नई घोड़ी, नया दाम: माल सिंह, फिर दीपक सिंह और अब सुदाम खाड़े समय से पहले ‘खो’ कर दिए गए
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नए मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल के पदभार संभालने के महज 24 घंटे के भीतर बड़े अफसरों की बड़ी तबादला सूची जारी हो गई। संभवतया पूर्व मुख्य सचिव के जाने का इंतजार हो रहा होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जंतर-मंतर आंदोलन को लेकर जिस तरह आधी रात में संदेश दिया, इसी तरह राज्य सरकार ने भी आधी रात एक साथ 20 आईएएस अधिकारियों के तबादले कर दिए।
कुछ अधिकारियों के फेरबदल को गोपनीय रखा गया। इसी तरह की गोपनीयता रखकर नहीं चाहते हुए भी इंदौर संभाग को नया कमिश्नर दे दिया, तो खरगोन समेत आधा दर्जन जिलों को नए कलेक्टर।
स वाल यह है कि क्या इतनी तेजी से बदलते अधिकारी वाकई जमीन पर कुछ बदल पाते हैं, या हर बार "नई घोड़ी, नया दाम’ कहावत चरितार्थ होकर रह जाती है। बीते तीन से चार वर्ष में इंदौर संभाग में तीन अधिकारी समय से पहले चलते कर दिए गए। माल सिंह तो 8 महीने भी नहीं रह पाए।
संभाग के ग्रामीण अंचल और वनवासी इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और खेती-किसानी की योजनाओं पर अच्छा काम कर रहे थे, लेकिन इंदौर के निवेश को नियंत्रित करने वाली बड़े अफसरों की बड़ी लॉबी ने उन्हें 1 साल भी पूरा नहीं करने दिया।
फिर आए दीपक सिंह। वह पूरी तरह सक्रिय होते, उससे पहले किसी दूसरे अफसर की जवाबदेही का ठीकरा उनके माथे फुड़वा दिया गया और सरकारी अस्पताल के सरकारी तंत्र के मुंहलगे हट्टे-कट्टे और भारी-भरकम चूहे उनकी कुर्सी कुतर गए।
कहा गया कि छोटे की जगह बड़े ठाकुर निपट गए। उसके बाद आए डॉ. सुदाम खाड़े। इंदौर की तासीर और नब्ज की पकड़ उन्होंने बहुत जल्दी कर ली थी। संभाग का भ्रमण भी चल रहा था। नए कामकाज भी शुरू करने की योजनाएं बना ली थीं कि इसी बीच उन्हें रातोरात भोपाल पदस्थ करवा दिया गया।
वे चाहते थे कुछ समय और इंदौर में मिल जाए, लेकिन उनकी जरूरत संभाग से ज्यादा मुख्यमंत्री सचिवालय के लिए थी, इसलिए नहीं रुक पाए।
यह पोस्टिंग बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, लेकिन डॉ. सुदाम को सत्ता की चकाचौंध प्रभावित नहीं करती होगी। वैसे भी वह लो प्रोफाइल और जन-सरोकार के प्रति ज्यादा समर्पित रहते हैं, इसलिए नई पोस्टिंग से बचना चाहते होंगे।
सितंबर में आए थे, जुलाई में इंदौर से टिकट कट गया। इस तरह करीब 3 वर्षों के अंतराल में चौथा कमिश्नर इंदौर को मिला। इंदौर कमिश्नर की पोस्टिंग मानो यूज एंड थ्रो जैसी हो गई। संभाग का आयुक्त सरकार को भी अब शहर के लिए ही चाहिए, शेष संभाग के लिए नहीं, क्योंकि ग्रामीण इलाकों को तो शहरीकरण के लिए वैसे भी खत्म करना ही है, इसलिए जल्दी-जल्दी अदला-बदली से कोई फर्क नहीं पड़ता, ऐसा सिस्टम सोचता होगा।
सुदाम की जगह नया सूर्योदय लेकर आए हैं भास्कर, जो संभाग के 29वें कमिश्नर हो गए हैं। आप कब तक टिके रहेंगे, यह आप भी नहीं जानते होंगे हमारी तरह। मालवा-निमाड़ इलाके के इतिहास, भूगोल, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को समझने में थोड़ा समय तो आपको लगेगा।
