करोड़ों भारतीयों की आस्था की धुरी मोक्षदायिनी मां गंगा
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
गंगा का महा-रहस्य आज भी अनसुलझा है, विज्ञान कहता है गोमुख, पुराणों में बिंदुसर और संतों के पास गुप्त गुफा का सच, भगीरथ शिला और पांडवों की तपोस्थली के गवाह उत्तराखंड के हिमालयी शिखरों में दफन हैं कई आध्यात्मिक राज, अलकनंदा में पानी ज्यादा, फिर भगीरथी ही क्यों असली गंगा? जल विज्ञान की फाइलों और सनातन परंपरा में छिड़ी बहस।
करोड़ों भारतीयों की आस्था की धुरी, मोक्षदायिनी और पापनाशिनी मां गंगा की महिमा का वर्णन ऋग्वेद के प्राचीन श्लोकों से लेकर आधुनिक पर्यावरण विज्ञान की फाइलों तक फैला हुआ है, लेकिन एक ऐसा बुनियादी सवाल है जो हजारों साल से अनसुलझा और कौतूहल का विषय बना हुआ है। आखिर गंगा का असली और मूल उद्गम कहां है?
आमतौर पर देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालु उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित ‘गंगोत्री मंदिर’ को ही गंगा का उद्गम मान लेते हैं, लेकिन भौगोलिक यथार्थ यह है कि नदी का वास्तविक स्रोत यहां से लगभग 18 किलोमीटर की बेहद दुर्गम चढ़ाई पर स्थित ‘गोमुख ग्लेशियर’ है।
दिलचस्प बात यह है कि इसी स्थान पर आकर आधुनिक विज्ञान की सीमाएं ठहर जाती हैं और यहां से आगे सनातन की पौराणिक परंपराएं कदम बढ़ाती हैं।
पुराणों और संतों का साफ कहना है कि गोमुख तो महज एक दृश्य द्वार है, गंगा का असली स्रोत तो हिमालय के अंतस में और भी कहीं गहरा है।
तीन दृष्टिकोण- जब विज्ञान, पुराण और साधु-परंपरा की परतें खुलीं
गंगा के उद्गम के इस रहस्य को समझने के लिए देश में तीन अलग-अलग धाराएं काम करती हैं। वैज्ञानिक, पौराणिक और हिमालय के उच्च शिखरों पर रहने वाले साधुओं की अनकही परंपरा। रोचक बात यह है कि ये तीनों दृष्टिकोण एक-दूसरे को काटते नहीं, बल्कि इस महा-रहस्य की अलग-अलग परतों को उजागर करते हैं।
खिसकता जा रहा है हिमखंड का ‘भौगोलिक सिरा’
वैज्ञानिक दृष्टि से गंगोत्री ग्लेशियर उत्तराखंड के हिमालय में 4,200 मीटर से भी अधिक की दुर्गम ऊंचाई पर स्थित है। ‘गोमुख’ का शाब्दिक अर्थ है ‘गाय का मुख’। यहां बर्फ की एक विशाल दीवार से पानी की एक अविरल धारा फूटती है, जिसकी आकृति प्राकृतिक रूप से गाय के मुख जैसी दिखाई देती है।
पारिस्थितिकी संतुलन को देखते हुए प्रशासन ने यहां इंसानी दखल कम करने के लिए सख्त नियम बनाए हैं, जिसके तहत गंगोत्री से आगे प्रतिदिन केवल 150 यात्रियों को ही जाने का परमिट जारी किया जाता है।
परंतु, ग्लेशियोलॉजिस्ट और जल वैज्ञानिक यहीं पर एक चौंकाने वाला तथ्य सामने रखते हैं। गोमुख कुंड में जो पानी गिर रहा है, वह असल में इस हिमखंड के और भी ऊंचे और आंतरिक हिस्सों से रिसकर आता है। यानी गोमुख सिर्फ एक निकास मार्ग है।
मैदानी इलाकों पर संकट
इससे भी बड़ी चिंता विज्ञान ने इसके अस्तित्व को लेकर जताई है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण गंगोत्री ग्लेशियर हर वर्ष औसतन 22 मीटर की तेज दर से पीछे खिसक रहा है और पिछले 70 वर्षों में यह लगभग 3 किलोमीटर तक सिकुड़ चुका है।
हाल ही में वैज्ञानिकों ने पिछले 40 वर्षों के आंकड़ों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद चेतावनी दी है कि ग्लेशियर के पिघलने और इसके बहाव में आ रहे इस बड़े बदलाव का सीधा और गंभीर असर मैदानी इलाकों में बिजली उत्पादन से लेकर कृषि और सिंचाई व्यवस्था पर पड़ने वाला है।
ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि जो वैज्ञानिक उद्गम खुद समय के साथ पीछे खिसक रहा हो, उसे पूर्ण रूप से ‘मूल’ कैसे माना जाए?
