ममता बनर्जी के किले मेंं भाजपा ने बिछाई है जबरदस्त चुनावी बिसात
KHULASA FIRST
संवाददाता

नीरज कुमार दुबे स्वतंत्र पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
अगर पहली सूची पर नजर डालें तो वहां भी बड़े नामों की भरमार है। विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी को नंदीग्राम के साथ-साथ भवानीपुर से उतारकर पार्टी ने सीधे ममता बनर्जी को चुनौती दे दी है। दिलीप घोष, स्वपन दासगुप्ता, अग्निमित्रा पाल, रुद्रनील घोष और बंकिम चंद्र घोष जैसे चेहरे इस चुनाव को हाई वोल्टेज बना रहे हैं।
खास बात यह है कि इस बार पार्टी ने सिर्फ चर्चित चेहरों पर नहीं, बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं पर भी भरोसा दिखाया है। आउसग्राम से कलिता माजी जैसी साधारण पृष्ठभूमि की कार्यकर्ता को टिकट देना इसी रणनीति का हिस्सा है।
भाजपा ने सामाजिक समीकरणों पर भी खास ध्यान दिया है। अनुसूचित जाति और जनजाति सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारकर पार्टी ने अपने आधार को और व्यापक बनाने का प्रयास किया है। उत्तर बंगाल से लेकर दक्षिण तक हर क्षेत्र में संतुलन साधने की रणनीति साफ दिख रही है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पहली और दूसरी सूची जारी कर साफ संकेत दे दिया है कि इस बार वह आधी अधूरी तैयारी के साथ नहीं बल्कि पूरी ताकत, पूरी रणनीति और पूरी आक्रामकता के साथ मैदान में उतरी है। खासतौर पर दूसरी सूची में 111 उम्मीदवारों के नामों पर नजर डालने पर पता चलता है कि एक एक सीट पर गहरे मंथन के बाद उम्मीदवार तय किये गये हैं।
हम आपको बता दें कि हिंगलगंज से रेखा पात्रा, खड़दह से कल्याण चक्रवर्ती, सोनारपुर दक्षिण से रूपा गांगुली, मथाभांगा से निसिथ प्रमाणिक, चोपड़ा से शंकर अधिकारी, बैरकपुर से कौस्तव बागची, कमरहाटी से अरूप चौधरी जैसे नाम सीधे चुनावी मुकाबले को और दमदार बना रहे हैं। इसके अलावा एंटाली से प्रियंका तिबरेवाल और मणिकतला से तपस रॉय जैसे उम्मीदवार राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखते हैं।
अगर पहली सूची पर नजर डालें तो वहां भी बड़े नामों की भरमार है। विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी को नंदीग्राम के साथ-साथ भवानीपुर से उतारकर पार्टी ने सीधे ममता बनर्जी को चुनौती दे दी है। दिलीप घोष, स्वपन दासगुप्ता, अग्निमित्रा पाल, रुद्रनील घोष और बंकिम चंद्र घोष जैसे चेहरे इस चुनाव को हाई वोल्टेज बना रहे हैं।
खास बात यह है कि इस बार पार्टी ने सिर्फ चर्चित चेहरों पर नहीं बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं पर भी भरोसा दिखाया है। आउसग्राम से कलिता माजी जैसी साधारण पृष्ठभूमि की कार्यकर्ता को टिकट देना इसी रणनीति का हिस्सा है।
इस चुनाव का एक और बड़ा और चौंकाने वाला पहलू है पूर्व पुलिस आयुक्त डॉ. राजेश कुमार का राजनीति में प्रवेश। यह सिर्फ एक उम्मीदवार का नाम नहीं बल्कि भाजपा की रणनीतिक चाल है। डॉ. राजेश कुमार का प्रशासनिक अनुभव, वित्त और प्रबंधन में गहरी समझ और कानून व्यवस्था पर मजबूत पकड़ उन्हें एक अलग ही स्तर का नेता बनाती है। कोलकाता के पुलिस आयुक्त के रूप में उनका कार्यकाल, अपराध जांच विभाग और यातायात सुरक्षा जैसे अहम पदों पर उनकी भूमिका उन्हें आम नेता से अलग पहचान देती है।
उनकी छवि एक सख्त लेकिन न्यायप्रिय अधिकारी की रही है। मानव तस्करी के खिलाफ उनकी मुहिम और कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए किए गए काम उन्हें जनता के बीच भरोसेमंद चेहरा बनाते हैं।
