इस प्रोजेक्ट पर सवाल: शर्त के बावजूद दूसरा मॉड्यूल लगाने के आरोप; हजार करोड़ से अधिक के नुकसान की आशंका
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट,भोपाल।
मध्यप्रदेश के रीवा अल्ट्रा मेगा सोलर लिमिटेड ( आरयूएमएसएल) की तीन बड़ी सोलर परियोजनाओं में केंद्र सरकार की 'मेड इन इंडिया' नीति और एएलएमएम (अप्रूव्ड लिस्ट ऑफ मॉडल्स एंड मैन्यूफैक्चर्स) नियमों के कथित उल्लंघन का मामला सामने आया है।
दस्तावेजों और आरटीआई से प्राप्त जानकारी के आधार पर आरोप लगाया गया है कि टेंडर में भारतीय मॉड्यूल लगाने का वादा किया गया, लेकिन बाद में कुछ परियोजनाओं में सस्ते चीनी मॉड्यूल का उपयोग किया गया।
यदि जांच में ये आरोप सही साबित होते हैं, तो विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार सरकार पर अगले 25 वर्षों में करीब एक हजार करोड़ रुपये से अधिक का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है।
टेंडर में भारतीय मॉड्यूल, आरोप चीन के मॉड्यूल लगाने का
केंद्र सरकार के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) ने सरकारी सोलर परियोजनाओं में केवल एएलएमएम प्रमाणित भारतीय मॉड्यूल के उपयोग को अनिवार्य किया था।
इसी शर्त के आधार पर आरयूएमएसएल ने नीमच, शाजापुर और ओंकारेश्वर की परियोजनाओं के लिए निविदाएं जारी की थीं। आरोप है कि टेंडर मिलने के बाद कुछ कंपनियों ने कथित रूप से भारतीय मॉड्यूल के स्थान पर कम कीमत वाले चीनी मॉड्यूल स्थापित कर दिए।
इन परियोजनाओं पर उठे सवाल
टाटा पावर एनर्जी लिमिटेड – 320 मेगावाट (नीमच)
सोलर अराइज – 125 मेगावाट (शाजापुर)
एम्प एनर्जी – 100 मेगावाट (ओंकारेश्वर)
एएमपी एनर्जी का पक्ष
ओंकारेश्वर परियोजना को लेकर एएमपी एनर्जी का कहना है कि केंद्र सरकार ने 10 मार्च 2023 को जारी आदेश के तहत तकनीकी कारणों से एक वर्ष के लिए एएलएमएम नियमों में छूट दी थी। इसी प्रावधान के तहत कंपनी ने चीन से मॉड्यूल आयात किए।
हालांकि, यह भी जांच का विषय है कि मॉड्यूल की खरीद, आयात और स्थापना निर्धारित समयसीमा के भीतर हुई या नहीं। वहीं, नीमच और शाजापुर परियोजनाओं के संबंध में ऐसी किसी स्पष्ट छूट का आधार सामने नहीं आया है।
कितना हो सकता है आर्थिक असर?
विशेषज्ञों के अनुसार, एएलएमएम प्रमाणित भारतीय मॉड्यूल की कीमत लगभग 11.50 रुपये प्रति वाट होती है, जबकि गैर-ALMM चीनी मॉड्यूल 7 से 8 रुपये प्रति वाट में उपलब्ध हो जाते हैं।
यदि केवल नीमच और शाजापुर की 445 मेगावाट क्षमता वाली परियोजनाओं को आधार माना जाए, तो मॉड्यूल खरीद में कंपनियों को 150 से 180 करोड़ रुपये तक की बचत होने का अनुमान है।
इसके अलावा, यदि टैरिफ भारतीय मॉड्यूल की लागत के आधार पर तय किया गया और बाद में कम लागत वाले मॉड्यूल लगाए गए, तो 25 वर्ष की बिजली खरीद अवधि में सरकार पर करीब 1,362 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ने की आशंका जताई गई है। यह आंकड़ा विशेषज्ञों के अनुमान पर आधारित है।
अधिकारियों ने क्या कहा?
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा विभाग के अपर मुख्य सचिव मनु श्रीवास्तव ने कहा कि मामला उनके संज्ञान में लाया गया है और इसकी जांच कराई जाएगी। उन्होंने कहा, यदि टेंडर की शर्तों के विपरीत मॉड्यूल लगाए गए हैं, तो यह गलत है। परियोजनाओं का निर्माण उन्हीं शर्तों के अनुसार होना चाहिए जिनके आधार पर निविदा जारी की गई थी।
जांच के बाद ही होगी स्थिति स्पष्ट
फिलहाल मामले में लगाए गए आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। यदि जांच में टेंडर शर्तों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो यह मामला केवल अनुबंध नियमों के उल्लंघन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि केंद्र सरकार की 'मेड इन इंडिया' और आत्मनिर्भर भारत नीति के अनुपालन पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा।
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