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फर्जी डिग्री का खेल: नकली दस्तावेजों के आधार पर हासिल की सरकारी नौकरी; 9 पर एफआईआर

KHULASA FIRST

संवाददाता

05 जून 2026, 2:04 pm
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फर्जी डिग्री का खेल

खुलासा फर्स्ट, भोपाल।
मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। फर्जी डिग्री, फर्जी मेडिकल काउंसिल रजिस्ट्रेशन और दूसरे डॉक्टरों के पंजीयन नंबरों के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल करने वाले 9 कथित डॉक्टरों के खिलाफ भोपाल में FIR दर्ज की गई है।

अब पूरा नेटवर्क रडार पर
चौंकाने वाली बात यह है कि ये सभी करीब पांच महीने तक सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों और संजीवनी क्लीनिकों में मरीजों का इलाज करते रहे। मामले में भोपाल के चूनाभट्टी थाने में नौ आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी समेत विभिन्न धाराओं में केस दर्ज किया गया है। पुलिस अब पूरे नेटवर्क और भर्ती प्रक्रिया में संभावित मिलीभगत की जांच कर रही है।

मेडिकल काउंसिल में जांच हुई तो खुली पोल
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) को इन डॉक्टरों की डिग्री और दस्तावेजों को लेकर शिकायत मिली थी। प्रारंभिक जांच में दस्तावेज संदिग्ध पाए गए। इसके बाद जब मेडिकल काउंसिल के रिकॉर्ड से पंजीयन नंबरों का मिलान किया गया तो बड़ा खुलासा हुआ।

जांच में सामने आया कि कई आरोपियों ने दूसरे डॉक्टरों के रजिस्ट्रेशन नंबर का इस्तेमाल किया था, जबकि कुछ के पंजीयन नंबर मेडिकल काउंसिल के रिकॉर्ड में मौजूद ही नहीं थे। कई मामलों में असली डॉक्टरों के दस्तावेजों की कॉपी लेकर उन्हें एडिट किया गया और नए नामों से फर्जी प्रमाण पत्र तैयार किए गए।

जनवरी से कर रहे थे नौकरी
पुलिस के अनुसार आरोपी जनवरी 2026 से अलग-अलग सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में पदस्थ थे। इस दौरान वे मरीजों का परीक्षण और इलाज भी कर रहे थे। हैरानी की बात यह है कि मेडिकल काउंसिल की वेबसाइट पर सामान्य सत्यापन से पकड़ी जा सकने वाली गड़बड़ियां भी भर्ती प्रक्रिया में नजरअंदाज कर दी गईं।

इन आरोपियों पर दर्ज हुआ मामला
एफआईआर में डॉ. आकाश चंदेलकर, डॉ. मोहर सिंह, डॉ. कमल किशोर, डॉ. मोनिका, डॉ. हारून, डॉ. शांति, डॉ. सोनम, डॉ. बुद्धमान और डॉ. पवन को आरोपी बनाया गया है।

मिलीभगत के एंगल से भी जांच
पुलिस और जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि यह फर्जीवाड़ा केवल व्यक्तिगत स्तर पर हुआ या इसके पीछे कोई संगठित गिरोह सक्रिय था। भर्ती प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में है। अधिकारियों का मानना है कि बिना अंदरूनी मदद के इतने बड़े स्तर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नियुक्तियां होना संभव नहीं दिखता।

NHM के आईटी असिस्टेंट की भी हो चुकी गिरफ्तारी
इस पूरे मामले की कड़ियां पहले सामने आए फर्जी MBBS डिग्री कांड से भी जुड़ती नजर आ रही हैं। हाल ही में दमोह फर्जी डॉक्टर प्रकरण में NHM भोपाल के एक आईटी असिस्टेंट को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस को शक है कि फर्जी दस्तावेजों के सत्यापन और भर्ती प्रक्रिया में कई स्तरों पर अनियमितताएं हुई हैं।

सबसे बड़ा सवाल
यह मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग और NHM की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आखिर मेडिकल काउंसिल की वेबसाइट पर उपलब्ध रिकॉर्ड से सत्यापन किए बिना इन लोगों को सरकारी अस्पतालों में नियुक्ति कैसे मिल गई? और पांच महीने तक मरीजों की जिंदगी के साथ यह खिलवाड़ चलता कैसे रहा? अब जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह पता लगाना है कि इस फर्जीवाड़े का मास्टरमाइंड कौन है और इसके तार कहां तक जुड़े हुए हैं।

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