भाजपा के लिए यह कदम इसलिए भी फायदेमंद है क्योंकि बंगाल में कानून व्यवस्था एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में एक पूर्व शीर्ष पुलिस अधिकारी का चुनावी मैदान में उतरना सीधे तौर पर संदेश देता है कि पार्टी व्यवस्था सुधारने के लिए गंभीर है।
राजनीतिक रूप से भी यह दांव गहरा है। डॉ. राजेश कुमार का प्रशासनिक और बौद्धिक कद भाजपा को उस वर्ग में भी मजबूती देगा जो अब तक तटस्थ रहा है।
उनकी कानूनी लड़ाइयों ने यह भी साबित किया है कि वह दबाव में झुकने वाले नहीं हैं। यह छवि भाजपा के लिए चुनाव में बड़ी पूंजी साबित हो सकती है।
इस चुनाव को और भावनात्मक और विस्फोटक बनाने वाला मुद्दा है आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना। उस दर्दनाक घटना ने पूरे बंगाल को झकझोर दिया था। अब पीड़िता की मां का राजनीति में आने का संकेत यह बता रहा है कि जनता के भीतर गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ है।
महिलाओं का सड़क पर उतरना, रात भर प्रदर्शन करना और न्याय की मांग करना तृणमूल सरकार के खिलाफ एक बड़ा जनमत बना चुका है। माना जा रहा है कि पीड़िता की मां ने भाजपा से पनिहाटी से टिकट मांगा है। भाजपा उन्हें उम्मीदवार बनाने पर विचार कर रही है क्योंकि पार्टी उस जनाक्रोश को राजनीतिक ऊर्जा में बदलने की कोशिश कर रही है। हम आपको बता दें कि पनिहाटी उन 38 सीटों में शामिल है जहां से भाजपा ने अब तक अपने उम्मीदवार घोषित नहीं किये हैं।
इसके अलावा भाजपा ने सामाजिक समीकरणों पर भी खास ध्यान दिया है। अनुसूचित जाति और जनजाति सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारकर पार्टी ने अपने आधार को और व्यापक बनाने का प्रयास किया है। उत्तर बंगाल से लेकर दक्षिण तक हर क्षेत्र में संतुलन साधने की रणनीति साफ दिख रही है।
इसके अलावा भाजपा अपने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, स्थानीय चेहरों को आगे लाने और ममता सरकार के खिलाफ जन असंतोष को वोट में बदलने की रणनीति भी बहुत पहले ही बना चुकी है और उसी के आधार पर चुनाव प्रचार चलाया जायेगा।
इसके अलावा, इस बार भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका बदला हुआ दृष्टिकोण है। पिछली बार जहां पार्टी पर बाहरी चेहरों पर ज्यादा भरोसा करने का आरोप लगा था, इस बार उसने जमीनी कार्यकर्ताओं और विचारधारा से जुड़े लोगों को प्राथमिकता दी है।
इससे कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ा है और संगठन ज्यादा मजबूत नजर आ रहा है। दूसरी तरफ तृणमूल सरकार पर कानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार जैसे आरोप लगातार भारी पड़ रहे हैं।
यही वजह है कि भाजपा पूरे दमखम के साथ यह दावा कर रही है कि इस बार बंगाल में सत्ता परिवर्तन तय है। बहरहाल, उम्मीदवारों की सूची, पूर्व पुलिस आयुक्त जैसे मजबूत चेहरे की भाजपा में एंट्री, जमीनी कार्यकर्ताओं पर भरोसा और जनता के गुस्से को सही दिशा देने की रणनीति ने भाजपा को इस चुनाव में बेहद मजबूत प्रतिद्वंद्वी और सत्ता का सबसे प्रबल दावेदार बना दिया है।
अब देखना यह है कि क्या यह रणनीति मतदान के दिन वोट में बदलती है या नहीं, लेकिन इतना तय है कि इस बार बंगाल की लड़ाई पहले से कहीं ज्यादा तीखी, ज्यादा धारदार और ज्यादा निर्णायक होने वाली है। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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