वीडियो देखिये, नामांकन खारिज होने के बाद मीनाक्षी ने तोड़ी चुप्पी: भारतीय जनता पार्टी, चुनाव आयोग और रिटर्निंग ऑफिसर की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए
KHULASA FIRST
संवाददाता
खुलासा फर्स्ट, हैदराबाद।
मध्यप्रदेश राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल करने वाली वरिष्ठ कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन ने अपना नामांकन खारिज होने के बाद पहली बार सार्वजनिक रूप से चुप्पी तोड़ी है। हैदराबाद के गांधी भवन में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी, चुनाव आयोग और रिटर्निंग ऑफिसर की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने भाजपा द्वारा लगाए जा रहे उन आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिनमें दावा किया जा रहा था कि कांग्रेस के ही कुछ नेताओं ने उनके खिलाफ दस्तावेज भाजपा को उपलब्ध कराए थे।
मीनाक्षी नटराजन ने भाजपा के आरोपों को ‘फेक कॉन्स्पिरेसी थ्योरी’ बताते हुए कहा कि यह पूरी तरह मनगढ़ंत कहानी है, जिसका उद्देश्य जनता का ध्यान असली मुद्दों से भटकाना है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पूरी तरह एकजुट है और पार्टी के भीतर किसी तरह के भितरघात की बात केवल राजनीतिक अफवाह है।
‘कांग्रेस ने कागज दिए, यह कहानी सिर्फ ध्यान भटकाने के लिए’
प्रेस कॉन्फ्रेंस में नटराजन ने कहा कि भाजपा लगातार यह नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रही है कि उनके खिलाफ इस्तेमाल किए गए दस्तावेज कांग्रेस के नेताओं ने ही उपलब्ध कराए। उन्होंने कहा कि यदि एक पल के लिए इस दावे को सच भी मान लिया जाए, तब भी यह सवाल बना रहता है कि नामांकन रद्द किसने किया।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस का कोई नेता जाकर नामांकन निरस्त नहीं कर सकता था। नामांकन खारिज करने का अधिकार केवल रिटर्निंग ऑफिसर के पास था और उन्हें पूरी जानकारी थी कि मामला किसी आपराधिक प्रकरण का नहीं बल्कि केवल एक सामान्य कानूनी नोटिस का था। इसके बावजूद नामांकन खारिज कर दिया गया।
नटराजन ने कहा कि भाजपा की साजिश वाली कहानी चुनाव आयोग और रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले का बचाव नहीं कर सकती। उन्होंने आरोप लगाया कि या तो अधिकारियों को चुनावी नियमों की समझ नहीं थी या फिर वे किसी दबाव में काम कर रहे थे।
‘आरओ के कमरे में कलेक्टर और कमिश्नर क्यों मौजूद थे?’
मीनाक्षी नटराजन ने स्क्रूटनी प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने दावा किया कि नामांकन की जांच के दौरान रिटर्निंग ऑफिसर के कमरे में भाजपा के कई नेता मौजूद थे, जबकि कांग्रेस नेताओं को अंदर आने से रोका जा रहा था।
उनका कहना था कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के विरोध के बाद जैसे ही उन्हें अंदर आने की अनुमति मिली, उसी समय वहां कलेक्टर और कमिश्नर भी पहुंच गए। उन्होंने पूछा कि राज्यसभा चुनाव की नामांकन प्रक्रिया में कलेक्टर और कमिश्नर की कोई वैधानिक भूमिका नहीं होती, फिर वे वहां किस अधिकार से मौजूद थे।
नटराजन ने आरोप लगाया कि यह पूरा घटनाक्रम दर्शाता है कि प्रशासनिक मशीनरी और राजनीतिक सत्ता के बीच असामान्य तालमेल था। उन्होंने कहा कि इससे निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
‘58 वोट चाहिए थे, भाजपा के पास 48 थे, फिर भी तीसरा उम्मीदवार उतारा’
राज्यसभा चुनाव के गणित को समझाते हुए मीनाक्षी नटराजन ने कहा कि मध्यप्रदेश में तीन सीटों के लिए चुनाव होना था। इनमें से दो सीटें भाजपा के खाते में जाना लगभग तय था, जबकि तीसरी सीट के लिए 58 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता थी।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस के पास 62 विधायक थे, इसलिए तीसरी सीट जीतने के लिए उसके पास पर्याप्त संख्या बल मौजूद था। इसी आधार पर पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार बनाया और नामांकन के दौरान सभी विधायक एकजुट होकर उनके साथ पहुंचे थे।