इंदौर की जमीन वैसे बहुत उर्वर है और इसीलिए जमीन मजबूत बनाए रखने के लिए भोपाल से खींची गई लक्ष्मणरेखा में रहना होता है, ऐसा समझा और कहा जाता है।
भास्कर के लिए यह शहर और संभाग पूरी तरह नया है। यहां प्रशासन, राजनीति, नेताओं के साथ भांति-भांति की भारी-भरकम ‘फाइलों और लिक्विडिटी का फ्लो’ बनने-बिगड़ने या बिगाड़ने का खेल समझने में वक्त लगता है।
जादूगरी और बाजीगरी के इस मायावी शहर और संभाग पर राज करना वैसे तो किसी भी तरह से चुनौती नहीं है, फिर भी समझ और पकड़ के लिए जब तक अधिकारी सिद्धहस्त होता है, उसे खो-खो के खेल की तरह ‘खो’ कर दिया जाता है।
वैसे इंदौर संभाग के राजस्व की कमिश्नरी शहर तक ही सिमटी रहती है। संभाग की कोई परवाह नहीं करता। ऊपर वाले जिम्मेदार बड़े अफसर भी इस बारे में कोई संज्ञान नहीं लेते, क्योंकि रिमोट भोपाल से नियंत्रित होता है। जैसा चल रहा है, चलता रहे इससे ज्यादा लोड कोई नहीं लेता।
इंदौर विकास प्राधिकरण के काम-धंधे इतने विशाल और पुण्य वाले हैं कि संभाग के लिए कोई भला क्यों समय निकाले? इंदौर विकास प्राधिकरण की परिक्रमा के आगे 12 ज्योतिर्लिंग और चारधाम भी फीके प्रतीत होते हैं।
2010 बैच के अधिकारी भास्कर लक्षकार ने सोमवार को इंदौर संभागायुक्त का पदभार संभाला। इससे पहले वे खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग में आयुक्त-सह-संचालक थे। प्रदेश में मुरैना, गुना और रतलाम जैसे जिलों की कलेक्टरी का उनका अनुभव उन्हें मैदानी प्रशासन की समझ देता है।
संयोग यह कि खाड़े कभी लक्षकार के भी कलेक्टर रह चुके हैं, जब वे प्रोबेशनर थे। पदभार लेने से पहले लक्षकार ने खजराना गणेश और रणजीत हनुमान मंदिर में दर्शन किए और टीम वर्क के साथ काम करने की बात कही। इस बदलाव के तहत 7 जिलों के कलेक्टर बदले गए हैं।
गुरु जनता से जुड़ेंगे तो पाएंगे गुरु मंत्र
खरगोन कलेक्टर के लिए गुरु प्रसाद को सरकार ने मौका दिया है। खरगोन जिले में काम करने के बहुत अवसर हैं और उसके लिए गुरु प्रसाद का टेक्नोलॉजी में मास्टर होना काम आ सकता है। प्रशासन और खेती-किसानी के काम में नवाचार के लिए गुरु प्रसाद टेक्नोलॉजी का उपयोग करवा सकते हैं, लेकिन इस सबके लिए उन्हें पहले ग्रामीण परिवेश से जुड़ना होगा। गांव, खेत, खलिहान, पर्यावरण, जंगल, वनवासी और नर्मदा नदी को समझना होगा।
यानी कैबिन कल्चर से बाहर आकर जनता से कनेक्ट होना होगा, तभी वह जिले के संतुलित, सतत सस्टेनेबल डेवलपमेंट का गुरु मंत्र पा सकेंगे। रतलाम में अजय कटेसरिया, अनूपपुर में रत्नाकर झा, मंदसौर में दिव्यांक सिंह, आगर-मालवा में डॉ. शेरसिंह मीणा और खरगोन में गुरु प्रसाद नए कलेक्टर नियुक्त हुए हैं। वहीं रतलाम की पूर्व कलेक्टर मिशा सिंह को शहडोल का कलेक्टर बनाया गया है और अदिति गर्ग को खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग में पदस्थ किया गया है।
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