रघुनाथ मंदिर और लक्ष्मण सिद्ध- जहां मर्यादा पुरुषोत्तम और भ्राता लक्ष्मण ने भुगता था ब्रह्महत्या का दोष
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संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
जब नियति के न्याय के आगे झुके नारायण: रावण वध के बाद क्यों तपना पड़ा था श्रीराम-लक्ष्मण को, देवभूमि के वे दो गुमनाम पौराणिक स्थल, जहां साक्षात ईश्वर को भी राजपाठ तजकर करना पड़ा था आत्म-शोधन और कठिन विलाप, रघुनाथ मंदिर की पावन शिला से लेकर ‘लक्ष्मण सिद्ध’ की कंदराओं तक बिखरे हैं त्रेतायुग के सबसे बड़े प्रायश्चित के आंसू, राम-लक्ष्मण भी नहीं टाल सके थे ‘कर्म का विधान’, राजसी वैभव छोड़ क्यों चुनी हिमालय की शरण, चारधाम मार्ग के वे दो अनछुए अध्याय, जो आज के इंसान के अहंकार पर करते हैं सीधा प्रहार
क्या ईश्वर भी नियति और कर्मों के न्याय-विधान से बंधा होता है? सनातन संस्कृति इस सवाल का जवाब बहुत गर्व और दृढ़ता के साथ ‘हां’ में देती है। हमारे यहां अवतार भी मर्यादाओं से ऊपर नहीं हैं। त्रेतायुग में लंकापति रावण पर भगवान श्रीराम की विजय को हम हर साल अधर्म पर धर्म की जीत के महा-उत्सव (विजयादशमी) के रूप में मनाते हैं,लेकिन, इस महायुद्ध के पटाक्षेप के बाद इतिहास के पन्नों में एक ऐसा मौन अध्याय भी दर्ज है, जो आज के इंसान को ‘कर्म की प्रधानता’ का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाता है।
महाप्रतापी और प्रकांड विद्वान रावण का संहार कर संसार को उसके आतंक से मुक्ति तो मिल गई, लेकिन नीतिशास्त्र की सुई वहां आकर अटक गई कि रावण महर्षि पुलस्त्य का पौत्र और एक कुलीन ब्राह्मण था। लोक-कल्याण के लिए ही सही, पर युद्ध की विभीषिका में साक्षात नारायण के अवतार श्रीराम और भ्राता लक्ष्मण पर ‘ब्रह्महत्या’ का अदृश्य और भारी दोष लग चुका था।
ईश्वरीय सत्ता होने के बावजूद वे इस नैतिक विधान से मुकर नहीं सकते थे। परिणाम-अयोध्या का सुख, राजसी वैभव और छत्र-चंवर का त्याग कर दोनों भाइयों को आत्म-ग्लानि और आत्म-शुद्धि के लिए देवभूमि उत्तराखंड के बीहड़ों, पर्वतों और संगमों की शरण में आना पड़ा।
आज भी अलकनंदा-भागीरथी की गर्जना के बीच खड़ा देवप्रयाग का ‘रघुनाथ मंदिर’ और ऋषिकेश के जंगलों में छिपा ‘लक्ष्मण सिद्ध’, साक्षात विष्णु के अवतारों के उसी कड़े तप, अश्रुओं और वैराग्य के मूक गवाह हैं।
देवप्रयाग की वह पावन शिला: जहां एकांत में रोए थे मर्यादा पुरुषोत्तम... समुद्र तल से हजारों फीट ऊपर, जहां अलकनंदा का मटमैला उतावलापन और भागीरथी का शांत हरा प्रवाह मिलकर ‘गंगा’ का रूप लेते हैं, उस देवप्रयाग के शीर्ष पर कत्यूरी और गढ़वाली स्थापत्य कला का एक अद्भुत संगम सिर उठाए खड़ा है रघुनाथ मंदिर। यह सिर्फ पत्थरों का देवालय नहीं, बल्कि भगवान राम के मानवीय संघर्षों की पराकाष्ठा का साक्षात स्मारक है।
स्कंद पुराण के केदारखंड में वर्णित कथाओं के अनुसार, जब श्रीराम लंका जीतकर अयोध्या लौटे और उनका राज्याभिषेक हुआ, तब वशिष्ठ और अन्य ऋषियों ने उन्हें स्मरण कराया कि ‘वध’ चाहे अत्याचारी का ही क्यों न हो, धर्मग्रंथों में वह ‘ब्रह्महत्या’ के पाप की श्रेणी में ही गिना जाएगा। प्रजा का रंजन करने वाले राजा पर यह कलंक शोभा नहीं देता।
