हजारों पेंशनर्स को हाईकोर्ट से झटका: अतिरिक्त इंक्रीमेंट देने से इनकार; एक साथ पुरानी और नई वेतन व्यवस्थाओं का लाभ नहीं
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, जबलपुर।
मध्य प्रदेश के हजारों सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों को अतिरिक्त वेतनवृद्धि (इंक्रीमेंट) और बढ़ी हुई पेंशन की उम्मीद पर बड़ा झटका लगा है। जबलपुर हाईकोर्ट ने पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन की याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि जिन कर्मचारियों ने 1 जनवरी 2006 से संशोधित वेतनमान स्वीकार कर लिया था, वे अब पुरानी वेतन व्यवस्था के तहत अतिरिक्त इंक्रीमेंट का दावा नहीं कर सकते।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने कहा कि किसी कर्मचारी को एक साथ पुरानी और नई दोनों वेतन व्यवस्थाओं का लाभ नहीं दिया जा सकता।
क्या थी पेंशनर्स की मांग?
याचिकाकर्ता एसोसिएशन का तर्क था कि जिन कर्मचारियों की वार्षिक वेतनवृद्धि फरवरी से जून 2006 के बीच देय थी, उन्हें 1 जनवरी 2006 को पुरानी वेतन व्यवस्था के अनुसार एक अतिरिक्त इंक्रीमेंट दिया जाना चाहिए। इसके आधार पर वेतन और पेंशन का पुनर्निर्धारण कर वर्षों का बकाया ब्याज सहित देने की मांग की गई थी।
एसोसिएशन ने यह भी दलील दी कि केंद्र सरकार तथा उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्यों ने अपने कर्मचारियों को ऐसा लाभ दिया है, इसलिए मध्य प्रदेश के कर्मचारियों को भी समान सुविधा मिलनी चाहिए।
कोर्ट ने क्यों ठुकराई मांग?
हाईकोर्ट ने कहा कि मध्य प्रदेश वेतन पुनरीक्षण नियम, 2009 के तहत कर्मचारियों को स्पष्ट विकल्प दिया गया था। वे चाहें तो 1 जनवरी 2006 से संशोधित वेतनमान स्वीकार कर तत्काल उसका लाभ लें या फिर अगली वेतनवृद्धि तक पुरानी व्यवस्था में बने रहें और बाद में नया वेतनमान चुनें।
अदालत ने कहा कि जब किसी कर्मचारी ने स्वेच्छा से संशोधित वेतनमान का विकल्प चुन लिया, तो उसने पुरानी व्यवस्था के तहत मिलने वाली अंतरिम वेतनवृद्धि का लाभ छोड़ दिया। ऐसे में वर्षों बाद उसी लाभ की मांग करना नियमों के विपरीत होगा और इससे दोहरी सुविधा मिलने की स्थिति पैदा होगी।
नियम-9 को बताया पूरी तरह वैध
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि मध्य प्रदेश वेतन पुनरीक्षण नियम, 2009 का नियम-9 न तो मनमाना है और न ही संविधान के अनुच्छेद-14 का उल्लंघन करता है। यह नियम सभी कर्मचारियों पर समान रूप से लागू होता है और सभी को समान विकल्प प्रदान करता है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वेतन पुनरीक्षण सरकार का नीतिगत निर्णय है। जब तक उसमें कोई स्पष्ट संवैधानिक या कानूनी खामी न हो, न्यायालय उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
सरकारी छूट अलग विषय
कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि यदि किसी राज्य सरकार ने विशेष परिस्थितियों में प्रशासनिक निर्णय लेकर अतिरिक्त इंक्रीमेंट का लाभ दिया है, तो वह एक अलग विषय है। उसे सभी कर्मचारियों का कानूनी अधिकार नहीं माना जा सकता।
इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन की रिट याचिका को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया। यह फैसला उन हजारों पेंशनर्स के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो अतिरिक्त इंक्रीमेंट के आधार पर पेंशन और एरियर में बढ़ोतरी की उम्मीद कर रहे थे।
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