मूंग और किसान आंदोलन पर प्रधानमंत्री चिंतित: कृषि मुद्दों पर की चर्चा मोदी-शिवराज मुलाकात
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के बीच लगभग तीन दिन पहले हुई मुलाकात के बाद मध्य प्रदेश में मूंग खरीदी को लेकर हुए किसान आंदोलन तथा समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर उपज की खरीदी को लेकर भी बातचीत होने की चर्चा राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में है।
बैठक में संयुक्त किसान मोर्चा और भारतीय किसान संघ द्वारा मध्य प्रदेश के मूंग आंदोलन, समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीदी तथा मूंग में कीटनाशकों और फसल को जल्दी सुखाने के लिए हर्बीसाइड के अत्यधिक उपयोग से होने वाले रासायनिक अवशेषों के मुद्दे पर विशेष चर्चा हुई। खेती-किसानी इस मुलाकात का प्रमुख विषय माना जा रहा है।
इसके बाद सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर खरीदी जाने वाली उपज की गुणवत्ता की जांच के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित उपकरणों के उपयोग के निर्णय को भी इस मुलाकात से जोड़ा जा रहा है।
हाल के घटनाक्रम बताते हैं कि मध्य प्रदेश में संयुक्त किसान मोर्चा ने 100 प्रतिशत मूंग खरीदी की मांग को लेकर बड़ा आंदोलन किया था। आंदोलन के बाद राज्य सरकार ने खरीदी की सीमा बढ़ाने और कुछ राहत देने की घोषणा की। इस पूरे विवाद के दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर खरीदी प्रक्रिया में तेजी लाने और किसानों को राहत देने का आग्रह किया था।
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री की नियमित बैठकों में कृषि क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियों, खरीफ फसलों की स्थिति, किसानों की आय, समर्थन मूल्य पर खरीद तथा राज्यों में चल रहे संवेदनशील कृषि मुद्दों की समीक्षा होना सामान्य प्रक्रिया है।
यह अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बैठक में विशेष रूप से मध्य प्रदेश के मूंग आंदोलन या मूंग में रासायनिक अवशेषों के मुद्दे पर चर्चा हुई।
विशेषज्ञों का मानना है कि समर्थन मूल्य पर खरीदी का विवाद अब केवल राज्य का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह केंद्र की खरीद व्यवस्था, दलहन उत्पादन नीति और किसानों की मूल्य संबंधी अपेक्षाओं से भी जुड़ गया है। इसलिए आने वाले समय में केंद्र सरकार दलहन खरीद नीति और गुणवत्ता मानकों की समीक्षा कर सकती है।
उल्लेखनीय है कि किसानों का विषय देश की राजनीति से जुड़ा हुआ है। किसानों का बड़ा वोट बैंक होने के कारण सरकार के लिए कठोर निर्णय लेना संवेदनशील विषय बन जाता है। मौसम आधारित कृषि व्यवस्था पूरे देश में है, इसलिए फसलों की गुणवत्ता एक समान होना संभव नहीं है।
नकदी फसलों के चक्कर में किसान बेतहाशा रासायनिक कीटनाशकों आदि का प्रयोग करते हैं। इस कारण फसलों में जहरीले तत्व अधिकतम सीमा से भी अधिक हो जाते हैं, जो मानव स्वास्थ्य ही नहीं, पर्यावरण के लिए भी खतरनाक हैं।
दूसरी ओर, सरकार लगातार आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रही है और केंद्र पर कृषि सब्सिडी कम करने का अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बना रहता है। वहीं, जलवायु परिवर्तन के कारण खेती प्राकृतिक आपदाओं से लगातार प्रभावित हो रही है। फसलों का उचित बाजार मूल्य नहीं मिल पाना सबसे बड़ी समस्या है, जिसकी एक वजह सरकारी नीतियां भी हैं।
