सांसद लालवानी के पत्र से शुरू हुई नई बहस: उज्जैन-इंदौर महानगर क्षेत्र; रीजन का मुख्यालय इंदौर करने की मांग
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
उज्जैन-इंदौर महानगर क्षेत्र (यूआईएमआर) को लेकर प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है। सांसद शंकर लालवानी ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को लिखे पत्र में महानगर क्षेत्र का मुख्यालय इंदौर करने की मांग की है।
पत्र में जनसंख्या, आर्थिक गतिविधियों और विशेषज्ञों के सुझाव के आधार पर इंदौर को सबसे उपयुक्त केंद्र बताया गया है वहीं प्रशासनिक और सेवानिवृत्त अधिकारियों का भी कहना है एक बड़े महानगर की बजाय दो की रचना हर दृष्टिकोण से न्यायसंगत होगी।
लालवानी के पत्र ने एक व्यापक बहस को जन्म दे दिया है। यह केवल मुख्यालय की नहीं, बल्कि उस विकास मॉडल की है जिसे प्रदेश अगले 25 वर्षों के लिए चुनना चाहता है।
क्या मालवा का भविष्य एक विशाल केंद्रीकृत महानगर क्षेत्र में है या विकेंद्रीकृत, पर्यावरण-संतुलित और क्षेत्रीय आवश्यकताओं पर आधारित विकास मॉडल में? आने वाले समय में यही प्रश्न यूआईएमआर की सफलता या असफलता तय करेगा।
लेकिन पत्र केवल मुख्यालय का प्रश्न नहीं उठाता उससे भी बड़ा प्रश्न है क्या इंदौर और उज्जैन दो अलग चरित्र वाले क्षेत्रों को एक विशाल महानगर क्षेत्र में समेटना वास्तव में प्रदेश के हित में है?
सांसद लालवानी का तर्क है प्रस्तावित महानगर क्षेत्र की लगभग 75 प्रतिशत आबादी इंदौर के प्रभाव क्षेत्र में आती है। आर्थिक गतिविधियों, उद्योग, निवेश, विशेषज्ञ संस्थानों और प्रशासनिक संसाधनों का भी सबसे बड़ा केंद्र इंदौर है। इसलिए मुख्यालय इंदौर होना चाहिए।
किसी भी संस्थान का मुख्यालय वहां स्थापित किया जाता है जहां संसाधन, कनेक्टिविटी और कार्य संचालन की सुविधा अधिक हो। लेकिन इसी तर्क में एक दूसरा सवाल भी छिपा है। यदि 75 प्रतिशत आबादी, आर्थिक गतिविधियां और संस्थागत शक्ति इंदौर केंद्रित हैं, तो क्या इससे महानगर क्षेत्र का पूरा विकास भी इंदौर-केंद्रित नहीं हो जाएगा?
मुख्यालय की बहस से बड़ा सवाल
असल बहस मुख्यालय इंदौर या उज्जैन होने की नहीं, असल सवाल है क्या ऐसा महानगर क्षेत्र बनाया जा रहा है जिसकी भौगोलिक, आर्थिक और सामाजिक विविधता इतनी अधिक है कि उसका प्रभावी संचालन भविष्य में कठिन हो सकता है।
देश में हाल के वर्षों में शासन व्यवस्था को नागरिकों के निकट लाने नए जिले, संभाग बने और छोटे प्रशासनिक ढांचों पर जोर दिया गया। तर्क यही था छोटी इकाइयां अधिक उत्तरदायी और प्रभावी होती हैं। ऐसे समय इंदौर और उज्जैन संभाग को जोड़कर विशाल महानगर क्षेत्र बनाने का विचार स्वाभाविक रूप से प्रश्नों के घेरे में आता है।
बड़े महानगर बनाने के पक्षधर कहते हैं इससे परिवहन की समेकित योजना बनेगी, एक्सप्रेस-वे और रेल नेटवर्क का बेहतर विकास होगा। निवेश आकर्षित होगा, औद्योगिक कॉरिडोर विकसित होंगे लेकिन शहरी नियोजन विशेषज्ञ बताते हैं समेकित योजना बनाने के लिए विशाल प्रशासनिक क्षेत्र आवश्यक नहीं।
दिल्ली, मुंबई व बेंगलुरु के अनुभव बताते हैं बड़े महानगर क्षेत्रों में अक्सर संसाधनों व निवेश का अत्यधिक केंद्रीकरण होता है जबकि परिधीय क्षेत्र अपेक्षित लाभ से वंचित रह जाते हैं।
दो महानगर क्षेत्र ज्यादा अनुकूल
शहरी विशेषज्ञों का मत है कि सरकार चाहे तो इंदौर और उज्जैन मेट्रोपॉलिटन रीजन दो इकाइयां बना सकती है। दोनों के बीच परिवहन, निवेश और क्षेत्रीय विकास के लिए एक संयुक्त समन्वय परिषद बनाई जा सकती है।इससे स्थानीय जरूरतों के अनुसार विकास होगा और साथ ही क्षेत्रीय स्तर पर समन्वय भी रहेगा।
सांसद लालवानी का पत्र संकेत देता है महानगर क्षेत्र की संरचना और मुख्यालय को लेकर राजनीतिक एवं प्रशासनिक स्तर पर विचार-विमर्श व्यावहारिक धरातल पर होना चाहिए। इंदौर आर्थिक राजधानी है तो उज्जैन सांस्कृतिक और धार्मिक।
ऐसे में स्वाभाविक है दोनों क्षेत्रों की आकांक्षाएं और प्राथमिकताएं अलग हों। सरकार को केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन, पर्यावरण संरक्षण, जल सुरक्षा और ग्रामीण हितों को भी निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनाना होगा।
परियोजना क्लाइमेट चेंज पर केंद्रित नहीं
परियोजना की सबसे कम चर्चित लेकिन सबसे महत्वपूर्ण चुनौती पर्यावरण है क्योंकि यह परियोजना क्लाइमेट चेंज पर केंद्रित नहीं है जो वर्तमान और भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है इंदौर और उज्जैन के बीच का क्षेत्र केवल जमीन का खाली टुकड़ा नहीं है।
यह मालवा का उपजाऊ कृषि क्षेत्र है जहां हजारों किसान खेती करते हैं, भूजल स्रोत मौजूद हैं, तालाब और जलग्रहण क्षेत्र हैं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था सक्रिय है। यदि पूरे क्षेत्र को एक विशाल शहरी विस्तार क्षेत्र के रूप में देखा गया तो आने वाले वर्षों में कृषि भूमि, जल संसाधनों और हरित क्षेत्रों पर गंभीर दबाव पड़ सकता है।
आज दुनिया भर में ‘ब्लू-ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर’ की बात हो रही है, जबकि हमारे यहां कहीं ऐसा न हो कि विकास की दौड़ में प्राकृतिक संपदा पीछे छूट जाए।
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