ना रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी: बेहतर और कारगर साबित होंगे दो मेट्रोपॉलिटन एरिया
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नियोजित, नियंत्रित, पर्यावरण अनुकूल, सरल, आसान और सुशासन वाला विकास ( इसमें सस्टेनेबल या सनातन विकास के लिए जगह नहीं है) करने के लिए सरकार ने विलक्षण प्रतिभा वाले ब्यूरोक्रेट्स और प्लानर्स के भरोसे उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन एरिया (यूआईएमआर) हवन तो शुरू कर दिया, लेकिन हाथ जलने जैसी स्थिति हो रही है।
रहस्य, रोमांच और अद्भुत विकास से लबालब उज्जैन-इंदौर मेट्रोपॉलिटन एरिया मुख्यालय के कारण सरकार के लिए मुसीबत बन गया है। सरकार ने मुख्यालय उज्जैन घोषित किया तो इंदौर में विरोध शुरू हो गया। विरोध अभी शहर में है,गांव-गांव से भी जब विरोध होगा, तब कैसी स्थिति निर्मित होगी? यह सरकार के लिए विचारणीय होना चाहिए।
ऐ सा इसलिए कि इंदौर के मतलबपरस्त विधायक और मंत्री ऐसे गंभीर विषय पर हमेशा की तरह शुतुरमुर्गी मुद्रा में मुख्यमंत्री को कमजोर करने के साथ उनकी मुसीबतें बढ़ाने का काम सुनियोजित करते हैं तब सांसद को आगे आना होता है।
सरल, सहज, सौम्य और जनहितैषी सांसद शंकर लालवानी ने मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखकर निवेदन किया है कि मुख्यालय इंदौर में रखना हर दृष्टि से बेहतर होगा। लालवानी तभी कुछ कहते हैं, जब मामला गंभीर हो सकता है।
जनता के बीच भी यह विषय तेजी से चर्चा में आ गया है। हो सकता है स्थिति सिविल सोसायटी के साथ जनप्रतिनिधियों को भी आंदोलित कर दे। मुख्यमंत्री के लिए ऐसी विकट स्थिति निर्मित न हो, इसके लिए सबसे बेहतर विकल्प दो मेट्रोपॉलिटन एरिया हैं।
सरकार वास्तव में सस्टेनेबल डेवलपमेंट की पक्षधर है तो दो मध्य भूभाग वाले मेट्रोपॉलिटन एरिया बनाए यानी मेट्रोपॉलिटन एरिया इंदौर और उज्जैन दो स्वतंत्र छोटे एरिया। जब देश छोटे राज्यों की अवधारणा पर काम कर रहा है, प्रदेश छोटे-छोटे जिलों का गठन कर रहा है, दुनिया नैनो टेक्नोलॉजी के युग में जा रही है, तब दानवाकर मेट्रोपॉलिटन एरिया किसी भी सरकार से संभाले नहीं संभलेगा। इंदौर हो या उज्जैन पहले ही ज्वलंत उदाहरण हैं।
कई कठिनाई पैदा करेगा यूआईएमआर...वर्तमान में घोषित यूआईएमआर कई कठिनाइयों को लेकर आएगा। हर काम के लिए दूरदराज गांवों के किसान, ग्रामीण, मजदूर, महिला, बच्चों, आदिवासी सबको उज्जैन के चक्कर लगाने पड़ेंगे।
पटवारी, तहसीलदार, एसडीएम, कलेक्टर और कमिश्नर कार्यालय की परिक्रमा करते-करते जनता की पीढ़ियां खप जाती हैं, लेकिन फाइल आगे नहीं बढ़ती, न रुके हुए फैसले सुनाए जाते हैं। कई व्यावहारिक समस्याएं इंदौर, उज्जैन संभाग की जनता का सुख-चैन छीन लेंगी।
विशेषज्ञ भी सहमत नहीं...प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तावित यूआईएमआर क्षेत्र को राज्य के विकास का नया इंजन बताया जा रहा है लेकिन जानकार कहते हैं यह इंजन जनता का धुआं निकाल देगा।
विकास के कल्पना लोक में महाकाल लोक से ओंकारेश्वर लोक और अहिल्या लोक तक विचरण करने वाली सरकार इसे मालवा क्षेत्र की आर्थिक शक्ति, औद्योगिक क्षमता और शहरी विस्तार को एकीकृत करने वाली महत्वाकांक्षी परियोजना के रूप में प्रस्तुत कर रही है, लेकिन क्या अत्यधिक विशाल भौगोलिक क्षेत्र को एक ही प्रशासनिक इकाई में समेटना वास्तव में विकास का सर्वोत्तम मॉडल है?
