मन की चिट्ठियां: देवताओं के डाकघर- चारधाम के वे पते जहां आज भी पहुंचती हैं
KHULASA FIRST
संवाददाता

कोई सरकारी नौकरी की गुहार लगाता है, कोई संतान का सुख मांगता है, कोई कोर्ट-कचहरी से तंग आकर सीधे ईश्वर से
न्याय की गुहार लगाता है, डिजिटल युग में भी भगवान के नाम लिखे जा रहे हैं हजारों पत्र
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
मोबाइल फोन, ई-मेल,वाट्सएप और सोशल मीडिया के इस अति-आधुनिक दौर में जहां इंसानों द्वारा इंसानों को लिखी जाने वाली चिट्ठियां लगभग इतिहास के पन्नों में दफन हो चुकी हैं, वहीं हिमालय की बर्फीली और पवित्र गोद में बसे कुछ तीर्थस्थल ऐसे भी हैं जहां आज भी लोग बकायदा पेन और कागज उठाकर नियमित रूप से पत्र लिख रहे हैं।
फर्क सिर्फ इतना है कि ये पत्र किसी इंसान, किसी सरकारी दफ्तर या रिश्तेदार के नाम नहीं होते, बल्कि ब्रह्मांड के नियंता स्वयं देवी-देवताओं के नाम लिखे जाते हैं।
चारधाम यात्रा और देवभूमि उत्तराखंड की सदियों पुरानी आस्था परंपराओं में आज भी ऐसे अनेक जागृत स्थान हैं, जहां देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु अपनी गुप्त मनोकामनाएं, प्रशासनिक शिकायतें, अदालती प्रार्थनाएं और अपने जीवन के सबसे निजी दर्द को कागज पर उकेरकर देवताओं को सौंप देते हैं।
इन अनाम पत्रों को छांटने या बांटने वाला कोई सरकारी डाकिया नहीं होता, लेकिन इस परंपरा में अटूट विश्वास रखने वाले मानते हैं कि उनका यह संदेश बिना किसी बाधा के सीधे ईश्वर के दरबार तक अवश्य पहुंचता है।
जब परमेश्वर ही बन जाते हैं घर के मुखिया और सबसे बड़े न्यायाधीश
भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में प्रार्थना केवल संस्कृत के श्लोकों या मंत्रोच्चार तक सीमित नहीं रही है। मनुष्य आदि काल से ही अपने आराध्य के साथ एक जीवंत और सीधा संवाद स्थापित करना चाहता रहा है।
कभी वह मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर रोते हुए मन की बात कहता है, कभी गर्भगृह के सामने मौन साधता है, तो कभी अपनी व्यथा को शब्दों का रूप देकर कागज पर लिख देता है।
उत्तराखंड की अलौकिक लोकसंस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां देवताओं को केवल धूप-दीप जलाकर पूजा नहीं जाता, बल्कि उन्हें अपने परिवार का सबसे वरिष्ठ सदस्य, सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश, अपना सखा, संरक्षक और मार्गदर्शक माना जाता है।
शायद यही कारण है कि यहां देवताओं को पत्र लिखने की यह अद्भुत और भावुक कर देने वाली परंपरा विकसित हुई। इन चिट्ठियों में भाषा की शुद्धता या व्याकरण का ज्ञान नहीं देखा जाता, यहां केवल भावनाओं की सच्चाई और आंखों के आंसू महत्वपूर्ण होते हैं।
न्याय के साथ-साथ दोषियों की शिकायत भी दर्ज कराई जाती है
उत्तरकाशी जिले के जौनसार-रंवाई क्षेत्र की वादियों में स्थित पोखू देवता मंदिर आस्था का एक और ऐसा ही अनूठा केंद्र है, जिसे स्थानीय समाज सदियों से अपना सर्वोच्च शासक मानता आ रहा है।
इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां लोग केवल अपनी सुख-समृद्धि की मन्नत लेकर नहीं आते, बल्कि समाज या व्यवस्था द्वारा सताए जाने पर बकायदा दोषियों के खिलाफ लिखित शिकायत दर्ज कराते हैं।
उत्तराखंड के ग्रामीण समाज में लंबे समय तक यह अटूट विश्वास रहा है कि यदि किसी गरीब या मजलूम व्यक्ति को पुलिस, प्रशासन या पंचायती व्यवस्था में कहीं भी न्याय न मिले, तो वह पोखू देवता के समक्ष अपनी लिखित या मौखिक फरियाद रख सकता है। आज के इस आधुनिक युग में भी यहाँ की यह अदालती डाक लोकविश्वास का एक अद्भुत उदाहरण पेश करती है।
अपनी गुप्त प्रार्थनाएं कागज पर लिखकर लाते हैं लोग
देश के मुख्य चारधामों-बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री के मुख्य मंदिरों में भले ही गोलू देवता की तरह औपचारिक रूप से दीवारों पर पत्र टांगने की कोई परंपरा या व्यवस्था न हो, लेकिन इसके बावजूद हजारों श्रद्धालु अपने साथ अपनी गुप्त प्रार्थनाएं कागज पर लिखकर लाते हैं।
