फिर जिंदा जले लोग: आखिर कब रुकेगा ‘चलती चिता’ का सफर; दौसा बस अग्निकांड ने फिर उठाए सवाल, स्लीपर कोच बसों की वैधता, सुरक्षा और सरकारी जवाबदेही कटघरे में
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
राजस्थान के दौसा में ऋषिकेश से इंदौर आ रही स्लीपर कोच बस में लगी भीषण आग ने एक बार फिर देश की परिवहन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आठ लोगों की मौत के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि आखिर जिन बसों में लगातार आग लग रही है और लोग जिंदा जल रहे हैं उनका संचालन किस स्पष्ट कानूनी प्रावधान के तहत किया जा रहा है? यह हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि वर्षों से उठाए जा रहे उन सवालों की भयावह याद दिलाता है जिनका जवाब आज तक सरकार और परिवहन विभाग नहीं दे सके हैं।
दौसा हादसे में आठ लोगों की मौत- 1 जुलाई 2026 को ऋषिकेश से इंदौर आ रही बस में लगी आग में इंदौर निवासी भूमि (20) और निर्मला गुप्ता (61), खरगोन निवासी प्रियंका पांडेय (35) और दीपक सिंह (29), सीहोर निवासी दीपू सिंह (60) तथा झाबुआ निवासी धरम सिंह (31) की मौत हो गई।
राजस्थान के कोलवा थाना प्रभारी मनोहर लाल ने पीटीआई-भाषा को बताया कि हादसे में चालक रामअवतार (28) और परिचालक कुलदीप (31) की भी मृत्यु हुई।
मुआवजा नहीं, जवाबदेही चाहिए- हर बड़े हादसे के बाद मृतकों के परिजनों को मुआवजे की घोषणा कर दी जाती है, लेकिन यह सवाल अनुत्तरित रह जाता है कि यदि सुरक्षा मानकों का पालन प्रभावी ढंग से हो, फिटनेस जांच सख्ती से हो और जिम्मेदारी तय की जाए, तो क्या ऐसी घटनाओं को रोका नहीं जा सकता?
आईपीएल टीम की बस में भी लगी आग- आईपीएल 2026 फाइनल के बाद होटल लौट रही गुजरात टाइटन्स टीम की बस में भी आग लगने की घटना सामने आई। हालांकि सभी खिलाड़ी सुरक्षित बाहर निकाल लिए गए। यह घटना भी बताती है कि बसों में आग लगने का खतरा लगातार बना हुआ है।
न्यायिक जांच और स्पष्ट कानून की मांग- दौसा अग्निकांड के बाद परिवहन विशेषज्ञों और नागरिकों के बीच यह मांग उठ रही है कि स्लीपर कोच बसों के निर्माण, पंजीयन, फिटनेस, अग्नि सुरक्षा और संचालन की पूरी व्यवस्था की स्वतंत्र जांच कराई जाए तथा सरकार स्पष्ट रूप से बताए कि इन बसों का संचालन किन वैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत किया जा रहा है।
यदि इन बुनियादी सवालों का स्पष्ट उत्तर नहीं दिया जाता, तो हर नया बस अग्निकांड केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता पर खड़ा होता एक और गंभीर प्रश्न माना जाएगा।
'खुलासा फर्स्ट' ने दो वर्ष पहले ही उठाए थे सवाल
संलग्न दोनों अखबारों के प्रथम पृष्ठ बताते हैं कि 25 और 26 अप्रैल 2024 को खुलासा फर्स्ट ने प्रमुखता से ‘जानलेवा हैं ये स्लीपर बसें’ और ‘सरकार को 180 अरब रुपए का लगा चूना’ शीर्षकों से विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित कर स्लीपर कोच बसों की वैधता, पंजीयन, परमिट और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए थे।
रिपोर्ट में दावा किया गया था कि मोटरयान अधिनियम में स्लीपर कोच बसों का स्पष्ट उल्लेख नहीं होने के बावजूद डीलक्स परमिट के आधार पर हजारों बसें संचालित हो रही हैं, साथ ही यह भी सवाल उठाया गया था कि इन बसों के निर्माण, पंजीयन और संचालन के लिए स्पष्ट कानूनी आधार क्या है। इन सवालों पर आज तक कोई सार्वजनिक और स्पष्ट जवाब सामने नहीं आया।
सरकार से आज भी वही सवाल
दौसा हादसे के बाद फिर वही प्रश्न सामने हैं
स्लीपर कोच बसों का संचालन आखिर किस कानून के तहत हो रहा है?
केंद्र और राज्यों ने इन्हें किस अधिनियम अथवा नियम के तहत मान्यता दी?
स्लीपर बॉडी निर्माण के तकनीकी मानक कब और कैसे लागू किए गए?
यात्रियों की सुरक्षा के लिए अलग फायर सेफ्टी और इमरजेंसी एग्जिट के नियम कब से अनिवार्य हुए?
यदि नियम हैं तो उनका पालन कौन सुनिश्चित कर रहा है?
इन सवालों पर अब तक कोई व्यापक सार्वजनिक स्पष्टीकरण उपलब्ध नहीं कराया गया है।
ग्वालियर-इंदौर बस में भी टला बड़ा हादसा
दौसा हादसे से पहले ग्वालियर से इंदौर आ रही स्लीपर वीडियो कोच बस में आगरा-मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग पर पनिहार रेलवे स्टेशन के पास अचानक आग लग गई थी। बस के इंजन से धुआं निकलने के बाद आग तेजी से फैल गई।
बस में करीब 45 यात्री सवार थे। चालक और क्लीनर की सतर्कता तथा यात्रियों की सूझबूझ से सभी सुरक्षित बाहर निकल गए। कई यात्रियों को जान बचाने के लिए बस की खिड़कियों के कांच तोड़कर बाहर कूदना पड़ा। यदि कुछ मिनट की भी देरी होती तो बड़ा हादसा हो सकता था।
सरकारी आंकड़े भी चिंता बढ़ाते हैं
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार पिछले तीन वर्षों में देशभर में बसों में आग लगने की 45 घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 64 लोगों की मौत और 145 लोग घायल हुए। सरकार ने बताया है कि एआईएस-119 मानकों में संशोधन कर फायर एक्सटिंग्विशर, अतिरिक्त आपातकालीन निकास और अन्य सुरक्षा प्रावधान अनिवार्य किए गए हैं। इसके बावजूद लगातार सामने आ रही घटनाएं इन मानकों के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करती हैं।
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