प्रधान प्रस्थान: छात्र आंदोलन खत्म सियासत जारी; युवा शक्ति-जोश के समक्ष झुकी सरकार, सीजेपी की सभी मांगें मंजूर
KHULASA FIRST
संवाददाता

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को आखिरकार इस्तीफा देना पड़ा, जंतर मंतर से लेकर देशभर के स्टूडेंट्स ने मनाया जश्न
जंतर मंतर से शुरू हुए छात्र आंदोलन के देश के अलग-अलग प्रांतों में फैलने से बैकफुट पर आई मोदी सरकार
कॉकरोच जनता पार्टी से तीसरे दौर की बातचीत के बाद निकला समाधान का रास्ता
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सीजेपी में आंदोलन खत्म करने का किया ऐलान देर आयद...दुरुस्त आयद। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद ये कहावत मोदी सरकार पर अनुकूल नजर आती है। छात्र आंदोलन के समक्ष आखिरकार सरकार को झुकना ही पड़ा। दिल्ली के जंतर मंतर से शुरू हुए आंदोलन के तेजी से देशव्यापी होने से सरकार बैकफुट पर आ गई। मोदी सरकार ने इस मामले में प्रधान के इस्तीफे के साथ ही कॉकरोच जनता पार्टी की तीनों अहम मांगें मान लीं।
प्रत्युत्तर में सीजेपी ने भी आंदोलन खत्म करने का ऐलान कर दिया। नीट परीक्षा के पेपर लीक सहित विद्यार्थियों के अन्य मुद्दों पर शुरू हुआ ये आंदोलन 36 दिन के बाद खत्म जरूर हो गया, लेकिन सियासत बदस्तूर अब भी जारी है। सियासी दलों में अब इस आंदोलन की सफलता का श्रेय लेने की होड़ सी मच गई है। हालांकि सरकार ने इस पूरे मामले में महज दो महीने पहले जन्मी कॉकरोच जनता पार्टी को ही आगे रखा और सीजेपी के अलावा किसी दल से कोई बात नहीं की।
इससे ये भी साफ होता है कि मोदी सरकार छात्र आंदोलन व प्रधान के इस्तीफे का श्रेय विपक्ष, खासकर कांग्रेस को नहीं देना चाहती थी। गौरतलब है कि राहुल गांधी भी ‘छात्रों की गूंज’ स्लोगन के साथ देशभर के स्टूडेंट्स से रूबरू हो रहे थे।
हालांकि राहुल गांधी ने प्रधान के इस्तीफे को युवा शक्ति की जीत बताते हुए आंदोलनकारी छात्रों को बधाई दी। सरकार ने केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी को धर्मेंद्र प्रधान की जगह शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी सौंप दी है।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 25 जुलाई को अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद जंतर-मंतर पर चल रहा छात्र आंदोलन व प्रदर्शन समाप्ति की घोषणा हो गई। यह इस्तीफा नीट-यूजी परीक्षा में अनियमितताओं और छात्र-युवा आक्रोश के बीच आया।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर कई हफ्तों से भारी विरोध प्रदर्शन चल रहा था। आंदोलनकारियों और छात्र संगठनों की सबसे प्रमुख व गैर-समझौता योग्य मांग शिक्षा मंत्री का इस्तीफा थी।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए धर्मेंद्र प्रधान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना त्यागपत्र भेज दिया और कहा कि यह उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का विषय नहीं, बल्कि छात्रों के भविष्य और देश की एकता का सवाल है। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद जंतर-मंतर पर लगे टेंट और बैरिकेड्स हटाए जाने लगे तथा मुख्य मांग पूरी होने पर छात्रों ने आंदोलन के खत्म होने का ऐलान किया।
हालांकि कुछ छात्र संगठनों का यह भी कहना है कि मंत्री के इस्तीफे के साथ-साथ प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मुकदमों को वापस लेने और अन्य प्रशासनिक सुधारों पर भी सरकार पूरा अमल करे।