नटराजन ने आरोप लगाया कि भाजपा के पास तीसरी सीट जीतने के लिए आवश्यक संख्या नहीं थी। उनके अनुसार भाजपा के पास जरूरी आंकड़े से करीब 10 विधायक कम थे, इसके बावजूद तीसरा उम्मीदवार उतारना इस बात का संकेत था कि पार्टी शुरुआत से ही क्रॉस वोटिंग, दबाव की राजनीति और जोड़-तोड़ की रणनीति पर काम कर रही थी। उन्होंने कहा कि जब भाजपा को लगा कि विधायकों की खरीद-फरोख्त या दबाव की रणनीति सफल नहीं होगी, तब नामांकन प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की गई।
‘फॉर्म 26 में लीगल नोटिस बताने का कॉलम ही नहीं’
नामांकन खारिज किए जाने के तकनीकी आधार पर मीनाक्षी नटराजन ने कहा कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं था। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल एक लीगल नोटिस जारी हुआ था, जो न्यायिक प्रक्रिया के प्रारंभिक चरण में था।
उनका कहना था कि चुनावी हलफनामे के फॉर्म 26 में कहीं भी लंबित लीगल नोटिस की जानकारी देने का प्रावधान नहीं है। जब जांच के दौरान रिटर्निंग ऑफिसर ने उनसे पूछा, तब उन्होंने स्वयं इसकी जानकारी दी थी।
नटराजन ने कहा कि उनके पूरे दस्तावेजों की जांच वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तंखा और डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी जैसे अनुभवी विधि विशेषज्ञों ने की थी। चुनाव आयोग की 2023 की हैंडबुक के अनुसार ऐसे मामलों में नामांकन निरस्त करना अंतिम विकल्प नहीं होता। उन्होंने झारखंड के एक अन्य मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां उम्मीदवार को अतिरिक्त समय दिया गया, जबकि उनके मामले में जल्दबाजी दिखाकर नामांकन खारिज कर दिया गया।
‘चुनाव आयोग ने जानबूझकर देरी की’
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि नामांकन खारिज होने के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने तत्काल चुनाव आयोग से संपर्क किया था। उन्होंने बताया कि रणदीप सिंह सुरजेवाला, विवेक तंखा और अभिषेक मनु सिंघवी सहित कई वरिष्ठ नेता आयोग के समक्ष पहुंचे थे।
नटराजन का दावा है कि आयोग के पास फैसले पर पुनर्विचार करने का पर्याप्त समय था, लेकिन जानबूझकर देर की गई। उनका कहना है कि रात तक कोई निर्णय नहीं लिया गया, जिसके कारण कांग्रेस को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
उन्होंने आरोप लगाया कि अदालत में भी चुनाव आयोग, भाजपा और मध्यप्रदेश सरकार के पक्ष में एक असामान्य कानूनी गठजोड़ देखने को मिला। उनके अनुसार इससे पूरे मामले में निष्पक्षता को लेकर सवाल और गहरे हो जाते हैं।
चरित्र हनन और परिवार को घसीटने पर भी बोलीं
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मीनाक्षी नटराजन ने अपने खिलाफ लगाए जा रहे व्यक्तिगत आरोपों और परिवार को विवाद में घसीटे जाने पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप होने का मतलब यह नहीं है कि उसके पूरे परिवार को निशाना बनाया जाए।
उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने गंभीर आरोपों वाले नेताओं के खिलाफ पहले भी कार्रवाई की है और भविष्य में भी करेगी। लेकिन बिना किसी तथ्य के परिवार के अन्य सदस्यों को विवाद में घसीटना राजनीतिक मर्यादा के खिलाफ है।
हाईकोर्ट में दायर करेंगी चुनाव याचिका
मीनाक्षी नटराजन ने स्पष्ट किया कि वह इस मामले को यहीं समाप्त नहीं मानतीं। उन्होंने कहा कि वह कानूनी लड़ाई जारी रखेंगी और निर्धारित समयसीमा के भीतर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दायर करेंगी।
उन्होंने कहा कि यह लड़ाई केवल उनके नामांकन की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ा मुद्दा है। उनका दावा है कि इस पूरे घटनाक्रम ने चुनाव आयोग, प्रशासन और राजनीतिक सत्ता के बीच कथित साठगांठ को उजागर कर दिया है।
कांग्रेस नेता ने कहा कि वह मध्यप्रदेश की राजनीति से जुड़ी हैं और प्रदेश का प्रतिनिधित्व करना उनका अधिकार है। इसलिए न्याय मिलने तक वह इस मामले को कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर उठाती रहेंगी।
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