‘गूंज’ का अधूरा उत्तर नहीं सुनाई दी राहुल के मन की बात
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर में आयोजित कांग्रेस नेता राहुल गांधी के चर्चित ‘छात्रों की गूंज’ (पांचवें संस्करण) कार्यक्रम ने राजनीतिक गलियारों और युवाओं के बीच व्यापक चर्चा को जन्म दिया। नौजवानों की भीड़ का जुटना और हताश मृतप्राय: कांग्रेस में फिर से वही ऊर्जा का संचार और व्यापक प्रचार-प्रसार इस बहाने मिलना इस आयोजन की सफलता जरूर है। कांग्रेस के क्षेत्रीय वोट बैंक के समीकरण को फिर से ठीक-ठाक करने में भी आयोजन महत्वपूर्ण हो सकता है।
इस आयोजन में जुटी भारी भीड़ यह साबित करने के लिए काफी थी कि आज का युवा शिक्षा, पारदर्शी परीक्षा प्रणालियों, भ्रष्टाचार और रोजगार के मुद्दों को लेकर कितना संवेदनशील और मुखर है। इस पीढ़ी को वाकई एक बेहतर और ठोस नेतृत्व के साथ मजबूत व साफ-सुथरे सिस्टम की जरूरत है और उसी की तलाश में जेन-जी भटक रही है। उसके भटकाव को दिशा कैसे मिले यह बड़ा सवाल है और इसकी पहल इंदौर के इस आयोजन में हो सकती थी, जो नहीं हो पाई।
आयोजन के बाद राजनीतिक विश्लेषकों, जानकारों और खुद छात्रों के एक बड़े वर्ग द्वारा इस पर जो प्रतिक्रियाएं और समीक्षाएं सामने आई हैं, वे एक गंभीर आत्ममंथन की मांग करती हैं। कार्यक्रम को लेकर विद्यार्थियों और युवाओं के बीच एक मिला-जुला और वैचारिक मंथन का दौर शुरू हो गया है। इसे आयोजन की सफलता कहा जा सकता है। वहीं विद्यार्थियों का एक बड़ा वर्ग मान रहा है कि इस आयोजन से जैसी उम्मीदें जुड़ी थीं कि राहुल गांधी युवाओं में नई ऊर्जा का संचार करेंगे और शिक्षा, रोजगार व पेपर लीक जैसे मूल विषयों पर विस्तार से एवं ठोस रोडमैप के साथ बात करेंगे। वैसा प्रभावी असर देखने को नहीं मिला। गूंज में जैसे प्रश्न थे, वैसे उनके उत्तर नहीं मिले, जिनकी तलाश थी। यह अधूरापन खल रहा है।
नौजवान जेन-जी ने सोचा था कि इतने बड़े पैमाने पर संसाधन झोंककर किए गए मेगा इवेंट में राहुल गांधी गंभीर विषयों पर गहरी बात करेंगे। वन-टू-वन के साथ क्राउड से भी बात करेंगे। ऐसा हुआ नहीं। कारण जो भी रहा हो या फिर जैसा उन्हें बताया गया हो या जैसे स्क्रिप्ट दी गई हो, उतने तक वह सीमित रहे। उनके मौलिक विचार प्रकट नहीं हुए। देश के नेतृत्व के विकल्प के रूप में प्रोजेक्ट हो रहे राहुल गांधी उस विकल्प के अनुरूप उनकी विचार अभिव्यक्ति क्यों महसूस नहीं हो पाई, यह सवाल मौजूद है।
गंभीरता और निरंतरता
सांकेतिक राजनीति या तात्कालिक व्यंग्यों के जाल में फंसने के बजाय यदि लगातार और आक्रामक तरीके से केवल छात्र-हितैषी कानूनों (जैसे सख्त एंटी-पेपर लीक कानून) की मांग पर फोकस रखा जाए, तो एक अधिक विश्वसनीय और मजबूत राजनीतिक विकल्प उभरकर सामने आ सकता है।
