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थैंक्स टू चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया धर्मेंद्र प्रधान दिल्ली पुलिस गोदी मीडिया: व्यंग्यात्मक रिपोर्ट

Khulasa First

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संवाददाता

27 जुलाई 2026, 1:53 pm
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थैंक्स टू चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया धर्मेंद्र प्रधान दिल्ली पुलिस गोदी मीडिया

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से हो या फिर स्वतंत्र लेखन से... अगर इतिहास कभी लिखा गया, तो "कॉकरोच जनता पार्टी’ के उदय से लेकर उसकी ताकत खड़ी करने और देश और दुनिया के लोग और सरकारों का साथ में खड़े होना और इससे देश के युवाओं की ताकत बढ़ने और जनजागरण के पीछे जो कारण रहे, वे अपने आप में महत्वपूर्ण माने जाएंगे।

इसे कोई मूर्खतापूर्ण बकवास या ज्यादा होशियारी वाला लेखन कह सकता है, लेकिन यह तो मानना पड़ेगा कि यदि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, दिल्ली पुलिस, धर्मेंद्र प्रधान, केंद्र सरकार की मनमानी, उससे जुड़े हुए संगठनों और भाड़े वाला गोदी मीडिया जैसे निंदनीय कारक नहीं होते तो क्या यह आंदोलन इतने कम समय में इतनी बड़ी ताकत के साथ खड़ा हो पाता?

शायद नहीं। तो फिर क्यों नहीं चाहे व्यंग्य के रूप में, चाहे कटाक्ष के रूप में थैंक्स टू चीफ जस्टिस, थैंक्स टू धर्मेंद्र प्रधान, थैंक्स टू दिल्ली पुलिस, थैंक्स टू गोदी मीडिया और थैंक्स टू केंद्र सरकार व उसके भांति-भांति के हिंसक कहे गए संगठन के प्रति भी, चाहे लाठी-डंडे के साथ देना हो, थैंक्स देना चाहिए, क्योंकि भारतीय दर्शन कहता है जो भी होता है अच्छे के लिए होता है, तो इन सबके लिए थैंक्स बनता है। यह थैंक्स इन्हें आईना दिखाने के लिए भी जरूरी हो सकता है।

बात कॉकरोच जनता पार्टी और सोनम वांगचुक के आमरण उपवास और उसके सामने हिंसक हुई सरकार जिस तरह बाद में नतमस्तक हुई, इस पूरी कहानी का इतिहास जब भी लिखा और सुनाया जाएगा, वाकई में रोचक होगा।

इसकी एक बड़ी वजह यह है कि युवाओं को संगठित करने के लिए दुर्घटनावश अनायास और मजाक की कोख से कॉकरोच जनता पार्टी का जन्म हुआ। यह जन्म टेस्टट्यूब बेबी की तरह था।

जब एक टिप्पणी ने जगाई सोई हुई शक्ति
वह एक ऐसी टिप्पणी से हुआ, जिसमें युवाओं को कमजोर बताया, यानी युवा अपनी ताकत को शायद भूल गया और जब यह टिप्पणी आई तो उसे अपनी अपार शक्ति का एहसास हुआ और मजाक-मजाक में कॉकरोच जनता पार्टी बन गई। बाद में क्या हुआ, सबको मालूम है। तो उसका श्रेय पार्टी बनाने वाले को तो ठीक ही है। इसलिए इसका

श्रेय उसके संस्थापकों से कहीं ज्यादा उन लोगों को जाना चाहिए, जिन्होंने जाने -अनजाने में इसे जन्म दिया और ताकतवर भी बनाया। हो सकता है बेचारे यह सभी कारक खुद भी सरकार से ट्रस्ट हो चुके हैं और बुरे बनकर अच्छा करने की सोची-समझी कोशिश कर बैठें? लेकिन वास्तव में इस तरह मंगल पांडे बन पाना इतना आसान नहीं है।

विडंबना यह है कि जिन्होंने देश के युवाओं और उनके आंदोलन को कुचलने की कोशिश की, उन्होंने ही इसे सबसे ज्यादा शक्तिशाली बना दिया। इसलिए व्यवस्था की इन तमाम विसंगतियों, पुलिस की लाठियों, मंत्री की जिद और न्यायपालिका की तीखी टिप्पणियों को दिल से धन्यवाद, जिनकी बदौलत देश के युवाओं को अपनी सच्ची ताकत का अहसास हुआ और सरकार को आखिरकार जमीन पर आना पड़ा।

थैंक्स टू धर्मेंद्र प्रधान
सबसे पहले धन्यवाद देना चाहिए केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान को, जिनका इस्तीफा नहीं लिया गया, या यूं कहें कि उन्हें इस्तीफा देने से रोका गया होगा। धर्मेंद्र प्रधान की राष्ट्र के बजाय सरकार के प्रति स्वामी भक्ति ने आंदोलन की आग में घी डालने का काम किया।

मंत्री का पद पर बने रहना युवाओं के गुस्से का नीतिगत प्रतीक बन गया और पूरे देश का युवा एक साथ सरकार के खिलाफ एकजुट हो गया। अगर सरकार ने समय रहते उनकी बात सुन ली होती या मंत्री को हटा दिया होता, तो शायद मामला वहीं ठंडा पड़ जाता, लेकिन सरकार ने इस चिंगारी को दावानल बना दिया।