एक दिन पहले तक मोदी सरकार अपने शिक्षा मंत्री प्रधान के साथ एकजुट थी। सरकार का मूड साफ इशारा कर रहा था कि वह प्रधान का इस्तीफा नहीं लेगी, न उन्हें देने देगी। प्रधानमंत्री की मुखरता व सरकार के एक के बाद एक उठाए जा रहे कदम ये इशारा कर रहे थे कि सरकार की मंशा इस्तीफे से ज्यादा परीक्षा सिस्टम से सुधार पर है।
लग भी रहा था सरकार इन्हीं सुधार के कदमों से आंदोलन को साधने की दिशा में आगे बढ़ रही है। वह एक तरफ सीजेपी से बातचीत भी कर रही थी और दूसरी तरफ एक्शन पर एक्शन ले भी रही थी। सीजेपी से दो दौर की बातचीत में ये तो साफ हो गया था कि आंदोलन पर आमादा स्टूडेंट्स बिना इस्तीफे से कम पर राजी नहीं होंगे।
बावजूद इसके सरकार बीच के रास्ते की उम्मीद से थी। एक तरह से सरकार ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को जबरिया नाक का सवाल बना लिया था।
आरएसएस मुखिया की नसीहत के बाद सरकार का यू टर्न
आंदोलन ने जब देश के अलग-अलग हिस्सों में जगह बनाना शुरू किया तो सरकार तेजी से हरकत में आई। पार्टी हलकों में आ रहे फीडबैक भी इशारा कर रहे थे कि ज्यादा देर स्थिति को और विकराल कर सकती है। ऐसे में दिल्ली में ही मौजूद आरएसएस प्रमुख ने एक कार्यक्रम में इशारों ही इशारों में सरकार को आगाह कर दिया कि युवाओं से संवाद व समन्वय बेहद आवश्यक हैं।
बजाय टकराव के और उन्हें बौद्धिक भाषण देने के, उनके साथ समरस होने में ही भलाई है। संघ मुखिया की इस सलाह ने सरकार को यू टर्न लेने में भी अहम भूमिका निभाई और जो सरकार प्रधान के साथ मजबूती से खड़ी थी, वह उसी मजबूरी में पीछे हट गई।
सरकार व सीजेपी के साथ तीसरे दौर की बातचीत से पहले ही प्रधान ने पद से इस्तीफा देकर सरकार को बड़ी फजीहत से बचा लिया। हालांकि प्रधान ने अपने इस्तीफे में ये साफ कहा कि उन्होंने देशहित व छात्र हित में इस्तीफा दिया है ताकि बाहरी शक्तियां इस आंदोलन की आड़ में देश में अराजकता न फैला सकें। प्रधान की बात को गृहमंत्री अमित शाह ने भी ये कहकर आगे बढ़ाया कि भाजपा के कार्यकर्ता के लिए देश पहले है, बाद में पद-प्रतिष्ठा।
आखिरी 72 घंटे निर्णायक रहे, सरकार बैकफुट पर आई
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के पीछे की कहानी मुख्य रूप से सरकार पर बढ़ता चौतरफा दबाव, संसद में गतिरोध और आंदोलनकारी छात्र संगठन के साथ होने वाली महत्वपूर्ण वार्ता से जुड़ी है। सरकार और आंदोलनकारी छात्र संगठन सीजेपी के बीच एक महत्वपूर्ण दौर की वार्ता में एकमात्र अड़चन यही थी।
छात्र संगठन इस बात पर अड़े थे कि जब तक शिक्षा मंत्री पद पर रहेंगे, कोई समझौता नहीं होगा। बातचीत को सफल बनाने और आंदोलन को तुरंत खत्म कराने के लिए सरकार ने वार्ता शुरू होने से ठीक पहले धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा कराने का फैसला लिया।
आखिरी 72 घंटों में सरकार पर राजनीतिक दबाव संसद की घेराबंदी के बाद काफी बढ़ गया था। विपक्ष और छात्र संगठनों के तीखे हमलों के कारण संसद की कार्यवाही लगातार बाधित हो रही थी। नीट पेपर लीक विवाद के हफ्तों खिंचने के कारण वैश्विक स्तर पर भारत की परीक्षा प्रणाली पर सवाल उठ रहे थे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शीर्ष नेतृत्व के बीच हुई उच्च स्तरीय बैठक में यह माना गया कि छात्रों का गुस्सा शांत करने के लिए नैतिक जिम्मेदारी तय करना अब अनिवार्य हो चुका है। धर्मेंद्र प्रधान खुद 1997 में भुवनेश्वर में एक छात्र नेता के रूप में पेपर लीक के खिलाफ बड़े आंदोलन का नेतृत्व कर चुके थे। लिहाजा उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ‘युवा मित्रों’ के नाम पत्र लिखा। उन्होंने माना कि छात्रों के भविष्य की वेदी पर पद बड़ा नहीं है।
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