रघुनाथ मंदिर: एक नजर में... प्रभु राम ने बिना एक क्षण गंवाए राजसी वस्त्र उतारे, हाथ में कमंडल लिया और निकल पड़े हिमालय की ओर। देवप्रयाग के इसी निर्जन, पथरीले स्थान को उन्होंने अपनी तपस्थली चुना। मंदिर परिसर के भीतर आज भी वह ‘विशेष शिला’ (चट्टान) सुरक्षित है, जिसके बारे में मान्यता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम ने कई वर्षों तक निराहार, मौन रहकर इसी पर बैठकर घोर तपस्या की थी।
आज भी जब कोई श्रद्धालु उस शिला को छूता है, तो उसे उस आध्यात्मिक कंपन का अहसास होता है, जिसने साक्षात ईश्वर को भी एक सामान्य मनुष्य की तरह प्रायश्चित की अग्नि में तपाकर ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ के रूप में निखारा था।
ऋषिकेश का ‘लक्ष्मण सिद्ध’: घने जंगलों में शेषनाग के अवतार का गुप्त प्रायश्चित... बड़े भाई की आज्ञा और युद्ध में रावणपुत्र मेघनाद जैसे प्रकांड ब्राह्मण योद्धाओं के संहार में सहभागी रहे भ्राता लक्ष्मण भी इस दोष से अछूते नहीं थे।
उनका स्वभाव उग्र था, लेकिन ग्लानि उतनी ही गहरी थी। अपने भीतर के क्षोभ को शांत करने और आत्म-शुद्धि के लिए लक्ष्मण जी ने भाई के साथ न रहकर, ऋषिकेश से करीब 12 किलोमीटर दूर लच्छीवाला के उन घने, डरावने जंगलों को चुना, जिसे आज हम ‘लक्ष्मण सिद्ध’ पीठ के नाम से पूजते हैं।
त्रेतायुग में यह इलाका पूरी तरह से एकांत और हिंसक पशुओं से भरा था। लक्ष्मण जी ने यहां पत्तों की कुटिया बनाई, अपने अस्त्र-शस्त्रों को परे रखा और भगवान शिव की कठोर आराधना में लीन हो गए। वर्षों की कठिन योग साधना के बाद इसी स्थान पर महादेव ने प्रकट होकर लक्ष्मण जी को ब्रह्महत्या के दोष से मुक्त किया था।
कालान्तर में यह स्थल ‘नाथ संप्रदाय’ के सिद्ध संतों की साधना स्थली बना, जिसके कारण इसके नाम के आगे ‘सिद्ध’ शब्द जुड़ा। यहां हर रविवार को श्रद्धालुओं का मेला जुड़ता है, लेकिन आम दिनों में यहां वही त्रेतायुगीन निस्तब्धता पसरी होती है, जो याद दिलाती है कि एक चक्रवर्ती सम्राट के भाई ने अपनी आत्मा की आवाज पर यहां सिर झुकाया था।
जब ईश्वर भी कर्म-फल से नहीं बच सके, तो इंसान क्या है...चारधाम यात्रा मार्ग पर बदरीनाथ या केदारनाथ जाते समय अमूमन पर्यटक इन दोनों स्थलों को केवल ‘दर्शनीय स्थल’ मानकर आगे बढ़ जाते हैं,लेकिन ये दोनों स्थल केवल प्राचीन मंदिर नहीं, बल्कि आधुनिक मानव जाति के अहंकार पर एक बहुत बड़ा नैतिक प्रहार हैं।
आज का इंसान जब छोटे-मोटे अपराध या अनैतिक कृत्य करके कानून और समाज की आंखों में धूल झोंककर खुद को सुरक्षित महसूस करता है, तब उसे देवप्रयाग की उस शिला और लच्छीवाला के इन जंगलों की तरफ देखना चाहिए।
जब साक्षात विष्णु और शेषनाग के अवतार भी अपने हाथों हुए ‘ब्रह्महत्या’ के कर्म-फल से भाग नहीं पाए और उन्हें प्रकृति के नियमों के आगे झुकना पड़ा, तो एक साधारण मनुष्य अपने बुरे कर्मों के फल से कैसे बच सकता है?
उत्तराखंड की यह धरती केवल पर्यटन की नहीं, बल्कि ‘आध्यात्मिक ऑडिट’ की भूमि है। देवप्रयाग का रघुनाथ मंदिर और ऋषिकेश का लक्ष्मण सिद्ध चीख-चीखकर गवाही देते हैं कि प्रकृति का न्याय सबके लिए बराबर है। चाहे वह साधारण हाड़-मांस का इंसान हो या साक्षात भगवान।
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