मोदी नहीं जाएंगे वानप्रस्थ की राह पर: ब्रिक्स, मोदी और भागवत का रिटायर्ड महात्म्य
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के ठीक पहले ब्रिक्स समिट में प्रमुख राष्ट्र चीन और रूस के उम्रदराज राष्ट्रपति के साथ भारत के बुजुर्ग ‘युवा’ प्रधानमंत्री का एक साथ आना फिर बीजेपी का दीप जलाना और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बीच एक साम्य है।
मोदी 76 जबकि जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति ब्लडी अमीर पुतिन 73 वर्ष की उम्र पार कर चुके हैं। पुतिन और जिनपिंग के उम्रदराज होने के बाद भी उनके देश में उनके रिटायरमेंट की बात कोई नहीं करता।
बुजुर्ग होते हुए भी दोनों राष्ट्राध्यक्ष दुनिया के शक्तिशाली नेताओं में शामिल है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके साथ देश को विश्व गुरु बनाने की राह पर हैं इसलिए उनके रिटायरमेंट की बात भी देश के मन में नहीं आनी चाहिए।
ऐसा कुछ संदेश ब्रिक्स सम्मेलन से निकलता नजर आया। इससे एक और संदेश बिटवीन द लाइंस निकला फिर चाहे मोदी के हमउम्र संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत किसी भी तरह का संदेश दें, उसे देश को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए।
संदेश साफ है मोदी अभी रिटायर नहीं होंगे क्योंकि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 80, नरेंद्र मोदी (प्रधानमंत्री, भारत) 76 (जन्म: 17 सितंबर 1950), शी जिनपिंग (राष्ट्रपति, चीन) 73 (जन्म: 15 जून 1953) व्लादिमीर पुतिन (राष्ट्रपति, रूस) 73 (जन्म: 7 अक्टूबर 1952) में नरेंद्र मोदी सबसे ऊर्जावान हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आएसएस) प्रमुख मोहन भागवत की उम्र 76 वर्ष है। संघ से भागवत भी रिटायर नहीं हो रहे हैं तो फिर भला मोदी से अपेक्षा क्यों की जाए? रिटायर चीन अमेरिका और रूस के राष्ट्रपति भी नहीं हो रहे हैं इसलिए मोदी के रिटायरमेंट के बारे में भाजपा और संघ के एक बड़े वर्ग को सोचना ही नहीं चाहिए।
प्रतीत होता है इसी संदेश के साथ देश में आज 17 सितंबर को मोदी का जन्मदिन भाजपा राजनीतिक उत्सव के रूप में मना रही है। साथ ही डॉ. भागवत ताजा मालवा प्रवास पर हैं। युवाओं के साथ संवाद करते हुए मोदी को जन्मदिन की मंगल कामना प्रेषित करेंगे। ऐसे में सवाल स्वाभाविक है क्या युवाओं के साथ क्या वही संदेश दोहराएंगे, जिसका आशय था पुराने लोगों को युवाओं और नए लोगों को अवसर देना चाहिए।
चौंकाने वाला संदेश नहीं आया... इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर किसी चौंकाने वाले संदेश का इंतजार सघ भाजपा और विपक्ष के राजनीतिक जानकारों को उसी तरह से रहा जैसे देश को 15 अगस्त के दिन लाल किले के संदेश का इंतजार रह्ता है।
नए साल 2026 की शुरुआत से ही अनुमान लगाए जाते रहे हैं मोदी प्रधानमंत्री पद से मुक्ति जैसा कोई दार्शनिक विचार व्यक्त करेंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ और भाजपा मोदी के जन्मदिन पर दीए जलाकर स्पष्ट करेगी मोदी नहीं जाएंगे… बने रहेंगे। यह संदेश एक तरह से संघ के लिए ज्यादा मायने रखता है।
हालांकि, दीए जलाने के इस कार्यक्रम पर आम लोगों की कोई विशेष दिलचस्पी नजर नहीं आई। होना यह चाहिए था देश खुद अपने यशस्वी प्रधानमंत्री के लिए दीपक प्रज्ज्वलित करता लेकिन ऐसा नहीं होकर संगठन के दबाव प्रभाव में संगठन से ही दीए जलवाए जा रहे हैं।
पहले ताली-थाली, अब ‘आशीर्वाद का दीया': भव्य शक्ति प्रदर्शन का राजनीतिक संदेश है... भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन और उनके सत्ता में 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर देशभर में ‘आशीर्वाद का दीया' जलाकर शुभकामना देने का जो आह्वान किया गया है, उसने फिर देश की सियासत को गरमा दिया है।
बीते 12 वर्षों के कार्यकाल में मोदी के जन्मदिन पर इस प्रकार के व्यापक जन-अनुष्ठान और शक्ति प्रदर्शन का आयोजन पार्टी द्वारा पहली बार किया जा रहा है। इसके टाइमिंग और प्रतीकात्मक स्वरूप को लेकर राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह के कयास और ‘बिटवीन द लाइंस' (पंक्तियों के बीच छिपे अर्थ) समीकरणों पर चर्चा तेज हो गई हैं।
क्या यह आरएसएस और राजनीतिक विरोधियों को कड़ा संदेश... राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग इसे संघ परिवार (आरएसएस) के भीतर चल रहे कथित अंतर्विरोधों और भविष्य के नेतृत्व के समीकरणों से जोड़कर देख रहा है। पिछले कुछ समय से संघ और राजनीतिक नेतृत्व के बीच तालमेल को लेकर कयास का बाजार गर्म रहता है।
