मोहन बजा रहे चैन की बांसुरी: कांग्रेस-भाजपा के राजनीतिक त्रिकोण में फंसा चौथा कोण
KHULASA FIRST
संवाददाता

मुख्यमंत्री के साथ दिग्विजय सिंह और अरुण यादव के खेल में उलझे जीतू पटवारी
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
राजनीति के खेल बड़े न्यारे हैं। इसमें चतुर खिलाड़ी अक्सर अपने ही बनाए जाल में फंस जाते हैं। जैसे उलटे बांस बरेली के। इस समय मध्य प्रदेश की राजनीति में विपक्ष ताकत के साथ सत्तापक्ष पर टूट पड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा था, लेकिन अब खुद ही अपने बचाव में नजर आ रहा है। धारदार हथियारों से लैस होकर मुख्यमंत्री पर हमला करने के लिए कांग्रेस द्वारा बिछाई गई चौसर पर अब उसके ही मोहरे या प्यादे अपने सेनापति को पीटते नजर आ रहे हैं।
उज्जैन के भूमि कांड में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को घेरने के लिए पूरी ताकत से राजनीति के कुरुक्षेत्र में उतरी कांग्रेस अपनी ही सेना के पलटवार से घायल नजर आ रही है। मुख्यमंत्री को कटघरे में खड़ा कर सत्तापक्ष के लिए बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा करने की कोशिश की थी, लेकिन खुद संकट में घिर गई और मुख्यमंत्री मजे से चैन की बांसुरी बजा रहे हैं।
यह पूरा घटनाक्रम सत्तापक्ष और विपक्ष के त्रिकोण जैसा है, जिसमें एक छिपा हुआ चौथा कोण भी है, जिसके किए-धरे पर पानी फिर गया। त्रिकोण में आया चौथा कोण- क्या मुख्यमंत्री पर हमले के बीच कांग्रेस खुद ही उलझ गई?
विपक्ष के मतभेद आ गए सामने
मध्य प्रदेश की राजनीति में पिछले कुछ दिनों के घटनाक्रम ने एक दिलचस्प और रोमांचभरी तस्वीर पेश की है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को भूमि खरीद से जुड़े मुद्दे पर विपक्ष घेरने की कोशिश करता दिखाई दिया, लेकिन घटनाक्रम आगे बढ़ते-बढ़ते विपक्ष के भीतर ही मतभेद खुलकर सामने आ गए।
ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि इस पूरे घटनाक्रम के बीच ‘त्रिकोण में चौथा कोण’ भी आ गया है! पहला कोण मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव हैं, जिनके खिलाफ प्रकाशित रिपोर्ट को आधार बनाकर राजनीतिक हमले किए गए। इस पूरे मामले को कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने पूरे दमखम और ताकत से उठाया।
मुख्यमंत्री पर राजनीतिक हमले करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कांग्रेस को लगा कि उसके हमले से मुख्यमंत्री विचलित और असहाय हो गए हैं, लेकिन वह मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पूरी तरह समझ नहीं पाई और इसी खेल में एक दूसरा कोण राजनीति के धुरंधर खिलाड़ी कांग्रेस के कद्दावर नेता दिग्विजय सिंह ने बना दिया।
उन्होंने एक तरह से पटवारी के आरोप को महत्व नहीं दिया। इसी बीच पटवारी को आईना दिखाते हुए उन्हीं की पार्टी के वरिष्ठ नेता अरुण यादव ने प्रदेश संगठन पर सवाल खड़े कर दिए। इस खेल का यह तीसरा कोण इस तरह से बन गया कि कांग्रेस जितनी आक्रामक और मजबूत बनने गई, उतनी ही पीछे चली गई।
नतीजा- मुख्यमंत्री को कमजोर करने की उसकी चालाकी और रणनीति के चक्रव्यूह में वह खुद उलझ गई। कांग्रेस से पूरी तरह निश्चिंत होकर अब मुख्यमंत्री और सत्तापक्ष खेल का आनंद ले रहे हैं। समझने वाले समझ रहे हैं कि मुख्यमंत्री और सत्तापक्ष संगठन ने बहुत धैर्यपूर्वक धोबी पछाड़ दांव इस तरह से खेला कि कांग्रेस खुद अपने ही जाल में फंस गई।
प्रदेश कांग्रेस में आ गया भूचाल
पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव ने सार्वजनिक रूप से प्रदेश कांग्रेस की रणनीति और नेतृत्व पर सवाल उठाए। इससे प्रदेश कांग्रेस में भूचाल आ गया। इसके बाद कांग्रेस नेता राकेशसिंह यादव के बयान भी सामने आए, जिनसे यह संदेश गया कि पार्टी के भीतर इस मुद्दे को लेकर एकमत नहीं है।
इसी दौरान मुख्यमंत्री को लेकर एक पुराना पत्र सार्वजनिक चर्चा में आ गया। इसे लेकर कांग्रेस और ज्यादा खुश हो गई। इसकी अलग-अलग राजनीतिक व्याख्याएं सामने आईं। कुछ विश्लेषकों ने इसे भाजपा की आंतरिक राजनीति से जोड़कर देखा, जबकि अन्य ने इसे संयोग माना। इस पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई कि पत्र के सार्वजनिक होने के पीछे कोई सुनियोजित राजनीतिक रणनीति थी।
ऐसे बदल गया बहस का फोकस
पूरे घटनाक्रम का सबसे उल्लेखनीय पक्ष यह रहा कि जिस मुद्दे पर कांग्रेस सरकार को घेरना चाहती थी, कुछ ही दिनों में चर्चा का केंद्र कांग्रेस के भीतर की अपनी परंपरागत सिर फुटौव्वल बन गई। इससे विपक्ष का हमला अपेक्षित राजनीतिक प्रभाव नहीं छोड़ पाया और बहस का फोकस बदल गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी विपक्षी दल के लिए सरकार को प्रभावी ढंग से घेरने की पहली शर्त संगठनात्मक एकजुटता होती है। यदि बड़े मुद्दे के बीच पार्टी के वरिष्ठ नेता सार्वजनिक रूप से अलग-अलग राय व्यक्त करने लगें, तो राजनीतिक संदेश कमजोर पड़ जाता है।
अब जरूरत है एकजुट होने की
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर त्रिकोण में चौथा कोण स्वयं कांग्रेस की आंतरिक खींचतान बन गई, जिसने मुख्यमंत्री को घेरने की रणनीति की धार को काफी हद तक कुंद कर दिया। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इस आंतरिक असहमति को किस तरह संभालती है और क्या वह सरकार के खिलाफ अपने राजनीतिक अभियान को फिर से एकजुट होकर आगे बढ़ा पाती है।
उलटा पड़ गया पटवारी का दांव
इस त्रिकोण के खेल में चौथा कोण प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी बने, जिन्होंने इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से उठाया और सरकार से जवाब मांगा। हालांकि उनके बयानों में मुख्यमंत्री पर आरोप का प्रत्यक्ष दावा नहीं किया गया। कांग्रेस ने अपने हमलों को तेज करने के लिए मुख्यमंत्री को भाजपा के अंदरूनी संघर्ष का शिकार बताया और इसी के साथ इंदौर की उपेक्षा को लेकर आई कथित तौर से भाजपा नेता के नाम की चिट्ठी को भी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। कांग्रेस खुश थी कि उसका दांव चल गया, लेकिन यह उसकी भूल थी। दांव उलटा पड़ चुका था। इसका कारण कांग्रेस के भीतर उभरती असहमति रही।
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