रिश्ते हुए शर्मसार: जिस मां ने चार बेटों को पाला; वही अंतिम संस्कार में नहीं पहुंचे, समाजसेवियों ने निभाया फर्ज दी मुखाग्नि
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
कहते हैं, मां का रिश्ता दुनिया में सबसे निस्वार्थ और मजबूत होता है। मां अपने बच्चों के लिए पूरी जिंदगी संघर्ष करती है, लेकिन इंदौर में सामने आई एक घटना ने इस रिश्ते की संवेदनाओं को झकझोर दिया।
चारों बेटे अंतिम संस्कार के लिए नहीं पहुंचे
जिस मां ने अपने चार बेटों को जन्म दिया, उनकी परवरिश की और अपनी जिंदगी की जमा पूंजी तक बच्चों के भविष्य के लिए लगा दी, उसी मां की मौत के बाद चारों बेटे अंतिम संस्कार के लिए नहीं पहुंचे।
13 सितंबर को हुई थी मौत
लता बाई की 13 सितंबर को मौत हो गई। इसके बाद तीन दिन तक इंतजार किया गया कि शायद उनके बेटे आएंगे, मां को आखिरी विदाई देंगे और मुखाग्नि देकर बेटे का फर्ज निभाएंगे। लेकिन इंतजार खत्म हो गया, कोई बेटा नहीं आया।
जिंदगीभर बच्चों के लिए जोड़ा, आखिरी समय में अपनों ने ही छोड़ दिया
लता बाई सिलिकॉन सिटी की गणेश रेसिडेंसी में रहती थीं। बताया जा रहा है कि उन्होंने अपनी जिंदगी की जमा पूंजी और जेवर तक बेचकर एक फ्लैट खरीदा था।
आरोप है कि बाद में यह फ्लैट बेटों के नाम करवा दिया गया और इसके बाद लता बाई को घर से बाहर कर दिया गया।
जिस घर को उन्होंने अपने खून-पसीने की कमाई से बनाया था, उसी घर से बेघर होकर वह सड़क पर भटकने को मजबूर हो गईं।
समाजसेवी ने दिया सहारा, वृद्धाश्रम बना आखिरी ठिकाना
सड़क पर लता बाई की हालत देखकर समाजसेवी संगठन प्रीयु फाउंडेशन के अजय नागदा को इसकी जानकारी मिली।
उन्होंने लता बाई को जानकी वृद्धाश्रम में आश्रय दिलाया। करीब आठ महीने तक लता बाई वृद्धाश्रम में रहीं।
इलाज के दौरान हुई थी मौत
वहां उन्हें सहारा मिला, अपनापन मिला और उन लोगों का साथ मिला, जिनसे उनका खून का रिश्ता नहीं था।
लेकिन आखिरकार उनकी तबीयत बिगड़ गई। उन्हें इलाज के लिए एमवाय अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
खबर बेटों तक पहुंची, लेकिन कोई नहीं आया
लता बाई के निधन की सूचना उनके चारों बेटों को दी गई। उम्मीद थी कि मां की मौत की खबर सुनकर शायद बेटे दौड़े चले आएंगे।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ। न कोई बेटा पहुंचा, न किसी ने अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाई।
तीन दिन तक इंतजार के बाद आखिरकार वही लोग आगे आए, जिन्होंने लता बाई के मुश्किल समय में उनका साथ दिया था।
जिनसे कोई खून का रिश्ता नहीं था, उन्होंने निभाया बेटे का फर्ज
जानकी वृद्धाश्रम और प्रीयु फाउंडेशन के सदस्यों ने लता बाई का अंतिम संस्कार कराया। जिन बेटों ने मां को आखिरी विदाई देने तक की जिम्मेदारी नहीं उठाई, उनकी जगह समाजसेवियों ने आगे बढ़कर बेटे का फर्ज निभाया।
यह सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की मौत की कहानी नहीं है। यह उस सवाल की कहानी है, जो शायद हर इंसान को भीतर तक झकझोर दे।
जिस मां ने बच्चों को जन्म दिया, उनके लिए अपनी जिंदगी की कमाई लगा दी… उसके जीवन का आखिरी सहारा भी उसके अपने बच्चे नहीं बन सके?
लता बाई चली गईं, लेकिन पीछे एक ऐसा सवाल छोड़ गईं, जिसका जवाब समाज को खुद से पूछना होगा। रिश्ते खून से बनते हैं या जिम्मेदारी और इंसानियत से?
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