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मजबूत नीतियां क्रियान्वयन की कठिन परीक्षा: विकसित भारत की राह

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संवाददाता

02 फ़रवरी 2026, 5:41 pm
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मजबूत नीतियां क्रियान्वयन की कठिन परीक्षा

आलोक मेहता वरिष्ठ पत्रकार खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
प्रधानमंत्री मोदी की सरकार की सबसे स्पष्ट पहचान उसके आर्थिक और संरचनात्मक सुधार रहे हैं। वस्तु एवं सेवा कर जीएसटी ने भारत को एक साझा राष्ट्रीय बाजार में बदला। शुरुआती कठिनाइयों के बावजूद आज जीएसटी को स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े कर सुधारों में गिना जाता है। दिवालियापन और ऋण शोधन अक्षमता संहिता ने बैंकिंग प्रणाली को नई दिशा दी और वर्षों से फंसे कर्ज़ की समस्या को सुलझाने का

संस्थागत रास्ता दिखाया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने भारत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दी है। संसद में प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 नए भारत की विकास यात्रा का एक सशक्त प्रमाण है, जो यह दर्शाता है कि 140 करोड़ भारतीयों के अथक परिश्रम और दृढ़ संकल्प से देश आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में निरंतर अग्रसर है।

वैश्विक उथल-पुथल के दौर में भी, हमारी नियंत्रित मुद्रास्फीति और सुदृढ़ व्यापक आर्थिक आधार इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत का भविष्य सुरक्षित हाथों में है। बेहतर बैलेंस शीट और निजी निवेश में उछाल के साथ भारत विनिर्माण और नवाचार के नए प्रतिमान स्थापित कर रहा है।

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता, डिजिटल क्रांति, आर्थिक सुधार, ये सब इसकी गवाही देते हैं। लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कृति में कमजोर क्रियान्वयन यह बताता है कि अब चुनौती नई योजनाओं की नहीं, बल्कि संस्थाओं को मज़बूत करने की है।

साल 2014 के बाद भारत के शासन, अर्थव्यवस्था और वैश्विक भूमिका में जो बदलाव देखने को मिला, वह केवल सरकार परिवर्तन नहीं था, बल्कि नीति, दृष्टि और राजनीतिक शैली का परिवर्तन था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने बीते एक दशक में ऐसे सामाजिक-आर्थिक सुधार लागू किए, जिनकी गूंज न केवल देश के भीतर बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी स्पष्ट रूप से सुनाई दी।

आज भारत को विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था, डिजिटल सार्वजनिक ढाँचे का वैश्विक मॉडल, और ग्लोबल साउथ की निर्णायक आवाज़ के रूप में देखा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक, G-20 संगठन, यूरोपीय संघ और वैश्विक निवेशक- सभी भारत की नीतिगत दिशा की सराहना कर रहे हैं, लेकिन इसी चमकदार तस्वीर के समानांतर एक कठोर और असहज सच्चाई भी मौजूद है।

शिक्षा, स्वास्थ्य और संस्कृति जैसे बुनियादी सामाजिक क्षेत्रों में नीतियों का क्रियान्वयन कमजोर, असमान और कई बार दिशाहीन दिखाई देता है। मंत्रालयों में महत्वपूर्ण पद लंबे समय से खाली हैं, राज्यों द्वारा योजनाओं को अपनाने में उदासीनता है और प्रशासनिक क्षमता बड़ी बाधा है।

प्रधानमंत्री मोदी की सरकार की सबसे स्पष्ट पहचान उसके आर्थिक और संरचनात्मक सुधार रहे हैं।वस्तु एवं सेवा कर जीएसटी ने भारत को एक साझा राष्ट्रीय बाज़ार में बदला। शुरुआती कठिनाइयों के बावजूद आज जी एस टी को स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े कर सुधारों में गिना जाता है।

दिवालियापन और ऋण शोधन अक्षमता संहिता ने बैंकिंग प्रणाली को नई दिशा दी और वर्षों से फँसे कर्ज़ की समस्या को सुलझाने का संस्थागत रास्ता दिखाया। मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत ने भारत को केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि वैश्विक उत्पादन केंद्र बनाने की सोच को मजबूती दी।

रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में इसके संकेत दिखने लगे हैं। डिजिटल इंडिया, आधार-जनधन-मोबाइल पेमेंट और यूपीआई ने शासन को आम नागरिक के हाथ तक पहुंचाया। आज भारत का डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर विश्व के लिए अध्ययन का विषय बन चुका है।

मोदी सरकार के हालिया और सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक निर्णयों में भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता एक ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है।यूरोपीय संघ विश्व का सबसे बड़ा संगठित उपभोक्ता बाज़ार है।

इस समझौते से भारतीय निर्यात को नई गति मिलेगी, निवेश और उच्च तकनीक भारत आएगी तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भारत की भूमिका मज़बूत होगीयह समझौता दर्शाता है कि भारत अब केवल नियमों का पालन करने वाला नहीं, बल्कि नियम गढ़ने वाला देश बनना चाहता है, लेकिन यह प्रश्न भी उतना ही ज़रूरी है क्या हमारी शिक्षा और कौशल प्रणाली इतनी मज़बूत है कि इन अवसरों का पूरा लाभ उठा सके?