भगवान बदरीविशाल के चरणों में कई श्रद्धालु चुपचाप अपना मनोकामना-पत्र रख देते हैं, जिसे बाद में मंदिर की सफाई के समय सहेज लिया जाता है। वहीं बाबा केदार के भक्त अक्सर कतारों में खड़े होकर अपनी जेब से डायरी का पन्ना निकालते हैं, उस पर अपने पूरे परिवार का नाम और उनकी सुख-समृद्धि की मन्नत लिखते हैं और उसे बाबा के ज्योतिर्लिंग के समीप अर्पित करने का प्रयास करते हैं। कई लोग तो मंदिर के दर्शन के बाद उस कागज को एक बेहद पवित्र और चमत्कारी स्मृति के रूप में वापस अपनी जेब में रखकर घर ले जाते हैं।
यद्यपि इन चिट्ठियों को पढ़ने की इजाजत किसी को नहीं होती और न ही कोई इन्हें हाथ लगाता है, लेकिन मंदिर परिसरों में बैठे श्रद्धालुओं की आपस में होने वाली बातचीत और उनकी सजल आंखों से इन पत्रों के भीतर छिपे मजमून का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है।
किसी फटे हुए साधारण कागज पर कांपते हाथों से लिखा होता है कि हे प्रभु, मेरे बीमार पिता को ठीक कर दो, हमारे पास अस्पताल के पैसे नहीं हैं। किसी चमकीले लिफाफे के भीतर लिखा होता है कि सालों से बेरोजगारी का दंश झेल रहा हूं, इस बार परीक्षा में पास करा देना।
किसी अन्य पत्र में लिखा होता है कि सालों से चल रहा भाइयों का मुकदमा खत्म करा दो, ताकि घर में शांति आ सके। और इन सबके बीच कुछ पत्र ऐसे भी होते हैं जिनमें कोई मांग या शिकायत नहीं होती, बल्कि पूरे पन्ने पर केवल एक ही शब्द बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है-नारायण, आपका कोटि-कोटि धन्यवाद! आस्था का यह उजला पक्ष बताता है कि लोग भगवान को केवल संकट के समय ही याद नहीं करते, बल्कि अपनी खुशियां और आभार भी उनके साथ साझा करना चाहते हैं।
तकनीक के इस युग में क्यों जिंदा है यह परंपरा?
आधुनिक विज्ञान और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि मनुष्य के भीतर भावनाओं का एक बहुत बड़ा गुबार होता है। सुख, दुख, डर और उम्मीद को जब तक व्यक्त न किया जाए, इंसान मानसिक रूप से अस्वस्थ होने लगता है।
जब संसार में उसे कोई ऐसा विश्वसनीय श्रोता नहीं मिलता जो बिना किसी स्वार्थ या बिना उसका मजाक उड़ाए उसकी बात सुन सके, तो उसका अंतिम और सबसे मजबूत विश्वास ईश्वर पर जाकर टिक जाता है।
पत्र लिखना वास्तव में एक तरह का आत्मसंवाद भी है। जब इंसान के मन के भीतर जमा चिंता, आशा और भय शब्दों का रूप लेकर सफेद कागज पर उतरते हैं, तो उसका आधा मानसिक बोझ उसी वक्त हल्का हो जाता है।
यही कारण है कि तकनीक के भयंकर विस्फोट और इंटरनेट की स्पीड के बावजूद देवताओं को पत्र लिखने की यह भावुक परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है जितनी सदियों पहले थी।
इस पूरे आध्यात्मिक तंत्र की सबसे खूबसूरत और दिल को छू लेने वाली बात यही है कि यहाँ न तो कोई पिनकोड काम आता है, न किसी महंगे डाक टिकट की जरूरत होती है और न ही कोई सरकारी डाकिया साइकिल की घंटी बजाते हुए घर आता है। यहाँ केवल एक ही माध्यम काम करता है और वो है विश्वास।
गोलू देवता- न्याय के देवता का वह अनोखा डाकघर, जहां लटकती हैं हजारों अर्जियां...देवताओं को पत्र लिखने की बात हो और कुमाऊं मंडल के सुप्रसिद्ध न्याय देवता चितई गोलू देवता का उल्लेख न हो, यह पूरी तरह से असंभव है।
अल्मोड़ा के निकट स्थित गोलू देवता के मंदिर परिसर में कदम रखते ही देश-दुनिया से आए यात्री हैरान रह जाते हैं। यहाँ मंदिर की दीवारें, खंभे, छत और पीतल की हजारों घंटियां सफेद-पीले कागजों और चिट्ठियों से इस तरह पटी पड़ी हैं, मानो यह किसी अदृश्य न्यायालय का बहुत बड़ा अभिलेखागार हो।
यहां आने वाले लोग केवल मनौती ही नहीं मांगते, बल्कि बकायदा कानूनी रूप से स्टाम्प पेपर पर अपनी याचिकाएं लिखकर मंदिर में टांग देते हैं। कोई अपनी पैतृक जमीन के विवाद का तुरंत समाधान चाहता है, कोई अपने बच्चे के लिए सरकारी नौकरी की कामना करता है, तो कोई सालों-साल से निचली अदालतों में लंबित पड़े मुकदमों के शीघ्र और निष्पक्ष निपटारे के लिए सीधे गोलू देवता की कोर्ट में अपील दायर करता है।
साधारण कोरे कागज पर जहाँ घरेलू कलह या बीमारी से मुक्ति की गुहार होती है, वहीं स्टांप पेपर पर सीधे-सीधे कानूनी न्याय की याचना की जाती है।
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