ऐसे में, इस भव्य आयोजन के जरिए पार्टी हाईकमान और मोदी समर्थक खेमा यह स्पष्ट संदेश देने की कोशिश में है प्रधानमंत्री का राजनीतिक वजूद और उनकी लोकप्रियतास पर कोई विराम नहीं लगने वाला है।
विश्लेषकों का मानना है इसके राजनीतिक निहितार्थ यह जताना है- मोदी कभी रिटायर नहीं होंगे- यानी वे जब चाहेंगे, तभी पद छोड़ेंगे, किसी अन्य के तय करने या संघ के संकेतों से नहीं। यह आयोजन पार्टी और जनता के बीच सीधे संवाद स्थापित कर यह स्थापित करने की कोशिश है कि कैडर और जनमानस में मोदी का विकल्प फिलहाल केवल मोदी ही हैं।
छवि की चुनौतियों और जनाक्रोश के बीच दांव... इस आयोजन का दूसरा और सबसे व्यावहारिक पहलू यह माना जा रहा है देश की आर्थिक नीतियों की सुस्ती, बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और जनता से जुड़े तमाम मोर्चों पर विपक्षी दलों द्वारा खड़े किए जा रहे सवालों के बीच यह सरकार की घेराबंदी को तोड़ने की एक राजनीतिक काट है।
बहरहाल, सियासत में हर प्रतीक का निहितार्थ होता है। जन्मदिन के बहाने शक्ति प्रदर्शन का यह नया अध्याय आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति की दिशा और दशा तय करने में कितना असरदार साबित होगा, यह तो वक्त बताएगा फिलहाल इस अनूठे आयोजन ने राजनीतिक तापमान को बढ़ा जरूर दिया है।
भाजपा का अघोषित नियम
भाजपा के भीतर लंबे समय से अघोषित नियम माना जाता रहा है 75 वर्ष आयु पूरी होने के बाद नेताओं को सक्रिय चुनावी राजनीति या पदों से हटकर मार्गदर्शक की भूमिका में आ जाना चाहिए (जैसा लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के मामले में देखा गया था)।
इस दर्शन शास्त्र पर मोहन भागवत के गूढ बयान और संकेत सामने आते रहे हैं, जिन्हें लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा गर्म रही उन्होंने इशारों-इशारों में उम्रदराज नेताओं को पद छोड़ने का संदेश दिया है लेकिन यह अलग बात है कि भाजपा के पर्याय शीर्ष नेताओं इसे नहीं मानते।
जुलाई 2025 में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में आरएसएस प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने आयु और पद की सीमा को लेकर टिप्पणी की थी। उनके इस बयान को राजनीतिक विश्लेषकों ने बहुत गहराई से डिकोड किया था।
राजनीतिक चर्चा के मुताबिक, भागवत ने कहा था ‘जब आपको 75 साल पूरे होने पर शॉल ओढ़ाई जाती है, तो समझिए कि... उनके इस अधूरे या रूपकात्मक वाक्य को सीधे तौर पर राजनीति में 75 वर्ष की आयु पूरी कर चुके या इस दहलीज पर खड़े शीर्ष नेताओं के रिटायरमेंट से जोड़कर देखा गया।
इस बयान के तुरंत बाद विपक्षी दलों (विशेषकर कांग्रेस) ने भी इसे लपक लिया था( आरएसएस प्रमुख समय-समय पर अपने संबोधनों में दोहराते रहे हैं कि समाज और संगठन में ठहराव नहीं आना चाहिए।
डॉ. भागवत ने विभिन्न मंचों से रेखांकित किया है देश की बदलती जनसांख्यिकी (डेमोग्राफी) और युवाओं की बड़ी आबादी को देखते हुए व्यवस्थाओं में नए और ऊर्जावान लोगों को आगे आने का अवसर मिलना चाहिए।
संघ की वैचारिक पृष्ठभूमि हमेशा पीढ़ीगत बदलाव (जनरेशनल शिफ्ट) की समर्थक रही है ताकि अगली कतार के नेतृत्व को तैयार किया जा सके। इसी वैचारिक लाइन को राजनीतिक पंडितों ने हमेशा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य वरिष्ठ नेताओं के संदर्भ में 'इशारे' के रूप में देखा। उनके इस दार्शनिक संदेश के बाद बाद पार्टी का दबाव आया होगा हो सकता है इस कारण डॉ भागवत को अपने मन की बात कोई स्पष्ट करना पड़ा।
उन्होंने स्पष्टीकरण में कहा था मैंने कभी यह नहीं कहा है- मैं रिटायर होऊंगा या किसी को (75 की उम्र में) रिटायर हो जाना चाहिए। हम स्वयंसेवक हैं, संघ जो तय करेगा, वह करेंगे। राजनीति में 75 साल की उम्र की कोई सार्वभौमिक सीमा नहीं है।
भले ही संघ प्रमुख ने बाद में स्पष्टीकरण दे दिया दिलवाया गया हो, लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है संघ के भीतर परंपराओं और अनुशासन का जो ढांचा है, वह स्वतः ही अनकहा दबाव या संदेश पैदा करता है।
यही वजह है जब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन या उनके कार्यकाल के बड़े पड़ावों पर शक्ति प्रदर्शन या राजनीतिक संदेश की बात आती है, तो संघ और भाजपा के बीच '75 साल के फॉर्मूले' की चर्चा केंद्र में आ जाती है।
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