राजा सगर के 60 हजार पुत्र और ‘बिंदुसर’ का रहस्य
पुराणों के पन्नों को पलटें तो यहां इतिहास और अध्यात्म की एक बेहद भव्य कथा मिलती है। इक्ष्वाकु वंश के चक्रवर्ती राजा सगर के 60,000 पुत्रों को कपिल मुनि के श्राप ने भस्म कर दिया था।
उन्हीं अतृप्त आत्माओं के उद्धार और मोक्ष के लिए सूर्यवंश में भगीरथ का जन्म हुआ, जिन्होंने सदियों तक चलने वाली असाधारण साधना की। भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर देवी गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर आने के लिए तैयार तो हुईं, लेकिन उनका वेग इतना प्रचंड था कि पृथ्वी उसे सहन नहीं कर पाती।
इस संकट के समाधान के लिए राजा भागीरथ ने भगवान शिव की कठोर आराधना की। आशुतोष भगवान शिव जब प्रसन्न हुए, तब ब्रह्माजी ने अपने कमंडल से गंगा की दिव्य धारा को मुक्त किया और शिव ने अपनी विशाल जटाओं में उसे पूरी तरह समेट लिया।
अहंकार में डूबी गंगा भगवान शिव की जटाओं के जाल में ऐसी उलझीं कि उन्हें वर्षों तक बाहर निकलने का मार्ग ही नहीं मिला। भागीरथ की दोबारा करुण प्रार्थना पर भोलेनाथ ने अंततः गंगा को ‘बिंदुसर’ की ओर से धरती पर छोड़ा।
पौराणिक ग्रंथों में वर्णित यह ‘बिंदुसर’ वास्तव में वह रहस्यमयी स्थान या झील है, जहां से गंगा पहली बार जटाओं से मुक्त होकर पृथ्वी पर दृश्यमान हुईं। यह स्थान आज के गोमुख और गंगोत्री से भी कहीं ऊपर, दुर्गम हिमालय की गोद में आज भी इंसानी पहुंच से दूर छुपा हुआ है।
बिंदुसर से निकलने के बाद गंगा सात धाराओं में बंट गईं, जिनमें से सातवीं दिव्य धारा राजा भागीरथ के रथ के पीछे-पीछे चली, जिसे आज हम ‘भगीरथी’ के नाम से पूजते हैं।
त्रिपथगा और पाताल गंगा की गुप्त गुफा
गंगोत्री से गोमुख और उससे भी ऊपर तपोवन के दुर्गम, शून्य से नीचे के तापमान वाले पर्वतीय मार्गों पर आज भी ऐसे तपस्वी और नागा साधु मिलते हैं जो दशकों से इन बर्फीले शिखरों पर एकांत साधना में लीन हैं।
जब इन संतों से गंगा के उद्गम पर बात होती है, तो उनके अनुभव का उत्तर विज्ञान और लिखित इतिहास से बिल्कुल अलग होता है। इन संतों की मान्यता है कि गंगा का वास्तविक और शाश्वत स्रोत एक गुप्त दिव्य गुफा के भीतर स्थित है, जो सामान्य मानवीय दृष्टि या आधुनिक कैमरों की पकड़ में नहीं आती।
यह गुफा केवल उन्हीं योगियों को गोचर होती है जिनकी दिव्य चक्षु जाग्रत हो चुके हैं। तपोवन के उस पार एक ऐसा स्थान है जहां सीधे पर्वत के भीतर से प्रचंड जलराशि स्वतः स्फूर्त फूटती है, और वह पानी किसी ग्लेशियर की पिघली हुई सामान्य बर्फ का नहीं है, बल्कि वह किसी अत्यंत गहरे, अज्ञात भूमिगत अजस्र स्रोत से आता है।
वेदों में गंगा को ‘त्रिपथगा’ (आकाश, धरती और पाताल तीनों लोकों में बहने वाली) कहा गया है। संतों का तर्क है कि यदि गंगा पाताल या भूमि के भीतर भी गतिशील है, तो उसका एक अत्यंत गूढ़ भूमिगत स्रोत होना पूरी तरह स्वाभाविक है।
नक्शे की लकीरों से परे है मोक्षदायिनी का सत्य
अतः, यदि हम नक्शे और आधुनिक भूगोल को देखें तो गंगा का उद्गम केवल ‘गोमुख’ के एक निश्चित अक्षांश और देशांतर पर अंकित नजर आता है।