यह सवाल विशेषज्ञ लोग उठा रहे हैं। प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश-दुनिया में प्रशासनिक सुधारों का वर्तमान रुझान बड़े ढांचों को और बड़ा बनाने नहीं, बल्कि अधिक विकेंद्रीकृत, स्थानीय और जवाबदेह बनाने का है।
जिले छोटे हो रहे हैं तो महानगर क्षेत्र इतना बड़ा क्यों?...दो दशकों में भारत में नए राज्यों और नए जिलों के गठन की प्रक्रिया लगातार चली है। तर्क यही रहा कि छोटी प्रशासनिक इकाइयां जनता के अधिक निकट होती हैं, निर्णय तेजी से होते हैं और विकास का लाभ अधिक समान रूप से पहुंचता है।
प्रदेश स्वयं बड़े जिलों को विभाजित कर नए छोटे जिलों का निर्माण कर चुका है। यदि प्रशासनिक दक्षता का सिद्धांत छोटे जिलों के लिए लागू होता है, तो फिर इंदौर और उज्जैन संभागों को मिलाकर एक विशाल महानगर क्षेत्र बनाने का औचित्य पुनर्विचार योग्य है।
दो क्षेत्र अधिक व्यावहारिक विकल्प...यूआईएमआर को लेकर सरकार और नौकरशाही का प्रमुख तर्क यह प्रतीत होता है बड़ा महानगर क्षेत्र बनने से परिवहन, एक्सप्रेस-वे, रेल मार्ग, एयरपोर्ट, औद्योगिक कॉरिडोर और शहरी विकास की समग्र योजना बनाना आसान होगा।
नियंत्रित नियोजित विकास भी होगा वगैरह। जाहिर है इस सब का कोई ज्यादा मतलब नहीं है लेकिन क्या यह तर्क पूरी तरह सही है? शहरी नियोजन विशेषज्ञों का मानना है एकीकृत योजना और विशाल प्रशासनिक क्षेत्र बिल्कुल अलग-अलग हैं।
बड़े क्षेत्र में प्रशासनिक व्यवस्थाएं हमेशा असफल साबित होती हैं। दुनिया के अनेक देशों में छोटे-छोटे महानगर क्षेत्र और स्थानीय निकाय होते हुए भी परिवहन, जल प्रबंधन, औद्योगिक विकास और पर्यावरण संरक्षण की साझा योजनाएं सफलतापूर्वक लागू की जाती हैं। वास्तव में एक्सप्रेस-वे, रेलवे, एयरपोर्ट और औद्योगिक कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं राज्य और केंद्र सरकार के स्तर पर बनती हैं। इनके लिए विशाल महानगर क्षेत्र बनाना अनिवार्य नहीं है।
विशेषज्ञों के अनुसार बड़ा महानगर क्षेत्र अक्सर प्रशासनिक केंद्रीकरण, ग्रामीण क्षेत्रों से विमुख रहता है। कृषि भूमि पर दबाव और पर्यावरणीय असंतुलन का कारण भी बन जाता है।
इसके विपरीत छोटे महानगर क्षेत्र स्थानीय जरूरतों के अनुसार तेजी से निर्णय लेने और बेहतर जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं।
बड़े महानगर क्षेत्र के साथ असली प्रश्न यह है योजना कितनी वैज्ञानिक, समन्वित और जन-केंद्रित है। समन्वय की इच्छा हो तो दो महानगर क्षेत्र भी साझा परिवहन, जल, निवेश और पर्यावरण नीति के तहत काम कर सकते हैं इसलिए इंदौर–उज्जैन महानगर क्षेत्र पर बहस केवल सीमाओं की नहीं, बल्कि विकास के मॉडल की होनी चाहिए।
दोराहे पर जनता
क्या मप्र केंद्रीकृत विकास का रास्ता चुनेगा या विकेंद्रीकृत और संतुलित विकास का? यही सवाल असहाय जनता के सामने खड़ा है। किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य जनता की सुविधा होना चाहिए।
इसका अभाव मध्य प्रदेश में वर्षों से बना हुआ है ऐसे में विशाल महानगर क्षेत्र कैसे कारगर साबित होगा। मुख्यालय इंदौर होगा तो उज्जैन संभाग के दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों को लंबी दूरी तय करना होगी।
हर काम के लिए भ्रष्ट सरकारी तंत्र की विकेट निर्णय प्रक्रिया से गुजरना होगा। उज्जैन में होगा तो यही समस्या इंदौर क्षेत्र के लिए होगी। ऐसे में सामान्य ज्ञान कहता है दो महानगर क्षेत्रों मेंस्था नीय समस्याओं का समाधान तेजी से होगा। क्षेत्रीय प्राथमिकताओं के अनुसार बजट आवंटन संभव होगा। नागरिक भागीदारी बढ़ेगी। प्रशासन अधिक जवाबदेह होगा।
वैश्विक अनुभव क्या कहते हैं?
दुनिया के अनेक सफल शहरी क्षेत्रों ने विकेंद्रीकृत मॉडल अपनाया है। एक विशाल प्रशासनिक ढांचे के बजाय कई क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण बनाए गए हैं, ताकि स्थानीय आवश्यकताओं और पर्यावरणीय संतुलन के बीच सामंजस्य बना रहे। 21वीं सदी का शहरी विकास केवल कंक्रीट और निवेश का प्रश्न नहीं है। यह जल,जंगल सनातन संस्कृति हरियाली, कृषि, संस्कृति और स्थानीय समुदायों के संरक्षण का भी प्रश्न है।
सरकार के लिए विचारणीय तथ्य
प्रदेश सरकार यदि वास्तव में ‘सनातनी ग्राम केंद्रित विकसित मप्र’ का मॉडल प्रस्तुत करना चाहती है, तो उसे केवल आर्थिक विस्तार नहीं बल्कि टिकाऊ और संतुलित विकास पर भी ध्यान देना होगा।
यूआईएमआर को दो स्वतंत्र क्षेत्रों—इंदौर मेट्रोपॉलिटन रीजन और उज्जैन मेट्रोपॉलिटन रीजन में विभाजित करने का प्रस्ताव केवल प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं, बल्कि सुशासन, पर्यावरण संरक्षण, जल सुरक्षा और संतुलित क्षेत्रीय विकास की दिशा में एक दूरदर्शी कदम साबित हो सकता है।
कुल मिलाकर बड़ा हमेशा बेहतर नहीं होता। कई बार बेहतर वही होता है जो जनता के करीब, पर्यावरण के अनुकूल और प्रशासनिक रूप से अधिक उत्तरदायी हो।
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