उनके संबोधन में अंधभक्त और सिस्टम जैसे एक ही वाक्य की बार-बार पुनरावृत्ति होती रही। इससे आगे बात बढ़ी नहीं। ऐसा क्यों हुआ? इस वैचारिक आयोजन में मिमिक्री जैसे फूहड़ मजाक की जरूरत नहीं थी। कलाकार का प्रदर्शन भी बेदम था। इस के चक्कर में कार्यक्रम पर मिमिक्री भारी पड़ गई। बात को भटका दिया गया। कहा जा रहा है निजी मेगा इवेंट एजेंसी द्वारा तैयार किए गए कार्यक्रम और आत्ममुग्ध सलाहकारों की सलाह से राहुल गांधी की यह गूंज अधूरे उत्तरों के साथ अनुगूंज जैसी रह गई, यानी सीमित दायरे में सिमट गई। जिज्ञासा इसी बात पर टिक गई है कि जैसा राहुल को बोलना था, वैसा क्यों नहीं बोल पाए।
हो सकता है इस तरह के आयोजन से वे और उनकी पार्टी फिलहाल डाटा कलेक्शन यानी जानकारियां एकत्रीकरण का काम करना चाहते हो, फिर इसका दस्तावेजीकरण करके लोकसभा, राज्यसभा और राज्यों में विधानसभा में रखें। राजनीतिक और चुनावी अस्त्र-शस्त्र के रूप में सरकारों को कटघरे में निरुत्तर खड़ा करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाए। कांग्रेस का यह भी प्रयास होगा कि पूरी गंभीरता के साथ इस विषय को वह एक बड़े कैनवास पर ईमानदारी के साथ चित्रित करें और सरकार को नौजवानों की बेहतरी के काम करने के लिए मजबूर करें।
राहुल गांधी फिलहाल केवल कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं की बातें सुनने और जानकारियां एकत्र करने की भूमिका में नजर आ रहे हैं, जिन्हें बाद में संसद में उठाया जाना है। इस रणनीति के चलते जमीनी स्तर पर युवाओं को यह महसूस हो रहा है कि इतना बड़ा और चर्चित आयोजन होने के बावजूद इसका परिणाम अंततः अधूरा-सा रह गया।
विद्यार्थियों का मानना है कि केवल संवाद सुनने या सांकेतिक प्रसंगों तक सीमित रहने के बजाय देश के युवाओं को आज एक मजबूत, स्पष्ट और तात्कालिक समाधान आधारित नीतिगत विजन की आवश्यकता है, जिसकी इस मंच पर कहीं न कहीं कमी खली। कार्यक्रम का केंद्रबिंदु शिक्षा, पेपर लीक, रोजगार और व्यवस्थागत कमियां थीं, जो आज हर घर-परिवार की साझा समस्या बन चुकी हैं। दो लाख से अधिक छात्रों की उपस्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया कि जेन-जी पीढ़ी अब अपने भविष्य को लेकर किसी भी प्रकार की कोताही बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।
संवादात्मक पहल : राहुल गांधी द्वारा मंच से छात्रों की बात सुनना और दिल्ली होस्टल हादसे के पीड़ित 11 छात्रों के परिजन को मंच पर स्थान देना एक संवेदनशील और सराहनीय कदम रहा।
कार्यक्रम की रणनीतिक खामियां
स्पष्ट नीतिगत रोडमैप का अभाव : युवाओं की भीड़ और राहुल गांधी के भाषण के बीच सबसे बड़ी विसंगति यह रही कि भाषण पारंपरिक राजनीतिक, व्यवस्थागत आलोचनाओं और नारों तक सीमित रह गया।
