लखनऊ में मातम: इंदौर में बारूद पर बचपन; कब चेतेंगे जिम्मेदार, क्या शहर का कोचिंग हब्स भी हादसे की बाट जोह रहा
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सोमवार की दोपहर जो तस्वीरें आईं, उन्होंने केवल टीवी स्क्रीन को लाल नहीं किया, बल्कि देश के हर उस माता-पिता के कलेजे को छलनी कर दिया जिनका बच्चा घर से दूर किसी शहर में ‘भविष्य’ बनाने गया है।
बहुमंजिला इमारत में भड़की आग की लपटों से बचने के लिए मासूम बच्चों ने खुद को बाथरूम में बंद कर लिया। वे सोच रहे थे कि पानी और बंद दरवाजा उन्हें बचा लेगा, लेकिन कंक्रीट के उस बंद ढांचे में वेंटिलेशन न होने के कारण जो जहरीला धुआं भरा, उसने चंद मिनटों में उन मासूमों के फेफड़ों को चोक कर दिया।
वे अपनी आखिरी सांस तक जिंदगी के लिए तड़पते रहे और आख़िरकार हार गए। अब तक की जानकारी के अनुसार लखनऊ के हादसे में अब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें 3 महिलाएं और 12 पुरुष हैं। इनमें ज्यादातर छात्र हैं।
जब लखनऊ में मलबे और कंक्रीट की दीवार को कटर से काटकर इन बच्चों की बेजान देह को बाहर निकाला जा रहा था, तब निश्चित रूप से मध्य प्रदेश की आर्थिक और शिक्षा राजधानी इंदौर के सबसे बड़े ‘स्टूडेंट हब’ भंवरकुआं, विजयनगर, गीताभवन की गलियों में और चौराहों पर हजारों बच्चे चाय-काफी-नाश्ते के ठीयों पर बैठकर इसी खौफनाक मंजर की चर्चा कर रहे थे, लेकिन हकीकत यह है कि जिस मौत से लखनऊ के बच्चे हारे हैं, उसी मौत के मुहाने पर रोज इस शहर में भी बड़ी संख्या में छात्र बैठ रहे हैं।
अतीत के वो जख्म क्या इंदौर भूल गया है... यह कहना कि इंदौर सुरक्षित है, खुद को सबसे बड़े धोखे में रखने जैसा है। इंदौर का इतिहास गवाह है कि यहां बार-बार नियति ने हमें चेतावनी दी है, लेकिन जिम्मेदारों से साठगांठ और व्यापारिक मुनाफे की भूख ने हर सबक को ठंडे बस्ते में डाल दिया।
2023 के दिसंबर में भंवरकुआं चौराहे के पास बहुमंजिला ‘वेद टावर’ की निचली मंजिल के इलेक्ट्रिक मीटर बॉक्स में शॉर्ट सर्किट से आग लगी थी। ऊपरी मंजिलों पर कोचिंग और लाइब्रेरी थीं, जहा सैकड़ों छात्र पढ़ रहे थे।
जब सीढ़ियों पर गाढ़ा काला धुआं फैल गया और भागने का इकलौता रास्ता बंद हो गया, तो बच्चों ने जान बचाने के लिए तीसरी-चौथी मंजिल की खिड़कियों और बालकनी से रस्सियों के सहारे लटकना शुरू किया।
उस दिन इंदौर की रूह कांप गई थी। गनीमत रही कि स्थानीय लोगों की बहादुरी और दमकल की क्रेन ने समय रहते बच्चों को उतार लिया, वरना लखनऊ जैसा मंजर इंदौर दो साल पहले ही देख चुका होता।
इसी तरह 2024 के अगस्त में गीता भवन इलाके की एक मल्टी-स्टोरी बिल्डिंग में नीचे शोरूम में आग लगी और ऊपर चल रही कोचिंग क्लासेस में अफरा-तफरी मच गई। बड़ी संख्या में बच्चों को जैसे-तैसे निकाला गया।
उल्लेखनीय है कि जब 2019 में सूरत के तक्षशिला कॉम्प्लेक्स में आग लगी थी, तब इंदौर जागा था। शहर के कोचिंग कॉम्प्लेक्सों और होस्टल्स पर ताबड़तोड़ छापे मारे गए, बेसमेंट सील किए गए, लेकिन जैसे ही समय बीता, व्यवस्था फिर वैसी ही ‘कबाड़खाना’ हो गई। अब भी समय-समय पर दिखावटी रस्म अदायगी होती है, इस हादसे के बाद भी होगी।
तारों का मकड़जाल और गैस सिलेंडरों का साम्राज्य... लगभग हर बिल्डिंग के मुहाने और सीढ़ियों के ठीक नीचे बिजली के बड़े-बड़े मीटर और खुले तारों का जंजाल झूल रहा है।
रही-सही कसर इन कोचिंग संस्थानों के आसपास तंग कमरों में चल रहे एकाधिक अवैध पीजी और होस्टलों की रसोइयां पूरी कर देती हैं, जहां गैस सिलेंडरों का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है।
मॉक ड्रिल का ककहरा तक नहीं मालूम...लखनऊ के हादसे ने एक और कड़वा सच उजागर किया है। हमारे बच्चों को संकट के समय खुद को बचाना नहीं आता।
शहर में कई जगह कोचिंग संस्थानों की दीवारों पर लाल रंग के आग बुझाने वाले सिलेंडर केवल कागजी औपचारिकता और नगर निगम के जुर्माने से बचने के लिए टांगे गए हैं।