स्वच्छ भारत अभियान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सार्वजनिक स्वास्थ्य और व्यवहार परिवर्तन का मॉडल माना गया।आयुष्मान भारत- विश्व की सबसे बड़ी सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना- नीति स्तर पर ऐतिहासिक है। पीएम किसान, जनधन योजना, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण ने बिचौलियों की भूमिका घटाई और शासन को अधिक पारदर्शी बनाया। इन योजनाओं की परिकल्पना और विस्तार पर दुनिया ने ध्यान दिया, लेकिन असली सवाल ज़मीनी असर का है।

नई शिक्षा नीति 2020 को स्वतंत्र भारत की सबसे महत्वाकांक्षी शिक्षा सुधार नीति कहा गया।लेकिन क्रियान्वयन के स्तर पर गंभीर समस्या बनी हुई हैं—शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च अभी भी वैश्विक मानकों से कम विश्वविद्यालयों और शिक्षा मंत्रालयों में हज़ारों पद रिक्त हैं, शिक्षक प्रशिक्षण और शोध ढाँचे में कमजोरी और राज्यों द्वारा केंद्रीय योजनाओं को अपनाने में ढिलाई बरती जा रही है।

पीएम श्री स्कूलों जैसी योजनाएं कागज पर प्रभावी हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कमजोर हैं। हाल के समय में यूजीसी के आरक्षण व भर्ती नियमों को लेकर बहस उभरी है। आरक्षण सामाजिक न्याय का संवैधानिक आधार है, इसमें कोई विवाद नहीं, लेकिन यह प्रश्न भी उठता है- क्या विश्वविद्यालयों में शैक्षणिक गुणवत्ता प्रभावित हो रही है?

क्या नियुक्तियों में देरी से पढ़ाई व शोध बाधित हो रहे हैं? विश्वस्तरीय विवि बनाने का सपना तभी साकार होगा, जब सामाजिक समावेशन और अकादमिक उत्कृष्टता साथ-साथ चलें।

मोदी सरकार ने देशभर में नए एम्स संस्थान स्थापित किए- यह ऐतिहासिक निर्णय है।लेकिन वास्तविकता यह है- कई एम्स में पूर्ण फैकल्टी नहीं, विशेषज्ञ डॉक्टरों और प्रोफेसरों की भारी कमी, उपकरण हैं, इमारतें हैं, लेकिन मानव संसाधन नहीं स्वास्थ्य नीति केवल भवनों से नहीं चलती।

डॉक्टर, नर्स और शोधकर्ता ही उसकी असली रीढ़ हैं। वैसे शिक्षा और स्वास्थय के कार्यक्रम राज्य सरकारों द्वारा क्रियान्वित होते हैं, लेकिन कई काम केंद्र सरकार से नियंत्रित हैं, पिछले वर्षों में केंद्रीय स्वास्थय मंत्री के पास भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारी रहने से प्राथमिकता संगठन और चुनाव रहे। अब आगे नई उम्मीद ही की जा सकती है।

शिक्षा और स्वास्थ्य के कार्यक्रमों, सुविधाओं में कांग्रेस काल से रही भ्रष्टाचार की बीमारी, समस्या के आरोपों में कमी नहीं हो पा रही है।

भारतीय संस्कृति, योग, आयुर्वेद विश्व में सराही जा रही है।लेकिन घरेलू स्तर पर स्थिति चिंताजनक है। संस्कृति मंत्रालय का हाल यह है कि पुस्तकालय, अभिलेखागार, संग्रहालय उपेक्षित हैं। सरकारी पुस्तकालय ज्ञान केंद्र की जगह उपेक्षित भवन बनते जा रहे हैं।

कलाकारों, लेखकों और शोधकर्ताओं के लिए योजनाएं कमजोर हैं और क्रियान्वयन ढीला है। मंत्रालय में निर्णय लेने की गति धीमी है, क्योंकि मंत्री को फुर्सत नहीं है। उन्हें पर्यटन मंत्रालय के साथ देश भर में प्रचार करना है। संस्कृति को केवल उत्सवों और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक सीमित कर देना दीर्घकाल में खतरनाक होगा।

राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन, जो देश की सरकारी लाइब्रेरियों की रीढ़ है- पिछले तीन वर्षों से सरकारी लाइब्रेरियों के लिए नई पुस्तकों की खरीद लगभग शून्य है। परिणाम स्पष्ट हैं पुस्तकालय ज्ञान केंद्र की जगह उपेक्षित भवन, नई पीढ़ी का पुस्तकों से दूरी भारतीय भाषाओं, इतिहास और विचार परंपरा को नुकसान ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की बात करते हुए यदि पुस्तकालय सूखे रहें, तो यह गंभीर विरोधाभास है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को तो शायद पर्याप्त जानकारी नहीं दी जाती या उन्हें गलत रिपोर्ट दी जाती है।

भारत का संघीय ढांचा विकास की कुंजी है, लेकिन कई राज्य राजनीतिक कारणों से योजनाएँ लागू नहीं करते। वित्तीय संकट राज्यों की क्षमता घटाता है। जिला और ब्लॉक स्तर पर प्रशासन कमजोर है, इसका सीधा असर शिक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ता है। मंत्रालयों में वरिष्ठ पद खाली राज्यों में निदेशालय कमजोर और विशेषज्ञ नियुक्तियों में देरी होती है।

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