टिकटों की मारामारी के बीच MPCA की व्यवस्था पर सवाल: विधायकों को 50-50 देने का दावा; आम दर्शक परेशान
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भारत और वेस्टइंडीज के बीच होने वाले मुकाबले के टिकटों को लेकर जहां क्रिकेट प्रेमियों में मारामारी है और टिकटों की बिक्री शुरू होने के कुछ ही समय में बड़ी संख्या में टिकट बिक गए, वहीं मध्यप्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (MPCA) की टिकट वितरण व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
विधायकों को 50-50 टिकट
दावा है कि इंदौर के विधायकों के लिए 50-50 टिकट का कोटा तय किया गया है। इसके अलावा पास की व्यवस्था अलग है। मंत्री, सांसद, महापौर और पार्षदों के लिए भी अलग-अलग कोटे और पास होने की बात कही जा रही है।
पहले विधायकों को मिलते थे सीमित पास
MPCA की पुरानी व्यवस्था का हवाला देते हुए कहा जा रहा है कि पहले पार्षदों को दो और विधायकों को चार पास दिए जाते थे। अब नई व्यवस्था में विधायकों को 50 टिकट दिए जाने की चर्चा है।
यह भी दावा किया जा रहा है कि भारत-न्यूजीलैंड मुकाबले के दौरान भी विधायकों के लिए इसी तरह की व्यवस्था की गई थी। यहीं से सवाल उठ रहा है कि जब आम क्रिकेट प्रशंसकों के लिए टिकट हासिल करना मुश्किल है, तब जनप्रतिनिधियों के लिए इतने बड़े टिकट कोटे का आधार क्या है?
सरकार बदलने पर भी यही व्यवस्था रहेगी?
MPCA की टिकट व्यवस्था को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह उठाया जा रहा है कि यदि भविष्य में प्रदेश में सरकार बदलती है या किसी दूसरी पार्टी के विधायक चुने जाते हैं, तो क्या उनके लिए भी यही 50 टिकट का कोटा रहेगा?
इस व्यवस्था को लेकर MPCA की ओर से स्पष्ट सार्वजनिक जवाब सामने नहीं आया है। संगठन से जुड़े लोगों के बीच इसे लेकर अलग-अलग चर्चाएं हैं।
महाआर्यमन सिंधिया की कमेटी के बाद बदली तस्वीर?
MPCA में नई कमेटी के आने के बाद टिकट और पास वितरण को लेकर बदलाव की चर्चा है। आलोचकों का आरोप है कि क्रिकेट से जुड़े आयोजनों में राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव बढ़ा है।
हालांकि, इन आरोपों को लेकर यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि किस जनप्रतिनिधि को कितने टिकट या पास मिले, इसका आधिकारिक विस्तृत रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होना जरूरी है, तभी इन दावों की पूरी पुष्टि हो सकेगी।
नेताओं के लिए टिकट-पास की व्यवस्था पर बहस
MPCA की टिकट व्यवस्था को लेकर लंबे समय से यह चर्चा होती रही है कि क्रिकेट मैचों के दौरान जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों के लिए टिकट और पास की अलग व्यवस्था रहती है।
आलोचकों का कहना है कि यदि आम दर्शकों के लिए टिकट सीमित हैं, तो VIP और जनप्रतिनिधि कोटे की पारदर्शी जानकारी भी सार्वजनिक की जानी चाहिए। इससे टिकट वितरण को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब मिल सकता है।
सांसद, मंत्री और बड़े नेताओं के कोटे पर भी नजर
दावों के मुताबिक सांसदों और प्रदेश के कुछ प्रभावशाली नेताओं के लिए भी पर्याप्त टिकट और पास उपलब्ध कराए जाते हैं। कुछ नेताओं के MPCA से पुराने जुड़ाव और संगठन में प्रभाव को लेकर भी चर्चाएं होती रही हैं।
हालांकि, अलग-अलग जनप्रतिनिधियों को वास्तव में कितने टिकट और पास मिले हैं, इसकी पुष्टि आधिकारिक वितरण सूची से ही हो सकती है।
IDCA को 200 टिकट, पास की व्यवस्था अलग
इंदौर डिविजन क्रिकेट एसोसिएशन (IDCA) को करीब 200 टिकट दिए जाने की बात कही जा रही है। पहले टिकट सीधे उपलब्ध कराने की व्यवस्था थी, जबकि अब संबंधित लोगों को अपने टिकट प्राप्त करने की प्रक्रिया पूरी करनी पड़ती है।
बताया जा रहा है कि इस बार अधिकांश टिकट संबंधित लोगों तक पहुंच गए हैं। वहीं कुछ MPCA सदस्यों को अलग से टिकट नहीं दिए जाने की बात है, क्योंकि उन्हें पास उपलब्ध कराए जाते हैं।
जमीन के मुद्दे पर भी IDCA और MPCA आमने-सामने
टिकट विवाद के साथ ही इंदौर डिविजन क्रिकेट एसोसिएशन की जमीन का मुद्दा भी चर्चा में है। MPCA द्वारा क्रिकेट गतिविधियों के लिए करीब 35 एकड़ जमीन अलग-अलग हिस्सों में खरीदे जाने की जानकारी है।
जमीन की रजिस्ट्री का बड़ा हिस्सा पूरा होने की बात भी सामने आई है। हालांकि, IDCA की ओर से यह सवाल उठाया जा रहा है कि उसके लिए कितनी जमीन तय हुई है और भविष्य में उसका क्या उपयोग होगा।
दरअसल, इंदौर में क्रिकेट सुविधाओं के विस्तार के लिए जमीन की जरूरत का मुद्दा पहले भी उठता रहा है। अब जमीन खरीद की प्रक्रिया आगे बढ़ने के बाद IDCA की अपेक्षाओं और MPCA की योजना के बीच स्पष्टता की मांग की जा रही है।
असली सवाल- टिकट किसे और कितने?
भारत-वेस्टइंडीज मैच को लेकर दर्शकों में टिकट पाने की होड़ के बीच MPCA की टिकट और पास व्यवस्था पर बहस तेज हो गई है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि कुल उपलब्ध टिकटों में से कितने आम दर्शकों के लिए हैं और कितने जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों, सदस्यों और अन्य श्रेणियों के लिए आरक्षित किए गए हैं?
यदि MPCA टिकट वितरण का पूरा कोटा सार्वजनिक कर दे, तो इस पूरी व्यवस्था को लेकर उठ रहे सवालों पर काफी हद तक स्थिति साफ हो सकती है।
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