सीईसी की लड़ाई राष्ट्रपति तक आई: ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के मुद्दे पर आज राष्ट्रपति से मिलेंगे इंडिया गठबंधन के नेता, समय मांगा
KHULASA FIRST
संवाददाता

जब मामला सुप्रीम कोर्ट में हो, तब जंतर-मंतर पर शक्ति-प्रदर्शन का औचित्य क्या?
अविश्वास का नया दौर, संस्थाओं की साख पर उठते सवाल और ‘संस्थागत अराजकता’ का बढ़ता खतरा
संवादहीनता का संकट, ‘कानून के शासन’ और ‘सड़क के शासन’ के बीच पिसती देश की राजधानी
न्यायिक प्रक्रिया के सम्मान और राजनीतिक शुचिता के बीच कहां खींची जाए लक्ष्मण रेखा?
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
जब मामला सुप्रीम कोर्ट में हो, तब जंतर-मंतर पर शक्ति-प्रदर्शन लोकतंत्र को मजबूत करता है या अराजकता को न्योता देता है? ये सवाल आज जन-जन की चर्चा का विषय है। देश की राजधानी दिल्ली की सड़कें इस समय एक अजीबोगरीब कश्मकश और तनाव की गवाह बन रही हैं।
एक तरफ देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति, कार्यप्रणाली और चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों से जुड़े संवेदनशील मामलों पर सुनवाई चल रही है, वहीं दूसरी तरफ देश के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के नेता राहुल गांधी और ‘इंडिया’ गठबंधन के सैकड़ों सांसद सड़कों पर उतरकर सीधे मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं।
इस स्थिति ने भारतीय राजनीति और न्यायशास्त्र के सामने एक बुनियादी और बेहद गंभीर यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है कि जब देश की शीर्ष अदालत किसी विवाद पर विचार कर रही हो, तब उसी मुद्दे को लेकर सड़कों पर इस तरह का हाई-ड्रामा और टकराव पैदा करना कहां तक न्यायसंगत है? क्या यह देश में एक ‘नई प्रकार की अराजकता’ या संस्थागत अविश्वास की शुरुआत है?
2 अक्टूबर से शुरू हुआ विपक्ष का ‘सड़क संग्राम’ शुक्रवार को राष्ट्रपति भवन की चौखट तक पहुंच रहा है। सत्तापक्ष जहां से मूवमेंट्स को देश में अराजकता फैलाने का प्रयास बता रहा है, तो विपक्ष इसे अपना जायज हक मुकर्रर कर रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए हमें दोनों पक्षों के तर्कों और लोकतांत्रिक मर्यादाओं की सीमाओं को कसौटी पर कसना होगा। पहले पक्ष का कहना है कि यह संस्थागत मर्यादाओं का उल्लंघन और अराजकता है?
सत्तारूढ़ दल और कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष का यह तरीका लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति गहरा अविश्वास और देश में एक प्रकार की संवैधानिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश है।
ये एक तरह से न्यायपालिका की अवमानना का संकेत है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने मामले को संज्ञान में ले लिया है और उस पर कानूनी प्रक्रिया चल रही है, तो सड़कों पर समानांतर अदालत लगाना न्यायपालिका की क्षमता और निष्पक्षता पर परोक्ष सवाल उठाने जैसा है।
दिल्ली पुलिस द्वारा बार-बार मना किए जाने के बावजूद प्रतिबंधित क्षेत्रों में जाना, बैरिकेड्स पर चढ़ना और हर दिन हिरासत का एक नया राजनीतिक इवेंट बनाना कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती खड़ी करता है।
भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस हार की हताशा में देश में ‘अराजकतावादी मानसिकता’ को बढ़ावा दे रही है। चुनाव आयोग को सार्वजनिक मंचों पर ‘कठपुतली’ या ‘चोर’ कहना बिना अंतिम कानूनी निष्कर्ष के जनता के बीच उस संस्था की विश्वसनीयता को हमेशा के लिए खत्म कर सकता है।
विपक्ष और आंदोलन के समर्थकों का तर्क है कि लोकतंत्र केवल बंद कमरों या अदालतों के कमरों तक सीमित नहीं रह सकता। कानूनी लड़ाई अपनी जगह है, लेकिन विपक्ष का प्राथमिक काम जनता के मुद्दों को सड़क पर उठाना है।
विपक्ष का मानना है कि अदालत में मामला होने का मतलब यह नहीं कि देश की मुख्य विपक्षी आवाज चुप होकर बैठ जाए। मीडिया रिपोर्ट्स में जब यह बात सामने आई कि खुद चुनाव आयोग के भीतर दो आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के कुछ फैसलों पर लिखित आपत्तियां जताई थीं, तो विपक्ष को लगा कि यह मामला सिर्फ कानूनी दांव-पेंच का नहीं, बल्कि सीधे-सीधे नैतिक और राजनीतिक शुचिता का है।
इस आंदोलन में जो बात सबसे ज्यादा चिंता पैदा करती है, वह है संवाद का पूरी तरह खत्म हो जाना। यदि विपक्ष को शिकायतें थीं, तो क्या चुनाव आयोग के साथ एक मेज पर बैठकर लंबी चर्चा के रास्ते बंद हो चुके थे?
और दूसरी तरफ क्या प्रशासन और पुलिस द्वारा जनप्रतिनिधियों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की जगह (जैसे जंतर-मंतर) से रोकना और बार-बार हिरासत में लेना जायज है? यह दोनों तरफ की जिद एक ऐसी स्थिति पैदा कर रही है, जहां देश में कानून के शासन की जगह ‘सड़क के शासन’ का आभास होने लगता है।
विपक्ष को आंदोलन करने का पूरा संवैधानिक अधिकार है, लेकिन उसे इस बात का ध्यान रखना होगा कि विरोध की भाषा और तरीका ऐसा न हो, जो देश में अराजकता का माहौल बनाए या न्यायपालिका के महत्व को कम करे।
अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर हैं। सबसे परिपक्व और उचित रास्ता यही होगा कि दोनों पक्ष संयम बरतें, दिल्ली की सड़कों को युद्ध का मैदान बनाने के बजाय सुप्रीम कोर्ट की कानूनी प्रक्रिया का सम्मान करें और उसके अंतिम फैसले को स्वीकार करने की लोकतांत्रिक परिपक्वता दिखाएं।
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