसाधनों की कीमत चुकानी होगी, यह समझना और इसकी गणना के साथ दूरगामी प्रभाव आसान नहीं है।
योजनाकार शहर केंद्रित विकास से सबक नहीं लेते हुए विकास के खतरनाक प्रभाव वाले मॉडल पर काम करना पसंद करते हैं। इसे निवेश रोजगार जीडीपी आदि से जोड़ते हैं, लेकिन इससे कई गुना ज्यादा कीमत की समस्याओं का आकलन नहीं करते।
नर्मदा क्षेत्र के जिलों में निवेश और रोजगार की संभावनाएं बढ़ेंगी, लेकिन इस सबसे इन सबकी स्थिति इंदौर, उज्जैन, दिल्ली, मुंबई जैसे नारकीय जीवन वाले शहरों की तरह होगी, जहां पीने का शुद्ध पानी तक नहीं है, न ही शुद्ध हवा।
यदि परियोजना ग्रीनफील्ड स्वरूप में लागू होती है, तो किसानों की प्रमुख मांगें होंगी
उचित एवं बाजार आधारित मुआवजा। प्रभावित परिवारों का पुनर्वास। सर्विस रोड और अंडरपास। सिंचाई एवं खेतों तक पहुंच बनाए रखने की व्यवस्था। पर्यावरणीय क्षति की भरपाई के लिए व्यापक पौधारोपण और वन्यजीव संरक्षण उपाय।
यदि आप चाहें, तो मैं खरगोन, बड़वानी, महेश्वर, सनावद और बड़वाह क्षेत्र पर विशेष विश्लेषण भी तैयार कर सकता हूं कि इस एक्सप्रेस-वे से वहां किन गांवों की जमीन प्रभावित होने की सबसे अधिक संभावना है और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ सकता है।
कितनी जमीन का अधिग्रहण होगा?
अभी सरकार ने आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया है। हालांकि 6-लेन ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे के लिए सामान्यतः 70-90 मीटर चौड़ा राइट ऑफ-वे रखा जाता है।
906 किमी लंबे मार्ग के लिए अनुमानत: 6,500 से 8,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि की आवश्यकता पड़ सकती है। यानी 40 से 50 हजार एकड़ भूमि। इसमें अधिकांश कृषि भूमि होगी, जबकि कुछ वन भूमि भी प्रभावित होग। अंतिम संख्या डीपीआर के बाद ही स्पष्ट होगी।
कितने किसान और गांव प्रभावित होंगे?
इसका भी अभी आधिकारिक सर्वे पूरा नहीं हुआ है, लेकिन इतनी लंबी ग्रीनफील्ड परियोजना में हजारों किसानों की भूमि अधिग्रहित हो सकती है। सैकड़ों गांव आंशिक रूप से प्रभावित हो सकते हैं। जहां आबादी मार्ग में आएगी, वहां पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन की आवश्यकता होगी। अंतिम संख्या सामाजिक प्रभाव आकलन रिपोर्ट के बाद ही सामने आएगी।
पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव
कृषि भूमि और कुछ वन क्षेत्र का उपयोग बदल जाएगा। पेड़ों की कटाई और जैव विविधता पर असर पड़ सकता है। हाईवे के दोनों ओर तेजी से उद्योग-धंधे नगर आवास कॉलोनी और मेट्रो सिटी जैसे शहर बसा दिए जाएंगे। इससे निश्चित तौर पर नर्मदा नदी में हर तरह का प्रदूषण बढ़ेगा।
नर्मदा से अधिकाधिक पानी लिया जाएगा। हजारों एकड़ उपजाऊ भूमि खेती के लिए उपयोगी नहीं रहेगी। गांव खत्म हो जाएंगे। नगरों के अंदर समाहित होने से हमेशा के लिए समस्याओं के जाल में फंसे रहेंगे। वन्यजीवों के आवागमन में बाधा आने की आशंका रहेगी। निर्माण के दौरान धूल, शोर और प्रदूषण बढ़ेगा। नर्मदा घाटी के संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष पर्यावरणीय सावधानी की आवश्यकता होगी।
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