यूपी-महाराष्ट्र को पछाड़ देश का 'हिट एंड रन' हॉटस्पॉट बना मध्यप्रदेश
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट...इंदौर
चमचमाती सड़कों और हाईवे के जाल के बीच मध्य प्रदेश के नाम एक ऐसा खौफनाक रिकॉर्ड दर्ज हो गया है, जो राज्य की प्रशासनिक मुस्तैदी और सड़क सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट के चौकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश इस वक्त देश में 'हिट एंड रन' (टक्कर मारकर भागने) के हादसों का सबसे बड़ा गढ़ बन चुका है। बीते 5 सालों में सूबे के भीतर 60 हजार से ज्यादा ऐसे मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें बेकाबू गाड़ियां इंसानी जिंदगी को कुचलकर फुर्र हो गईं।
जब आबादी में बड़े राज्यों को पीछे छोड़ गया मध्य प्रदेश यह आंकड़ा इसलिए रीढ़ में सिहरन पैदा करता है क्योंकि आबादी और वाहनों की कुल संख्या के लिहाज से उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश से कहीं आगे हैं। इसके बावजूद सड़कों पर कत्लेआम के मामले में मध्य प्रदेश नंबर वन पर आ गया है। वर्ष 2024 के अस्थायी आंकड़ों पर नजर डालें तो मध्य प्रदेश 12,453 हादसों के साथ शीर्ष पर काबिज है, जबकि इससे कहीं बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में यह संख्या 11,209 और महाराष्ट्र में महज 6,485 रही। पिछले पांच सालों का ग्राफ देखें तो यह समस्या साल-दर-साल महामारी की तरह बढ़ी है:
वर्ष 2020: 11,550 हादसे
वर्ष 2023: 14,093 हादसे
वर्ष 2024: 12,453 हादसे (अस्थायी आंकड़े)
केंद्र का '4E फॉर्मूला' और 3000 करोड़ का बजट भी बेअसर- हादसों की इस बेलगाम रफ्तार को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने 4E फॉर्मूला (एजुकेशन, रोड इंजीनियरिंग, पुलिस एनफोर्समेंट और इमरजेंसी केयर) लागू किया था। इतना ही नहीं, राज्यों को हाईटेक कैमरों और स्पीड रडार लगाने के लिए 3,000 करोड़ रुपये का भारी-भरकम बजट भी आवंटित किया गया था, लेकिन हकीकत यह है कि मध्य प्रदेश के राष्ट्रीय राजमार्गों और व्यस्त राज्य मार्गों पर गति सीमा (स्पीड लिमिट) को ताक पर रखकर गाड़ियां दौड़ रही हैं और जमीन पर इसकी कोई मॉनिटरिंग नहीं दिखती।
कागजों पर '1.5 महीना', हकीकत में सालों का इंतजार: सरकारी मुआवजे पर सिस्टम की सुस्ती- नियमों के मुताबिक, हिट एंड रन हादसे में किसी की मौत होने पर आश्रित परिवार को 2 लाख रुपये और गंभीर रूप से घायल होने पर 50 हजार रुपये के मुआवजे का प्रावधान है। इस पूरी प्रक्रिया के लिए बाकायदा एक कड़क समय-सीमा (टाइमलाइन) तय की गई है:
दावे के निपटारे का नियम- क्लेम इंक्वायरी ऑफिसर को 1 महीने के भीतर अपनी जांच पूरी करनी होती है। इसके बाद इंश्योरेंस काउंसिल को अगले 15 दिनों के अंदर पीड़ित परिवार के खाते में भुगतान सुनिश्चित करना होता है। यानी कुल 45 दिन।
आखिर क्यों अटक रही है पीड़ितों की सांस?- मदद पहुंचने में हो रही इस अंतहीन देरी के पीछे तीन सबसे बड़े रोड़े हैं-
कागजी औपचारिकताएं- क्लेम फॉर्म के साथ पुलिस की एफआईआर और पोस्टमार्टम रिपोर्ट जैसे अनिवार्य दस्तावेज न होने के कारण शुरुआती स्तर पर ही फाइलें खारिज हो जाती हैं। कई बार पीड़ित परिवार जागरूकता की कमी के कारण देर से आवेदन करते हैं।
बीमा कंपनियों की 'रेड टेपिस्म'- विदिशा का उदाहरण गवाह है कि प्रशासन से हरी झंडी मिलने के बाद भी 55 में से 40 मामलों का भुगतान केवल बीमा कंपनियों की सुस्ती की वजह से अटका पड़ा है।
पुलिस और प्रशासनिक लेत-लतीफी- रायसेन के 88 पेंडिंग मामले यह साफ करते हैं कि पुलिसिया जांच और प्रशासनिक जांच की सुस्त रफ्तार पीड़ित परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रही है।
सड़कें लहूलुहान हैं, आंकड़ों में मध्य प्रदेश देश में अव्वल है, लेकिन अपनों को खो चुके परिवारों के लिए इंसाफ और इमदाद का सफर आज भी उतना ही पथरीला है।
लेकिन जमीनी हकीकत क्या है?
फरवरी 2026 तक के आधिकारिक आंकड़े चीख-चीख कर कह रहे हैं कि यह राहत भी फाइलों के बोझ तले दबी है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में कुल 929 क्लेम दर्ज हुए, जिनमें से सिर्फ 425 परिवारों को ही भुगतान मिल सका, जबकि 504 केस आज भी कतार में हैं।
चार जिलों का कड़वा सच (केस स्टडी)
गुना: योजना की शुरुआत से अब तक 37 मामले सामने आए, जिनमें से सिर्फ 15 को मंजूरी मिली और महज 10 परिवारों तक ही पैसा पहुंच सका।
सीहोर: यहां हालात बदतर हैं। कुल 134 मामलों में से प्रशासन ने मौत के केवल 9 और गंभीर घायलों के महज 8 मामलों को ही मंजूरी के योग्य समझा।
विदिशा: मार्च 2025 से फरवरी 2026 के बीच आए 68 मामलों में से 40 स्वीकृत क्लेम सिर्फ इसलिए लटके हैं क्योंकि बीमा कंपनियां कुंडली मारकर बैठी हैं।
रायसेन: बीते चार साल में 105 केस दर्ज हुए, लेकिन राहत मिली सिर्फ 12 को। यहां की 88 फाइलें तो पुलिस और एसडीएम दफ्तरों के शुरुआती फेर में ही दम तोड़ चुकी हैं।
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