लाखामंडल के घने जंगलों में मंदिर: जहां भीम और कुलमाता हिडिम्बा का हुआ था गांधर्व विवाह
KHULASA FIRST
संवाददाता

लाक्षागृह की आग से महाबली के विवाह तक: लाखामंडल का वो अनसुना देवदार वन, जहां रखी गई थी घटोत्कच के जन्म की नींव
जौनसार-बावर की कुलमाता: किताबों में नहीं, उत्तराखंड के इन ऊंचे पहाड़ों और हवाओं में आज भी जिंदा है हिडिम्बा का त्याग
कुरुक्षेत्र का रुख बदलने वाले ‘महायोद्धा’ का जन्मस्थान: जानिए देहरादून के सीमांत में स्थित हिडिम्बा की तपोस्थली का सच
देवदार के घने जंगलों के बीच अद्भुत काष्ठ शिल्प: लाखामंडल का ‘हिडिम्बा मंदिर’ जहां इतिहास और प्रकृति एक हो जाते हैं
घने वनों के बीच विवाह और वो एक कठिन शर्त, जब असुर सुंदरी के अनुराग पर मुग्ध हुए थे पांडव पुत्र भीम
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
यमुना तट के देवदार वनों में छिपा है वह द्वापरयुगीन कोना, जिसने लाक्षागृह की आग से बचे पांडवों को दी शरण; यहीं जन्मा था कुरुक्षेत्र का वो योद्धा, जिसने अर्जुन के लिए दे दी अपने प्राणों की आहुति।
देवभूमि उत्तराखंड की कंदराओं, नदियों और घने जंगलों का संबंध जितना वेदों और तपस्वियों से है, उतना ही गहरा नाता महाभारत काल की युगांतरकारी घटनाओं से भी है।
चमोली के बद्रीनाथ और रुद्रप्रयाग के केदारनाथ क्षेत्रों से इतर, देहरादून जिले का सीमांत जौनसार-बावर क्षेत्र अपने भीतर एक अलग और अत्यंत समृद्ध महाभारत कालीन इतिहास समेटे हुए है।
यमुना नदी के तट पर स्थित ‘लाखामंडल’ को अमूमन लोग दुर्योधन द्वारा रचे गए लाक्षागृह (लाख के महल) के रूप में जानते हैं, लेकिन इस ऐतिहासिक स्थल से सटे घने देवदार के जंगलों और पहाड़ों के बीच एक और बेहद महत्वपूर्ण पौराणिक कोना छिपा है हिडिम्बा देवी का प्राचीन मंदिर।
यह वही अलौकिक तपोस्थली है जहां कभी पांडव पुत्र महाबली भीम और कुलमाता हिडिम्बा का ऐतिहासिक मिलन हुआ था। आज भी यह जनजातीय क्षेत्र अपनी अनूठी परंपराओं, लोककथाओं और घने वनों के बीच उस द्वापरयुगीन प्रेम, त्याग और महाबली घटोत्कच के जन्म की गाथा को पूरी सजीवता के साथ संजोए हुए है।
लाक्षागृह की अग्नि से निकास और हिडिम्बा वन में पांडवों का आगमन... इस पौराणिक स्थल के महात्म्य की शुरुआत महाभारत के ‘आदिपर्व’ से होती है। जब दुर्योधन और शकुनि की साजिश के तहत पांडवों को जीवित जलाने के लिए लाखामंडल में लाक्षागृह बनाया गया था, तब महात्मा विदुर की सूझबूझ से पांडव एक गुप्त सुरंग के रास्ते जलते हुए महल से सुरक्षित बाहर निकल गए थे।
लाक्षागृह की उस भयानक आग से बचकर कुंती सहित पांचों पांडव आधी रात को उफनती हुई यमुना नदी को पार कर जौनसार-बावर के इन बेहद घने और अभेद्य जंगलों में पहुंचे।
उसी कालखंड में यह पूरा इलाका ‘हिडिम्बा वन’ के नाम से जाना जाता था, जहां हिडिम्ब राक्षस और उसकी बहन हिडिम्बा का राज था। मानवरहित और भयानक दिखने वाले इन देवदार के जंगलों में थककर जब माता कुंती और अन्य भाई सो रहे थे, तब महाबली भीम उनकी सुरक्षा के लिए पहरा दे रहे थे। उसी समय मानव गंध पाकर हिडिम्ब ने अपनी बहन हिडिम्बा को पांडवों का वध करने के लिए भेजा था।
भीम से सामना, असुर सुंदरी का अनुराग और ऐतिहासिक गांधर्व विवाह... जब हिडिम्बा पांडवों के समीप पहुंची, तो वह महाबली भीम के विशाल स्वरूप, तेज और अद्वितीय पराक्रम को देखकर उन पर मुग्ध हो गई। उसने राक्षसी रूप का परित्याग कर एक अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप धारण कर लिया और भीम के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा।