यदि औचक जांच कर दी जाए, तो पता चलेगा कि इनमें से आधे से ज्यादा सिलेंडर एक्सपायरी डेट के हो चुके हैं। सबसे डरावनी बात यह है कि वहां पढ़ने वाले बच्चों और पढ़ाने वाले स्टाफ को यह तक नहीं मालूम कि आग लगने पर उस सिलेंडर की पिन को कैसे खींचना है और उसे ऑपरेट कैसे करना है। पुरानी बिल्डिंगों में लगे वॉटर होज पाइप और ऑटोमैटिक अलार्म सिस्टम सालों से बंद पड़े हैं और कबाड़ हो चुके हैं।
हजारों छात्र और युवा आंखों में सपना लेकर निकलते हैं...हर दिन इस जिंदादिल और उम्मीदों से भरे शहर में सुबह जब हजारों छा- छात्राएं और युवा अपनी आंखों में पीएससी, यूपीएससी, बैंकिंग या नीट जैसी परीक्षाओं को क्रैक करने का सपना लेकर तंग गलियों से गुजरकर बहुमंजिला इमारतों की सीढ़ियां चढ़ते हैं, तो उनके माता-पिता बेफिक्र होते हैं, लेकिन उन्हें नहीं पता कि जिस भविष्य को संवारने के लिए उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई इंदौर भेजी है, वह व्यवस्था की घोर लापरवाही के कारण बारूद के ढेर पर बैठा है।
मलबे से उठी चीखें सवाल पूछ रही...लखनऊ के मलबे से उठी चीखें सवाल पूछ रही हैं। क्या इंदौर नगर निगम, जिला प्रशासन और फायर विंग किसी बड़ी विभीषिका के लिए अब फिर जागृत होने का समय आ गया है।
आम तौर पर हादसों के बाद ‘दिखावे की जांच’ करने वाली संस्कृति को बदला जाए और नियमों को ताक पर रखकर मौत की दुकानें चला रहे संचालकों पर सख्त कानूनी शिकंजा कसा जाए। इससे पहले कि इंदौर की कोई लाइब्रेरी किसी मासूम की चिता बन जाए- जिम्मेदारों को जागना ही होगा।
जमीनी हकीकत डराती है
अगर आज हम कोचिंग संस्थानों के अंदरूनी हिस्सों में झांकेंगे, तो हकीकत देखकर एकबारगी सांसें थम जाएंगी। एकाधिक स्थानों पर कोचिंग संस्थान ऐसी इमारतों में हैं जहां ऊपर जाने और नीचे आने के लिए संकरी और घुमावदार सीढ़ी है। लिफ्ट बिजली कटते ही बंद हो जाती है। आपातकालीन निकास के नाम पर जगह भी नहीं छोड़ी गई है।
मौत के कुएं जैसे बेसमेंट ‘एसी लाइब्रेरी’
इन दिनों शहर में ‘सेल्फ स्टडी’ के नाम पर सैकड़ों एसी लाइब्रेरी खुल गई हैं। बिना किसी प्राकृतिक वेंटिलेशन के, एक-एक बंद बेसमेंट या फ्लैट में बच्चों को ठसाठस बिठा दिया जाता है। अगर यहां बिजली गुल हो और शॉर्ट सर्किट से धुआं फैले, तो ये लाइब्रेरी सीधे ‘गैस चैंबर’ में तब्दील हो जाएंगी, जहां से जिंदा निकलना चमत्कार ही होगा।
सुरक्षा के क्या होने चाहिए इंतजाम
शहर को किसी बड़ी विभीषिका से बचाना है, तो कागजी नोटिसों के खेल को बंद करके बुनियादी नियमों को कड़ाई से लागू करना होगा।
अनिवार्य डुअल एग्जिट - किसी भी ऐसी इमारत को कोचिंग या लाइब्रेरी चलाने की अनुमति न दी जाए, जिसमें आने-जाने के लिए दो अलग-अलग और चौड़ी सीढ़ियां न हों।
इलेक्ट्रिक डक्ट का पृथक्करण- बिजली के मीटर और मुख्य केबलिंग को सीढ़ियों और निकास मार्ग से पूरी तरह दूर या फायर-प्रूफ बॉक्स में शिफ्ट किया जाए, ताकि आग लगने पर भागने का रास्ता ब्लॉक न हो।
अनिवार्य प्रैक्टिकल मॉक ड्रिल-हर तीन महीने में कोचिंग संस्थानों में दमकल विभाग की निगरानी में ‘फायर इवैक्युएशन ड्रिल यानी बाहर निकलने का अभ्यास अनिवार्य हो। स्टाफ और बच्चों को फायर फाइटिंग किट इस्तेमाल करना सिखाया जाए।
स्मार्ट वेंटिलेशन और बेसमेंट पर पाबंदी- व्यावसायिक इमारतों के बेसमेंट में चल रही हर उस लाइब्रेरी और क्लासरूम को तत्काल बंद या सील किया जाए, जिसमें वेंटिलेशन के लिए कम से कम दो बड़ी खिड़कियां या एग्जॉस्ट सिस्टम न हो।
थर्ड पार्टी फायर सेफ्टी ऑडिट -नगर निगम और फायर विंग नेशनल बिल्डिंग कोड के तहत हर 6 महीने में औचक निरीक्षण करे। जिन संस्थानों के पास वैध और एक्टिव फायर एनओसी न हो, उन्हें बिना किसी रसूख या राजनीतिक दबाव के सीधे सील किया जाए।
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