चौबीसों घंटे प्रकृति खुद करती है शिवलिंग का दुग्धाभिषेक: चार धाम मार्ग का महा रहस्य बड़कोट की वह ‘गुप्त गुफा’
KHULASA FIRST
संवाददाता

बड़कोट की प्रकटेश्वर गुफा, विज्ञान जिसे ‘चूने का पानी’ कहता है, भक्त उसे महादेव का चमत्कार मान शीश झुकाते हैं
यमुनोत्री हाईवे का महा-रहस्य- पहाड़ों के सीने में छिपी वो गुप्त गुफा, जिससे अनजान गुजर जाते हैं मुसाफिर
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
यमुनोत्री नेशनल हाईवे पर दौड़ती गाड़ियां, हॉर्न का शोर और चार धाम की जल्दबाजी में भागते श्रद्धालु... इस आपाधापी से महज कुछ ही दूरी पर पहाड़ों के सीने में एक ऐसा रहस्य छुपा है, जिससे आज भी 99 फीसदी मुसाफिर अनजान हैं।
उत्तरकाशी के बड़कोट के पास स्थित ‘प्रकटेश्वर महादेव गुफा’ के भीतर कदम रखते ही जैसे वक्त ठहर जाता है। यहां कोई पुजारी नहीं, बल्कि खुद कुदरत सदियों से एक आदि-शिवलिंग पर दूध जैसी धवल धार टपका रही है। आस्था और विज्ञान को एक ही धरातल पर लाकर खड़ा करने वाले उत्तराखंड के इस परम गुप्त कोने की कहानी रोमांच से भरी है।
चार धाम यात्रा के यमुनोत्री मार्ग पर बड़कोट कस्बे के नजदीक मुख्य सड़क से कुछ कदम नीचे उतरते ही इस रहस्यमयी गुफा का संकरा मुहाना दिखाई देता है। बाहर भले ही कितनी भी गर्मी हो, गुफा के भीतर प्रवेश करते ही तापमान में अचानक भारी गिरावट महसूस होती है और चारों तरफ एक अलौकिक सन्नाटा छा जाता है।
प्राकृतिक रूप से बनी यह चूना पत्थर की गुफा कलाकृति का बेजोड़ नमूना है। हवा और पानी के सदियों पुराने प्राकृतिक कटाव ने यहां की दीवारों और छत पर ऐसी आकृतियां उकेरी हैं, जिन्हें देखकर आंखें फटी की फटी रह जाती हैं। यहां दीवारों पर प्राकृतिक रूप से उभरे गणेश जी, शेषनाग की फन जैसी आकृति और अनगिनत छोटे-छोटे शिवलिंग दिखाई देते हैं।
पहली नजर में ऐसा भ्रम होता है जैसे किसी महान शिल्पकार ने बरसों एकांत में बैठकर इस गुफा को तराशा हो, लेकिन स्थानीय निवासी बताते हैं कि यह पूरी तरह प्राकृतिक और स्वयंभू है।
वह ‘सफेद धार’ जिसका रहस्य आज भी अनसुलझा है
इस गुफा का सबसे बड़ा चमत्कार इसके गर्भगृह में देखने को मिलता है। गुफा के केंद्र में एक प्राचीन प्राकृतिक शिवलिंग स्थापित है। इस शिवलिंग के ठीक ऊपर, गुफा की पथरीली छत से चौबीसों घंटे, बारह महीने पानी की बूंदें गिरती हैं। हैरान करने वाली बात यह है कि यह पानी पारदर्शी नहीं, बल्कि बिल्कुल गाय के दूध की तरह गाढ़ा और सफेद दिखाई देता है।
भीषण गर्मी के दिनों में जब पहाड़ों के कई पारंपरिक जलस्रोत सूख जाते हैं, तब भी इस आदि-शिवलिंग पर होने वाला यह प्राकृतिक ‘दुग्धाभिषेक’ कभी नहीं थमता। स्थानीय ग्रामीणों के लिए यह साक्षात महादेव की सत्ता का प्रमाण है, जहां प्रकृति खुद अपनी सबसे शुद्ध सामग्री से ईश्वर की आराधना कर रही है।
लाखों की भीड़, फिर भी क्यों छूट जाता है यात्रियों से यह पौराणिक पड़ाव?... एक बड़ा सवाल यह उठता है कि हर साल लाखों श्रद्धालुओं की मेजबानी करने वाले उत्तराखंड का यह अद्भुत स्थल मुख्यधारा के पर्यटन मानचित्र पर क्यों नहीं आ पाया।
इसका मुख्य कारण खोजी दृष्टिकोण की कमी और प्रशासनिक उदासीनता है। यमुनोत्री की चढ़ाई पूरी करने की होड़ में अधिकांश टूर ऑपरेटर और तीर्थयात्री बड़कोट से सीधे आगे निकल जाते हैं।
हाईवे पर इस गुफा की ओर इशारा करने वाला कोई बड़ा या आकर्षक सूचना बोर्ड नहीं है। प्रचार-प्रसार के अभाव में यह पुरातात्विक और पौराणिक धरोहर आज भी केवल स्थानीय ग्रामीणों और कुछ गिने-चुने ट्रैकर्स तक ही सीमित रह गई है।
विज्ञान बनाम आस्था: तर्कों की कसौटी पर कुदरत का चमत्कार... इस अनोखी गुफा को लेकर विज्ञान और सनातन आस्था के अपने-अपनें दिलचस्प तर्क हैं। भूवैज्ञानिकों के अनुसार, यह एक शुद्ध वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसे ‘स्टैलेक्टाइट और स्टैलेग्माइट’ कहा जाता है।
चूने की चट्टानों के बीच से जब पानी रिसकर नीचे आता है, तो वह अपने साथ कैल्शियम कार्बोनेट और अन्य खनिज घोलकर लाता है। इसी खनिज के कारण पानी का रंग दूध जैसा सफेद हो जाता है और समय के साथ जमकर यह ठोस आकृतियों का रूप ले लेता है।
दूसरी ओर, स्थानीय श्रद्धालुओं का तर्क है कि अगर यह केवल एक सामान्य भूगर्भीय रिसाव है, तो यह पूरी गुफा में इधर-उधर न गिरकर बिल्कुल मुख्य शिवलिंग के केंद्र बिंदु पर ही क्यों गिरता है? सदियों से इस धार का सटीक निशाना और इसका गाढ़ा सफेद रंग विज्ञान के तर्कों से परे लोक-विश्वास को अधिक मजबूत करता है।
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