इसी बीच नरभक्षी हिडिम्ब राक्षस भी वहां आ धमका और भीम के साथ उसका भीषण द्वंद्व युद्ध हुआ, जिसमें भीम ने उसका वध कर इस क्षेत्र को भयमुक्त किया।
अपने भाई की मृत्यु के बाद हिडिम्बा ने माता कुंती से गुहार लगाई कि वह भीम को मन से पति रूप में स्वीकार कर चुकी है और यदि उसे ठुकराया गया तो वह अपने प्राण त्याग देगी। अंततः माता कुंती के आदेश और धर्मराज युधिष्ठिर की सहमति से, इस घने वन के गवाहों के बीच भीम और हिडिम्बा का ‘गांधर्व विवाह’ (प्रेम विवाह) संपन्न हुआ।
हालांकि, इस विवाह के लिए एक कठिन शर्त यह रखी गई थी कि भीम केवल संतान उत्पत्ति होने तक ही हिडिम्बा के साथ इस वन में समय बिताएंगे।
महाबली घटोत्कच का जन्म और कुरुक्षेत्र युद्ध की आधारशिला... इसी पावन तपोस्थली पर रहते हुए हिडिम्बा ने एक अत्यंत प्रतापी, पराक्रमी और मायावी पुत्र को जन्म दिया, जिसके सिर पर बाल न होने के कारण उसका नाम ‘घटोत्कच’ (घड़े जैसे सिर वाला) रखा गया।
घटोत्कच ने इसी जौनसार-बावर और लाखामंडल के जंगलों में अपनी माता की कठोर देखरेख में अस्त्र-शस्त्र और दिव्य मायावी शक्तियों का ज्ञान प्राप्त किया।
हिडिम्बा ने कड़े नीतिगत सिद्धांतों और राष्ट्रभक्ति के साथ अपने पुत्र का पालन-पोषण किया, जिसके कारण घटोत्कच आगे चलकर महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध में पांडवों के लिए सबसे बड़े संकटमोचक सिद्ध हुए। उन्होंने युद्ध के मैदान में तबाही मचाते हुए अंततः दानवीर कर्ण के अमोघ अस्त्र को अपने ऊपर झेलकर अर्जुन के प्राणों की रक्षा की थी।
इस प्रकार, लाखामंडल के जंगलों की यह तपोस्थली न केवल एक ऐतिहासिक विवाह की साक्षी बनी, बल्कि इसने महाभारत के युद्ध का रुख बदलने वाले एक महान योद्धा को भी संसार को दिया।
जनजातीय समाज की अगाध आस्था और जीवंत धरोहर... आज के दौर में जब कोई यात्री लाखामंडल के ऐतिहासिक शिव मंदिर के दर्शन करने के बाद जौनसार-बावर के ऊंचाई वाले गांवों की ओर बढ़ता है, तो देवदार के ऊंचे और घने वृक्षों के बीच हिडिम्बा देवी के प्राचीन काष्ठ (लकड़ी) और पत्थरों से बने भव्य मंदिर दिखाई देते हैं।
यहाँ की स्थानीय जौनसारी और बावर जनजातियां हिडिम्बा को केवल एक पौराणिक पात्र नहीं मानतीं, बल्कि उन्हें अपनी ‘कुलमाता’ और रक्षक देवी के रूप में अत्यंत श्रद्धा के साथ पूजती हैं। मंदिर की वास्तुकला पर पारंपरिक पहाड़ी शैली की नक्काशी देखने को मिलती है, जो सदियों पुरानी शिल्प कला का उत्कृष्ट उदाहरण है।
यहां के मेलों और त्योहारों के दौरान जब हिडिम्बा देवी की पारंपरिक डोली निकाली जाती है, तो उसे देखने पूरा क्षेत्र उमड़ पड़ता है। विज्ञान और आधुनिक इतिहास की नजर में यह भले ही सुदूर पहाड़ों का एक लोक-विश्वास हो, लेकिन देवभूमि के इस अनछुए और शांत कोने में कदम रखते ही हवाओं की सरसराहट और गगनचुंबी प्राचीन वृक्षों की मौजूदगी इस बात का अहसास करा देती है कि महाभारत का इतिहास आज भी इन वादियों में पूरी श्रद्धा के साथ धड़क रहा है। यह स्थल प्रकृति प्रेम और पौराणिक इतिहास के अद्भुत संगम के रूप में पाठकों के लिए एक अनिवार्य दर्शनीय कोना है।
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