पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का पर्व है पितृ पक्ष: 16 दिन का यह पर्व डर या पाबंदी नहीं; बल्कि पूर्वजों के प्रति सम्मान का अवसर
KHULASA FIRST
संवाददाता

पितृ ऋण और हमारी संस्कृति, दानवीर कर्ण से जुड़ी है कथा
हेमंत उपाध्याय 99930-99008, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक रहने वाला 16 दिन का पितृ पक्ष (श्राद्ध) आरंभ हो गया है। सनातन परंपरा में यह समय अपने पूर्वजों को याद करने, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और तर्पण करने के लिए समर्पित माना जाता है।
हालांकि आधुनिक दौर में इस समय को लेकर कई तरह के भ्रम और डर भी फैलाए जाते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार यह अवधि भय की नहीं, बल्कि श्रद्धा और सादगी की है।
पौराणिक महत्व : महाभारत और दानवीर कर्ण की कथा... पंडितों के अनुसार पुराणों में उल्लेख मिलता है कि पितृ पक्ष के दौरान पूर्वज सूक्ष्म रूप से अपने वंशजों के घर आते हैं और उनसे तर्पण एवं अन्न-जल की अपेक्षा रखते हैं।
इस परंपरा से जुड़ी सबसे प्रमुख कथा महाभारत में दानवीर कर्ण की आती है। कथा के अनुसार कर्ण ने जीवनभर सोना-चांदी और धन-दौलत का दान किया, लेकिन अपने पितरों के नाम से अन्न और जल का दान कभी नहीं किया।
मृत्यु के बाद जब वे स्वर्ग पहुंचे, तो उन्हें भोजन के स्थान पर सोना ही खाने को मिला। जब उन्होंने इसका कारण पूछा तो देवराज इंद्र ने बताया कि उन्होंने कभी अपने पूर्वजों को जल और अन्न अर्पित नहीं किया था।
इसके बाद कर्ण को 15 दिन के लिए पृथ्वी पर वापस भेजा गया, ताकि वे अपने पूर्वजों का तर्पण कर सकें। यही 16 दिन की अवधि पितृ पक्ष कहलाई।
इन कार्यों को करने से बचें : कुछ पंडितों की राय है कि इस दौरान विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश या नया व्यापार शुरू करने जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। इसका कारण यह है कि यह समय शोक, स्मरण और सादगी का है, न कि उल्लास या प्रदर्शन का।
वहीं दूसरी ओर कुछ विद्वानों की यह राय है कि ऐसा नहीं है। अगर आप शुभ कार्य, खरीदी आदि करेंगे तो इससे आपके पितृ अथवा पूर्वज प्रसन्न होंगे। दलील यह भी है कि अपने बच्चों की तरक्की देखकर किसे खुशी नहीं होगी। इसलिए इसे अशुभ काल मानना गलत है।
तामसिक आहार से परहेज : मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज जैसे तामसिक भोजन से दूर रहने की सलाह दी जाती है, ताकि मन और शरीर में शुद्धि बनी रहे।
कलह और अनादर से बचें : घर में क्लेश, ऊंची आवाज में बहस या किसी भी व्यक्ति (विशेषकर वृद्धों) का अपमान न करें।
डरें नहीं, श्रद्धा रखें : कुछ पंडितों के अनुसार यह भ्रम है कि श्राद्ध न करने या किसी चूक से पितर श्राप देते हैं या भारी नुकसान होता है। सत्य यह है कि शास्त्रों में पितरों को माता-पिता के समान दयालु माना गया है।
वे कभी श्राप नहीं देते। यदि कोई व्यक्ति आर्थिक रूप से असमर्थ है, तो वह केवल एकांत में जाकर पूर्वजों को नमन कर ले या किसी पशु को हरा चारा खिला दे, तो भी श्राद्ध पूर्ण माना जाता है।
पितृ पक्ष का मूल संदेश अंधविश्वास या डर फैलाना नहीं है। यह अपनी जड़ों को याद करने, प्रकृति (पशु-पक्षियों) का आभार मानने और समाज के जरूरतमंद वर्गों की मदद करने का एक पवित्र अवसर है।
शास्त्रीय विधान अनुसार पितृ पक्ष में यह करें
तर्पण और श्राद्ध : जिस तिथि को परिवार के सदस्य का निधन हुआ हो उसी तिथि पर जल, तिल और कुश से उनका तर्पण और श्राद्ध करें। यदि तिथि ज्ञात न हो, तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन तर्पण किया जा सकता है।
पंचबलि (प्रकृति के प्रति दायित्व) : श्राद्ध के दिन भोजन बनने पर पांच हिस्से- गाय, कुत्ता, कौवा, देव (अग्नि) और चींटियों के लिए निकाले जाते हैं। यह परंपरा दर्शाती है कि हमारा जीवन प्रकृति और जीव-जंतुओं के साथ जुड़ा है।
अन्नदान और ब्राह्मण भोज : जरूरतमंदों, निर्धनों और ब्राह्मणों को भोजन कराना और वस्त्र दान करना विशेष पुण्यदायी माना गया है।
घर में सात्विकता : घर में साफ-सफाई रखें और सात्विक वातावरण बनाए रखें। अपने जीवित माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा करना ही सबसे मुख्य श्राद्ध है।
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