लाठी ने बना दिया वैश्विक आंदोलन

एक लाठी महात्मा गांधी की थी, जो सत्य, अहिंसा और न्याय का प्रतीक बनी और दूसरी लाठी लोकतांत्रिक सरकारों की पुलिस की है, जो हिंसा और खून-खराबे के रूप में ज्यादा पहचानी जाती है, बजाय सुरक्षा के। ऐसी ही लाठी दिल्ली पुलिस ने चलाई।

सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी के साथ भारतीय युवाओं पर अत्याचार की कहानी दुनियाभर में फैल गई।

दिल्ली पुलिस की लाठी ने ऐसा कमाल किया जो कोई राजनीतिक दल नहीं कर सकता था। युवा विद्यार्थियों के पुलिसिया अत्याचार के वीडियो जब सोशल मीडिया के जरिये दुनियाभर में पहुंचे, तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इसे प्रमुखता से कवर किया। अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप से लेकर कई देशों के विश्वविद्यालयों में भारतीय छात्रों और विदेशी नागरिकों ने भारतीय युवाओं के समर्थन में प्रदर्शन किए।

"विश्वगुरु’ और "दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकतवर सरकार और लोकतंत्र की रक्षक’ होने का दावा करने वाली सरकार की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी और भद् पिटी। चौतरफा आलोचना होने लगी। जब विदेश के राष्ट्र प्रमुखों और मीडिया ने आंखें तरेरीं, तो कूटनीतिक दबाव सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय तक जा पहुंचा। आखिरकार प्रधानमंत्री सक्रिय हुए और क्राइसिस मैनेजमेंट को अपने हाथों में ले लिया।

पुलिस के डंडों ने स्थानीय मुद्दे को रातोरात अंतरराष्ट्रीय हेडलाइन बना दिया। तो क्या पुलिस को थैंक्स नहीं करना चाहिए! हालांकि पुलिस का अत्याचार, सरकार की मनमानी सभ्य समाज के लिए खतरनाक है। पुलिस की किसी भी तरह की बर्बरता का

समर्थन कोई भी नहीं करेगा। आज की सरकारें अपना राजपाट बनाए रखने के लिए लाठी-डंडे, बट और बंदूक का सहारा लेती हैं।

गोदी मीडिया की करतूत से देश आक्रोषित
इस आंदोलन की आग को बुझाने के बजाय उसे पूरे देश में दावानल की तरह फैलाने में यदि किसी एक माध्यम ने सबसे निष्ठावान भूमिका निभाई, तो वह था हमारा वह खास मीडिया वर्ग, जिसे देशप्रेम की भाषा में ‘गोदी मीडिया' कहा जाता है।

जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवा अपने भविष्य, पेपर लीक और रोजगार के हक के लिए शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख रहे थे, तब इस मीडिया का एक बड़ा हिस्सा जमीनी मुद्दों पर बात करने से पूरी तरह कतरा रहा था।

शिक्षा की खस्ताहाली, बेरोजगारी के आंकड़ों और युवाओं की वास्तविक पीड़ा पर बहस करने के बजाय इन चैनलों ने स्टूडियो में बैठकर मनगढ़ंत और सरकार द्वारा प्रायोजित कहानियों का एक ऐसा मायाजाल बुना, जिसने इस आंदोलन को और अधिक धार दे दी।

युवाओं को बदनाम करने के कुत्सित प्रयास
इन चैनलों ने आंदोलनरत छात्रों को राष्ट्र विरोधी, आतंकवादी या किसी राजनीतिक दल के इशारे पर नाचने वाली कठपुतली साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हर दिन नए और बेबुनियाद आरोप लगाकर युवाओं के चरित्र पर कीचड़ उछाला गया।

20वीं सदी की तरह 21वीं सदी की शुरुआत इस देश के लिए संघर्ष और बलिदान से भरी है। बहुत कुछ बेहतर होते हुए भी जो कुछ सत्ता की मदहोशी में होता रहता है, वह अलोकतांत्रिक सरकार का अहसास कराता है। स्वतंत्र और पूरी तरह राष्ट्रवादी राष्ट्र होते हुए भी यह कुछ हद तक गुलाम देश के राजपाट की याद दिला देता है। 20वीं सदी में भी शुरुआत के दशकों में देश नए सिरे से संगठित हुआ। सत्य, अहिंसा, शांति और उपवास के साथ क्रांतिकारी युवाओं के आक्रामक आंदोलन और बलिदान ने देश को स्वतंत्र करवा दिया।

इधर, 21वीं सदी के तीन दशक पूरे होने वाले हैं, सरकार प्रजातांत्रिक है, देशवासियों की है, जैसी 1947 के बाद से अब तक रही, लेकिन हर सरकार का छिपा हुआ चरित्र काफी हद तक अलोकतांत्रिक नजर आता रहा है। चाहे कोई भी सरकार हो।

इस समय और इसके पहले 2012 में देश में भ्रष्टाचार, सरकार की गैर जवाबदेही आदि के कारण थके-हारे सुप्तावस्था में पड़े समाज में बड़ी मुश्किल से जनजागरण की क्रांति आई। यह कुछ समय के लिए रहती है, क्योंकि देश फिर से उदास, हताश होकर सुप्त अवस्था में चला जाता है।

21वीं सदी में हर कोई देशवासी अपने कंफर्ट जोन से बाहर नहीं आना चाहता। ऐसे में सत्ता की गलतियां और उसकी मनमानी के खिलाफ जनजागरण और राष्ट्रव्यापी जनआंदोलन खड़ा करना असंभव जैसा है। इसे सरकारें भी खूब समझती हैं और जनता के दिल-दिमाग को पढ़कर इसी तरह से खेल करती हैं।

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