मांग से इतना अधिक यूरिया मिला: फिर भी किसान कतारों में; खरीफ सीजन में इतने टन डीएपी की कमी बनी बड़ी चुनौती
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
खरीफ सीजन में हर साल खाद वितरण केंद्रों पर किसानों की लंबी कतारें और हंगामे की तस्वीरें सामने आती हैं। सरकार लगातार दावा करती है कि प्रदेश में खाद की कोई कमी नहीं है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है।
संसद में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री जेपी नड्डा द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों से पता चलता है कि मध्यप्रदेश को इस बार यूरिया की मांग से कहीं अधिक आपूर्ति मिली, जबकि DAP (डाई-अमोनियम फॉस्फेट) की कमी किसानों के लिए सबसे बड़ी परेशानी बनकर उभरी।
मांग 9.61 लाख टन, आपूर्ति 14.17 लाख टन यूरिया
संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार, 19 जुलाई 2026 तक खरीफ सीजन के लिए मध्यप्रदेश को 9.61 लाख मीट्रिक टन यूरिया की आवश्यकता थी। इसके मुकाबले केंद्र सरकार ने 14.17 लाख मीट्रिक टन यूरिया उपलब्ध कराया। यानी राज्य को आवश्यकता से करीब 47 प्रतिशत (लगभग 4.56 लाख टन) अधिक यूरिया मिला।
इसके बावजूद कई जिलों में किसानों को यूरिया के लिए लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ा। इससे खाद वितरण और स्थानीय प्रबंधन व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
DAP की 52 हजार टन कमी ने बढ़ाई मुश्किलें
यूरिया की पर्याप्त उपलब्धता के विपरीत, DAP की आपूर्ति मांग से काफी कम रही।
मांग: 3.57 लाख मीट्रिक टन
आपूर्ति: 3.05 लाख मीट्रिक टन
कमी: लगभग 52 हजार मीट्रिक टन
बुवाई के सबसे महत्वपूर्ण समय में DAP की कमी के कारण प्रदेशभर की सहकारी समितियों और खाद केंद्रों पर किसानों की भीड़ उमड़ी और कई स्थानों पर विवाद एवं अव्यवस्था की स्थिति भी देखने को मिली।
NPKS खाद रहा सरप्लस
संसद में पेश आंकड़ों के मुताबिक NPKS उर्वरक की स्थिति DAP से बिल्कुल अलग रही।
मांग: 4.21 लाख मीट्रिक टन
आपूर्ति: 6.67 लाख मीट्रिक टन
सरप्लस: 2.46 लाख मीट्रिक टन
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को NPKS जैसे संतुलित उर्वरकों के उपयोग के लिए अधिक जागरूक किया जाए, तो DAP पर निर्भरता कम की जा सकती है।
कैसे तय होती है खाद की आपूर्ति?
केंद्र सरकार के अनुसार, फसल सीजन शुरू होने से पहले कृषि एवं किसान कल्याण विभाग (DA&FW) राज्यों के साथ चर्चा कर माहवार खाद की आवश्यकता तय करता है। इसके आधार पर उर्वरक विभाग राज्यवार आवंटन जारी करता है।
रेलवे के माध्यम से खाद की रैक राज्यों तक पहुंचाई जाती हैं, जबकि उनकी निगरानी इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मैनेजमेंट सिस्टम (iFMS) पोर्टल से की जाती है। केंद्र और राज्यों के अधिकारियों के बीच नियमित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आपूर्ति की समीक्षा भी होती है।
राज्य के जिम्मे होता है अंतिम वितरण
संसद में दिए गए जवाब के अनुसार, केंद्र सरकार की जिम्मेदारी खाद को राज्य तक उपलब्ध कराना है। इसके बाद जिलों, ब्लॉकों और सहकारी समितियों तक समय पर और पारदर्शी वितरण सुनिश्चित करना संबंधित राज्य सरकार और स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी होती है। ऐसे में मांग से अधिक यूरिया उपलब्ध होने के बावजूद किसानों का घंटों कतारों में खड़ा रहना स्थानीय वितरण व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
यूरिया उत्पादन में भी अग्रणी है मध्यप्रदेश
2022-23: 22.37 लाख मीट्रिक टन (रिकॉर्ड उत्पादन)
2025-26: 19.73 लाख मीट्रिक टन उत्पादन
2026-27 (जून 2026 तक): 5.40 लाख मीट्रिक टन उत्पादन
देश में बढ़ी यूरिया उत्पादन क्षमता
यूरिया आयात पर निर्भरता कम करने के लिए केंद्र सरकार ने 2014 के बाद कई नई उत्पादन इकाइयां शुरू की हैं। रामागुंडम (तेलंगाना), गोरखपुर (उत्तर प्रदेश), सिंदरी (झारखंड), बरौनी (बिहार), पानागढ़ (पश्चिम बंगाल) और गड़ेपान-III (राजस्थान) में नए संयंत्र स्थापित किए गए हैं। इसके चलते देश की कुल यूरिया उत्पादन क्षमता 2014-15 के 207.54 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 2026-27 में 269.42 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गई है। इसके अलावा तालचेर (ओडिशा) और नामरूप (असम) में भी नए संयंत्र विकसित किए जा रहे हैं।
विशेषज्ञों की सलाह
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि DAP की सीमित उपलब्धता को देखते हुए किसानों को केवल DAP पर निर्भर रहने के बजाय NPKS जैसे संतुलित उर्वरकों के उपयोग के प्रति जागरूक किया जाना चाहिए। इससे न केवल पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग होगा, बल्कि खाद संकट जैसी स्थितियों से भी काफी हद तक राहत मिल सकेगी।
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