लेकिन यदि इतिहास, अध्यात्म और कुदरत के रहस्यों को मिलाकर देखें, तो गोमुख से परे बिंदुसर की अलौकिक सत्ता है, बिंदुसर से गहरे संतों की गुप्त गुफा की मान्यता है, और उस गुफा के भी पार ‘त्रिपथगा’ की वह विराट अवधारणा है जिसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता।
महाभारत के वन पर्व में महर्षि वेदव्यास ने बहुत स्पष्ट लिखा है- कलियुग के अंधकार में गंगा ही संसार की सर्वाधिक पवित्र ऊर्जा है। केवल मन से नाम लेने मात्र से यह पापी को निष्पाप कर देती है, इसके दर्शन मात्र से सौभाग्य जागृत होता है, और जब कोई इसमें पूरी श्रद्धा से स्नान या इसके जल का आचमन करता है, तो उसकी सात पीढ़ियों तक का कुल पवित्र हो जाता है।
” शायद गंगा का सबसे बड़ा रहस्य उसकी इसी अक्षय शक्ति और प्रवाह में छुपा है। जो नदी साठ हजार पूर्वजों को एक पल में तार दे, जो शिव की जटाओं की विशालता को अपने भीतर समेट सके, उसका उद्गम हिमालय की किसी एक लकीर या बर्फ के किसी एक टुकड़े से नहीं हो सकता।
वह सर्वत्र से प्रकट होती है और सर्वत्र को तृप्त करती जाती है। शायद यही इस सनातन नदी का सबसे दिव्य और अनसुलझा सत्य है।
भगीरथ शिला और पांडवों की रुद्र गुफा
गंगोत्री मुख्य मंदिर के समीप ही वह ऐतिहासिक और पवित्र विशाल शिलाखंड आज भी सुरक्षित स्थिति में मौजूद है, जिसे ‘भगीरथ शिला’ कहा जाता है। यह कोई आम पत्थर नहीं है, बल्कि यह उस मानवीय संकल्प और अटूट इच्छाशक्ति का साक्षात गवाह है जिसने स्वर्ग की नदी को धरती के धरातल पर उतरने के लिए विवश कर दिया था।
इसके साथ ही, गंगोत्री धाम में वह विशेष स्थान भी है जहां महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने गोहत्या (अपने ही बंधु-बांधवों के वध) के महापाप और आत्मग्लानि से मुक्ति पाने के लिए देवर्षियों के कहने पर भव्य यज्ञ और तपस्या की थी।
यहां स्थित विशाल ‘रुद्र गुफा’ आज भी सनातन धर्मावलंबियों के लिए अपने पितरों के तर्पण, श्राद्ध और आत्मिक शांति के लिए सबसे पवित्र और जाग्रत वेदियों में से एक मानी जाती है।
जब आमने-सामने आए विज्ञान और आस्था के तर्क
यहां आधुनिक जल विज्ञान और सनातन आस्था के बीच एक बेहद दिलचस्प विरोधाभास देखने को मिलती है। यदि शुद्ध विज्ञान और जल की मात्रा के पैमाने पर देखें, तो वैज्ञानिक दृष्टि से गंगा की मुख्य स्रोत नदी भगीरथी नहीं, बल्कि ‘अलकनंदा’ है।
अलकनंदा नदी नंदा देवी, त्रिशूल और कामेट जैसी विशाल पर्वत चोटियों से पिघलने वाली बर्फ से आकार लेती है और यह भागीरथी की तुलना में अधिक लंबी और भारी जल-समृद्ध है।
दोनों नदियां आगे चलकर देवप्रयाग के प्रसिद्ध पावन संगम पर मिलती हैं, जहां से इसका नाम आधिकारिक रूप से ‘गंगा’ पड़ता है।
इसके बावजूद, हजारों सालों की धार्मिक और आध्यात्मिक परंपरा में केवल गंगोत्री-गोमुख से आने वाली भगीरथी को ही ‘मूल गंगा’ का दर्जा और सर्वोच्च पवित्रता प्राप्त है।
इससे साफ है कि विज्ञान भी आज तक गंगा के किसी एक निश्चित और अंतिम उद्गम बिंदु पर अपनी अंतिम मुहर नहीं लगा पाया है।
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