जानिये दतिया उपचुनाव में कौन प्रत्याशी है चर्चाओं में: समाज की सोच बदलने की लड़ाई के साथ मैदान में; नामांकन के दौरान अपमानजनक टिप्पणी का आरोप
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, दतिया।
मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव में इस बार एक अलग तस्वीर देखने को मिल रही है। भारतीय गण वार्ता पार्टी (भगवा पार्टी) की प्रत्याशी संजना सिंह, जो किन्नर समुदाय से आती हैं, अपने चुनाव प्रचार के अनोखे अंदाज और सामाजिक संदेश के कारण चर्चा में हैं। उनके प्रचार अभियान में छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों से किन्नर समुदाय के लोग शामिल हो रहे हैं। इनमें साध्वी सौम्या दीदी भी हैं, जिन्होंने अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा से पहले उनकी नजर उतारने की परंपरा निभाई थी। संजना सिंह का कहना है कि यह चुनाव केवल विधानसभा पहुंचने का प्रयास नहीं, बल्कि किन्नर समुदाय के प्रति समाज की सोच बदलने की एक मुहिम है।
गांव-गांव जाकर मांग रहीं समर्थन
दतिया विधानसभा के गांवों और कस्बों में संजना सिंह का प्रचार पारंपरिक राजनीतिक रैलियों से अलग दिखाई देता है। उनके साथ बड़ी गाड़ियों का काफिला या भारी भीड़ नहीं होती। उनकी पार्टी का प्रचार वाहन पहले गांव पहुंचकर लोगों को जानकारी देता है। इसके बाद संजना स्वयं घर-घर जाकर लोगों से मुलाकात करती हैं।
प्रचार के दौरान वे बच्चों को दुलारती हैं, उनकी नजर उतारती हैं और महिलाओं के साथ बैठकर मंगल गीत भी गाती हैं। इसके बाद हाथ जोड़कर लोगों से अपील करती हैं कि उन्होंने वर्षों तक भाजपा और कांग्रेस को मौका दिया है, अब एक बार एक किन्नर उम्मीदवार को भी जनप्रतिनिधि बनने का अवसर दें। उनका कहना है कि यदि जनता उन्हें चुनती है तो वह क्षेत्र की समस्याओं को पूरी जिम्मेदारी के साथ उठाएंगी।
साध्वी सौम्या बोलीं ‘दतिया की नजर उतारने आई हूं’
संजना सिंह के समर्थन में प्रचार कर रहीं साध्वी सौम्या दीदी का कहना है कि दतिया धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है और मां पीतांबरा की कृपा इस क्षेत्र पर बनी हुई है। उन्होंने कहा कि किन्नर समुदाय की दुआओं को भी शुभ माना जाता है और वे अपनी साथी संजना के समर्थन में दतिया की "नजर उतारने" आई हैं। उन्होंने मतदाताओं से अपील की कि इस बार पारंपरिक राजनीतिक दलों के अलावा एक नए विकल्प पर भी भरोसा करें।
नामांकन के दौरान अपमानजनक टिप्पणी का आरोप
संजना सिंह ने दावा किया कि नामांकन दाखिल करने के दौरान उन्हें कुछ लोगों की ओर से अपमानजनक टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। उनके अनुसार, इस घटना ने उन्हें और अधिक मजबूती से चुनाव लड़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य यह साबित करना है कि किन्नर समुदाय भी समाज का सम्मानित हिस्सा है और राजनीति जैसी जिम्मेदार भूमिका निभाने में पूरी तरह सक्षम है।
राजनीति में आने का मकसद
राजनीति में आने के पीछे अपनी सोच बताते हुए संजना ने कहा कि किन्नर समुदाय की समस्याओं को वही लोग सबसे बेहतर समझ सकते हैं, जो स्वयं उन परिस्थितियों से गुजरते हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह समुदाय ने धार्मिक और सामाजिक क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाई है, उसी तरह राजनीति में भी उनकी भागीदारी आवश्यक है ताकि नीति निर्माण में उनकी आवाज शामिल हो सके।
दतिया से विशेष जुड़ाव बताया
दतिया को चुनाव लड़ने के लिए चुनने के सवाल पर संजना ने कहा कि मां पीतांबरा की नगरी होने के कारण इस क्षेत्र का आध्यात्मिक महत्व विशेष है। उन्होंने कहा कि किन्नर समुदाय का धर्म और अध्यात्म से गहरा संबंध रहा है, इसलिए उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत इसी स्थान से करने का निर्णय लिया। उन्होंने यह भी कहा कि किन्नर समुदाय किसी एक शहर तक सीमित नहीं है और उनके समुदाय के लोग देशभर में रहते हैं, इसलिए दतिया उनके लिए अपरिचित स्थान नहीं है।
विकास के मुद्दों पर चुनाव
संजना सिंह ने अपने चुनाव प्रचार में स्थानीय समस्याओं को प्रमुखता दी है। उनका कहना है कि दतिया में सफाई व्यवस्था संतोषजनक नहीं है, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सीमित हैं और उद्योगों का विकास नहीं हो पाया है। उन्होंने यह भी कहा कि धार्मिक नगरी होने के बावजूद श्रद्धालुओं और स्थानीय नागरिकों के लिए बुनियादी सुविधाओं का पर्याप्त विकास नहीं हुआ है। उनके अनुसार, विकास के दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर दिखाई देता है।
मुकाबले में 21 उम्मीदवार
दतिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा और कांग्रेस के अलावा कुल 21 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। इनमें विभिन्न क्षेत्रीय दलों के प्रत्याशी और कई निर्दलीय उम्मीदवार भी शामिल हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के चुनाव नहीं लड़ने से छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका इस बार अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है।
शबनम मौसी के बाद प्रतिनिधित्व की चुनौती
मध्य प्रदेश में किन्नर समुदाय का राजनीतिक प्रतिनिधित्व वर्ष 1998 में उस समय चर्चा में आया था, जब शबनम मौसी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विधानसभा पहुंचने वाली देश की पहली किन्नर विधायक बनी थीं। इसके बाद कई किन्नर उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा, लेकिन अब तक कोई भी विधानसभा तक नहीं पहुंच सका। ऐसे में संजना सिंह का चुनाव केवल एक सीट का मुकाबला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे किन्नर समुदाय की राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक स्वीकार्यता के नजरिए से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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