इसी कारण सरकार ने अब उपज की गुणवत्ता के आधार पर खरीदी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाए हैं। इसके अंतर्गत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करने का निर्णय लिया गया है।
मध्य प्रदेश में समर्थन मूल्य (MSP) पर खाद्यान्न खरीदी को आधुनिक और पारदर्शी बनाने की दिशा में सरकार 4,000 AI आधारित ग्रेन एनालाइजर मशीनें सात वर्ष के लिए हायरिंग मॉडल पर लेने की तैयारी कर रही है। इन मशीनों के माध्यम से गेहूं, धान, चना, मूंग सहित अन्य फसलों की गुणवत्ता का डिजिटल परीक्षण किया जाएगा।
हालांकि प्रदेश में भविष्य में विकेंद्रीकृत, केंद्रीकृत अथवा भावांतर जैसी कौन-सी खरीदी व्यवस्था लागू होगी, इस पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है, लेकिन गुणवत्ता परीक्षण के लिए तकनीकी व्यवस्था पहले से तैयार की जा रही है।
इस पहल का उद्देश्य सरकारी खरीदी को अधिक पारदर्शी, वैज्ञानिक और विवाद-मुक्त बनाना है। AI आधारित ग्रेन एनालाइजर से नमी, टूटे दाने, विदेशी पदार्थ, सिकुड़े दाने आदि का परीक्षण कुछ मिनटों में हो सकेगा। इससे किसानों और खरीदी एजेंसियों के बीच गुणवत्ता को लेकर होने वाले विवाद कम होंगे तथा मानवीय हस्तक्षेप भी घटेगा।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि केवल दानों की उपज नहीं, बल्कि रासायनिक अवशेषों की भी जांच सरकारी खरीदी के लिए की जानी चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब सरकार AI आधारित मशीनों पर बड़ा निवेश कर रही है, तो केवल दानों की भौतिक गुणवत्ता की जांच पर्याप्त नहीं होगी। सरकारी खरीदी में कीटनाशकों, कीट नियंत्रकों, फफूंदनाशकों तथा अन्य रासायनिक अवशेषों की भी वैज्ञानिक जांच अनिवार्य की जानी चाहिए।
उपभोक्ताओं को सुरक्षित और स्वास्थ्यवर्धक खाद्यान्न मिलेगा।
किसानों को संतुलित एवं जिम्मेदार कीटनाशक उपयोग के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।
भारतीय खाद्यान्न की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप होगी।
निर्यात की संभावनाएं भी बढ़ेंगी।
ग्रेन एनालाइजर सरकारी खरीदी व्यवस्था में बड़ा सुधार साबित हो सकता है, लेकिन रासायनिक अवशेषों की अनिवार्य जांच भी जोड़ दी जाए, तो यह पहल गुणवत्ता सुधार के साथ सुरक्षित भोजन, बेहतर सार्वजनिक स्वास्थ्य और टिकाऊ कृषि की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम होगी।
संभावित फायदे
खरीदी प्रक्रिया तेज और पारदर्शी होगी।
गुणवत्ता परीक्षण में मानवीय पक्षपात और भ्रष्टाचार की संभावना कम होगी।
किसानों को गुणवत्ता का तत्काल डिजिटल प्रमाण मिलेगा।
सरकारी एजेंसियों को मानक गुणवत्ता वाला अनाज उपलब्ध होगा।
खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की गुणवत्ता बेहतर होगी।
इस व्यवस्था से किसानों को नुकसान भी उठाना पड़ सकता है, क्योंकि आमतौर पर मध्यम और निम्न वर्ग के किसान मौसम पर निर्भर रहते हैं तथा संसाधनों के अभाव में उनकी फसल की गुणवत्ता प्रभावित होती है। यदि फसल निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतरेगी, तो सरकार या तो उसे कम दाम पर खरीदेगी अथवा खरीदने से इनकार कर देगी। ऐसी स्थिति का लाभ व्यापारी उठा सकते हैं और किसानों से उनकी उपज मनमाने दामों पर खरीद सकते हैं। इससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान होने की आशंका रहेगी। कपास, गेहूं आदि की खरीदी में सरकार पहले से ही गुणवत्ता के मानक निर्धारित कर चुकी है। इसे लेकर किसानों में समय-समय पर आक्रोश देखने को मिलता है और कई बार वे आंदोलन के लिए भी मजबूर हो जाते हैं।
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