छात्रों को यह उम्मीद थी कि विपक्ष की ओर से परीक्षा घोटालों और बेरोजगारी से निपटने का कोई ठोस, कानूनी और नीतिगत दस्तावेज प्रस्तुत किया जाएगा, जिसकी कमी खली। सवालों के सीधे और तार्किक समाधानों की कमी अखरी। यह कार्यक्रम वन-वे कम्युनिकेशन बनकर रह गया। छात्रों के तीखे और जमीनी सवालों के तार्किक और त्वरित समाधानों पर खुली चर्चा का अभाव रहा।
गैर-जरूरी प्रसंगों से भटकाव : संबोधन के दौरान कुछ ऐसे सांकेतिक प्रसंग (जैसे राजनीतिक व्यंग्य या मिमिक्री से जुड़े प्रयास) सामने आए, जिन्हें राजनीतिक विश्लेषकों और जानकारों ने पूरी तरह से अनावश्यक माना। जब युवा अपने भविष्य के संकट को लेकर गंभीर हैं, तब ऐसे प्रसंगों ने मुख्य और गंभीर मुद्दों से ध्यान भटकाने का काम किया।
सलाहकारों की लचर रणनीति : यह स्पष्ट रूप से महसूस किया गया कि राहुल गांधी की कोर टीम और सलाहकारों ने ‘जेन-जी’ पीढ़ी की अपेक्षाओं और मंच के मिजाज का सही आकलन नहीं किया। सलाहकारों द्वारा पेश करवाई गई मिमिक्री की प्रस्तुति प्रभावी और वजनदार साबित नहीं हुई, जैसी एक राष्ट्रीय नेता के मंच से अपेक्षा की जाती है।
भाषण से आगे बढ़कर ‘एक्शन प्लान' पेश करें : राहुल गांधी को अपना जी जेन-जी एजेंडा खुलकर सामने रखना चाहिए। सारगर्भित तरीके से इस तरह के आयोजन में विस्तारपूर्वक बात होनी चाहिए, ताकि संवाद की पूर्णता बनी रहे।
आज का युवा केवल मौखिक समर्थन या राजनीतिक प्रहारों से संतुष्ट होने वाला नहीं है। ऐसे मंचों से बकायदा एक ‘यूथ मेनिफेस्टो’ या विजन डॉक्यूमेंट जारी किया जाना चाहिए, जिसमें यह स्पष्ट हो कि पार्टी सत्ता में आने पर शिक्षा और रोजगार के ढांचे को कैसे दुरुस्त करेगी।
लंबी और एकतरफा भाषण शैली के बजाय ‘टाउन हॉल’ बैठकों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जहां छात्र सीधे सवाल पूछ सकें और नेता डेटा व ठोस तर्कों के साथ उनके जवाब दें। सलाहकारों की कार्यप्रणाली की समीक्षा भी जरूरी है।
बीते 10 वर्षों में राहुल गांधी पर अक्सर उनके सलाहकार ही भारी पड़े हैं। कांग्रेस की दुर्गति में सलाहकारों का बड़ा योगदान है। राहुल को अपनी टीम में ऐसे प्रोफेशनल्स, शिक्षाविदों और जमीनी विशेषज्ञों को शामिल करना चाहिए, जो युवाओं की जमीनी नब्ज को समझते हों, ताकि मंच की पटकथा और भाषण की शैली परिपक्व और गंभीर बन सके।
इंदौर का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम यह तो रेखांकित करता है कि युवा बदलाव चाहते हैं और एक बड़ा राजनीतिक मंच उन्हें आकर्षित भी करता है, लेकिन केवल भीड़ जुटाना और सतही भाषण देना अब नाकाफी साबित हो रहा है।
यदि विपक्ष को युवाओं का स्थायी और मजबूत विश्वास जीतना है, तो उसे सतही भाषणबाजी से ऊपर उठकर ठोस कार्ययोजना, वैचारिक गहराई और अकाट्य विश्वसनीयता का परिचय देना होगा।
अब देखना यह है कि राजनीतिक दल और उनके रणनीतिकार इन सीखों को कितनी जल्दी और कितनी संवेदनशीलता के साथ अपने आगामी अभियानों में शामिल करते हैं।
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