टोल कंपनी को हाईकोर्ट का बड़ा झटका: इतने करोड़ रुपए लौटाने के आदेश; इसके नाम पर ज्यादा वसूली गलत
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, जबलपुर।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भोपाल-देवास फोरलेन पर फास्टैग के जरिए अतिरिक्त टोल वसूली को अवैध करार देते हुए टोल कंपनी को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने आदेश दिया है कि वर्ष 2022 से अधिक वसूले गए करीब 11 करोड़ रुपए सभी प्रभावित वाहन मालिकों और ट्रांसपोर्टरों को लौटाए जाएं। साथ ही टोल कंपनी पर 25 हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है, जिसे मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करना होगा।
यह फैसला एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने मेसर्स देवास-भोपाल कॉरिडोर प्राइवेट लिमिटेड की याचिका खारिज करते हुए सुनाया।
फास्टैग भुगतान का माध्यम, टोल तय करने का नहीं
सुनवाई के दौरान टोल कंपनी ने दलील दी कि फास्टैग सिस्टम में तीन एक्सल बसों को मल्टी एक्सल वाहन की श्रेणी में मैप कर दिया गया था, जिससे अतिरिक्त टोल अपने आप कटता रहा और इसमें कंपनी की कोई गलती नहीं थी।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि फास्टैग केवल भुगतान का माध्यम है, टोल की दर तय करने का आधार नहीं। टोल की दरें केवल रियायत (कंसेशन) समझौते और सरकारी अधिसूचना के अनुसार ही लागू होंगी। यदि सॉफ्टवेयर में गलत मैपिंग हुई है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी टोल संचालक की होगी।
2007 के समझौते का उल्लंघन
अदालत ने 30 जून 2007 के रियायत समझौते का हवाला देते हुए कहा कि इसमें बसों और मल्टी एक्सल ट्रकों की अलग-अलग श्रेणियां निर्धारित की गई थीं। कहीं भी तीन एक्सल बसों को मल्टी एक्सल ट्रक मानने का प्रावधान नहीं है।
इसके बावजूद टोल कंपनी ने फास्टैग सिस्टम में तीन एक्सल बसों को गलत श्रेणी में डालकर अधिक टोल वसूला, जो अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन है।
अप्रैल 2022 से हुई अतिरिक्त वसूली
रिकॉर्ड के अनुसार, अप्रैल 2022 से तीन एक्सल बसों को मल्टी एक्सल वाहन मानकर अधिक टोल वसूला जा रहा था। अदालत ने माना कि इसी तकनीकी त्रुटि के कारण करीब 11 करोड़ रुपये अतिरिक्त वसूले गए। यह राशि केवल एक परिवहन कंपनी से नहीं, बल्कि कई वाहन मालिकों और ट्रांसपोर्टरों से ली गई।
सभी प्रभावित वाहन मालिकों को मिलेगा रिफंड
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अतिरिक्त वसूली गई राशि केवल याचिकाकर्ता तक सीमित नहीं रहेगी। जिन-जिन वाहन मालिकों और ट्रांसपोर्टरों से अधिक टोल वसूला गया है, सभी को उनका पैसा वापस किया जाएगा।
यदि इस राशि का कोई हिस्सा एमपी रोड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एमपीआरडीसी) को भी मिला है, तो वह भी संबंधित वाहन मालिकों को लौटाया जाएगा।
मध्यस्थता से तय होगी रिफंड की राशि
अदालत ने कहा कि प्रत्येक वाहन मालिक को लौटाई जाने वाली राशि का निर्धारण आपसी सहमति या आवश्यकता पड़ने पर मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) के जरिए किया जाएगा।
कोर्ट ने उदाहरण देकर समझाया फैसला
अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि जैसे ई-फाइलिंग से अदालत में आवेदन देने का तरीका बदलता है, लेकिन कोर्ट फीस नहीं बदलती, उसी तरह फास्टैग से केवल टोल वसूली का तरीका बदला है, टोल की दर या वाहन की श्रेणी नहीं।
25 हजार रुपए का जुर्माना भी
खंडपीठ ने टोल कंपनी की याचिका पूरी तरह खारिज करते हुए उस पर 25 हजार रुपये की लागत (कॉस्ट) भी लगाई है। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा कराई जाए।
फैसले का व्यापक असर
हाईकोर्ट के इस फैसले को केवल भोपाल-देवास फोरलेन तक सीमित नहीं माना जा रहा। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि फास्टैग या किसी तकनीकी प्रणाली के नाम पर अनुबंध से अलग टोल वसूला नहीं जा सकता। यदि सॉफ्टवेयर की गलती से भी अतिरिक्त राशि कटती है, तो उसकी जिम्मेदारी टोल संचालक की होगी, न कि वाहन मालिक की।
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