वारंट तामीली में पुलिस का डबल स्टैंडर्ड: रिटायर्ड पुलिस अधिकारी के दबाव में वारंट तामील कराने में कायदे ताक पर रखे
KHULASA FIRST
संवाददाता

लसूड़िया पुलिस से लेकर जोन-2 के अफसरों की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
लसूड़िया पुलिस का दोहरा रवैया अब खुद उसके गले की फांस बनता दिखाई दे रहा है। जिस थाने पर वारंट तामील के नाम पर एक वारंटी के घर में कायदों को ताक पर रखकर घुसने और सोना चोरी तक के आरोप लगे, उसी थाने ने 11 अपराधों से लदे आदतन अपराधी सूरज रजक के खिलाफ न्यायालय के स्थायी गिरफ्तारी वारंट को पांच साल तक तामील कराने की जहमत नहीं उठाई यानी रसूख की ड्यूटी बजाने वाली लसूड़िया पुलिस ने इस ओर आंखें बंद ही रखीं, जिसका खुलासा वरिष्ठ पत्रकार को धमकाने के मामले के दौरान हुआ।
आखिरकार आरोपी सूरज रजक ने अपने स्तर पर अभी हालही में राजीनामा कर मामले का निराकरण कर वारंट निरस्त करा लिया, जो कि लसूड़िया पुलिस सहित जोन-2 के अफसरों के लिए कई सवाल छोड़ गया है। सबसे बड़ा सवाल तो दोहरे मापदंड क्या रहा कि क्या पुलिस की सख्ती सिर्फ आम लोगों के लिए है?
14 जुलाई को वरिष्ठ पत्रकार आरके गुप्ता को धमकाने के मामले की जांच ने एक ऐसा राज खोल दिया, जिसने सिर्फ शराब माफिया सूरज रजक ही नहीं, बल्कि पुलिस व्यवस्था को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। खुलासा हुआ कि आदतन अपराधी सूरज रजक साल 2021 से पहले पहले गिरफ्तारी वारंटी फिर अक्टूबर 2023 से अदालत का स्थायी गिरफ्तारी वारंटी था, लेकिन लसूड़िया पुलिस ने उसे पांच साल तक न तो गिरफ्तार किया और न ही वारंट तामील कराया।
हैरत की बात यह है कि इसी दौरान वह शहर में खुलेआम घूमता रहा, कारोबार करता रहा, विदेश यात्राएं करता रहा और उसके खिलाफ नए-नए संगीन अपराध भी दर्ज होते रहे। जैसे ही पंढरीनाथ पुलिस ने धमकी केस की जांच में पुराने वारंट का जिक्र कर गिरफ्तारी की चेतावनी दी, वैसे ही माफिया सूरज रजक ने फुर्ती दिखाते हुए चेक बाउंस के पुराने परिवाद में आवेदक से समझौता कर, कोर्ट से वारंट निरस्त करा लिया।
वहीं, इसी दरमियान लसूड़िया पुलिस ने 1 अप्रैल को सेवानिवृत्त एसीपी राकेश कुमार गुप्ता और गौरव जैन से जुड़े पैसों के लेन-देन व चेक बाउंस के पुराने वारंट से जुड़े मामले में जमकर सक्रियता दिखाई। उचित वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना मास्टर चाबी से ताला खोलकर, सीसीटीवी कैमरे बंद कर वारंटी गौरव जैन के घर में घुस गई। मामले में घर से 22 तोला सोना चोरी का आरोप भी लगा।
नतीजा ये हुआ पहले एक एसआई सहित पांच पुलिसकर्मी और 27 अप्रैल को तत्कालीन टीआई तारेश सोनी तक की थाने से रवानगी हो गई। इसके बाद टीआई राजकुमार यादव करीब तीन महीने से थाने की कमान संभाले हुए हैं। वहीं, आईपीएस अमन सिंह राठौड़ भी मई 2026 के पहले सप्ताह से जोन 2 के डीसीपी हैं।
पराग सैनी करीब चार-पांच माह से विजय नगर एसीपी हैं। वहीं, अमरेंद्र सिंह नवंबर 2025 के आसपास से इसी जोन में एडिशनल डीसीपी है और लसूड़िया थाना इन्हीं अफसरों के अधीन आता है।
मामले में खुलासा फर्स्ट ने सभी अफसरों को फोन कर उनका पक्ष जानना चाहा, लेकिन सिर्फ एडीसीपी अमरेंद्र सिंह ने मामले में थाना प्रभारी राजकुमार यादव से ही बात करने की बात कही, बाकी किसी ने फोन रिसीव नहीं किया।
खाकी पर उठे बड़े सवाल...
एक रसूखदार वारंटी पांच साल तक खुला घूमता रहा, आखिर क्यों?
2021 से गिरफ्तारी वारंटी और 2023 से फरार स्थायी गिरफ्तारी वारंटी था, लेकिन 11 अपराधों से लदा आदतन अपराधी सूरज रजक की गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई? क्या पुलिस ने कभी गंभीरता से उसकी तलाश की?
वारंट तामील करने की कोशिश हुई भी थी या सिर्फ कागजों में?
क्या लसूड़िया थाने के रिकॉर्ड में वारंट तामील के प्रयास की कोशिश की जाना दर्ज है? यदि है तो उनका परिणाम क्या रहा?
सबसे बड़ा सवाल नए अपराध दर्ज होते रहे, तब भी वारंट क्यों नहीं दिखा?
बाउंड ओवर की कार्रवाई की गई, तब भी वारंट क्यों नहीं दिखा?
2025 में हवाई फायरिंग और 2026 में जमीन कब्जाने जैसे मामलों में कार्रंवाई के दौरान उसका लंबित वारंट पुलिस को क्यों नहीं दिखाई दिया?
यदि वह फरार वारंटी था तो क्या उसके खिलाफ कोई लुकआउट नोटिस या अन्य कार्रंवाई की गई थी? अगर नहीं, तो क्यों? इन दिनों उसने विदेश यात्राएं तक की।
क्या रसूख के आगे कानून बौना पड़ गया?
क्या प्रभावशाली राजनीतिक और आर्थिक पहुंच के कारण पुलिस ने जानबूझकर कार्रवाई से परहेज किया?
पंढरीनाथ पुलिस को दो दिन में वारंट मिल गया, लसूड़िया पुलिस को पांच साल में क्यों नहीं?
पांच साल में टीआई बदले लेकिन कार्रवाई की जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली क्यों?
जोन-2 के पूर्व व वर्तमान डीसीपी, एडीसीपी और एसीपी विजय नगर ने भी वारंट की समीक्षा नहीं की क्यों?
वारंट की मॉनिटरिंग किस स्तर पर हुई? क्या लंबित वारंटों की नियमित समीक्षा नहीं होती थी? यदि होती थी तो आरोपी सूरज रजक का नाम हर बार कैसे छूटता रहा?
कोर्ट के आदेशों की अनदेखी पर कौन
जवाब देगा? अदालत के स्पष्ट आदेश के
बावजूद यदि वारंट तामील नहीं हुआ तो क्या
यह सिर्फ लापरवाही है या न्यायालय के आदेशों की अवहेलना?
क्या अब होगी विभागीय जांच? यदि एक वारंटी पांच साल तक पुलिस की पकड़ से बाहर रहा, तो क्या संबंधित पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?
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