जनशक्ति नगर घोटाला: पांच करोड़ का संपत्तिकर डकारने का खेल; मामला ग्राम सिरपुर स्थित जमीन का
KHULASA FIRST
संवाददाता

राजस्व रिकॉर्ड में शासकीय व अन्य निर्माण दर्ज, फिर भी 2008 से खाली जमीन बताकर जमा किया जाता रहा संपत्तिकर
नगर निगम पर राजस्व लूट का आरोप, शिकायतें दबाने से लेकर सत्ता संरक्षण तक उठे गंभीर सवाल
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
प्रधानमंत्री आवास योजना, सहकारी संस्था, भूखंड आवंटन, व्यावसायिक उपयोग और अब संपत्तिकर चोरी। जनशक्ति नगर से जुड़ा कथित घोटाला लगातार नई परतें खोल रहा है।
अब मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश प्रवक्ता एवं अधिवक्ता प्रमोद कुमार द्विवेदी ने दस्तावेजों के आधार पर आरोप लगाया है कि इंदौर नगर निगम की संपत्तिकर शाखा की मिलीभगत से वर्षों तक करोड़ों रुपए का संपत्तिकर बचाया गया।
यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल कर चोरी का मामला नहीं, बल्कि नगर निगम के राजस्व को सुनियोजित तरीके से नुकसान पहुंचाने का गंभीर प्रकरण माना जाएगा।
खाली भूखंड बताकर करोड़ों का कर बचाने का आरोप... द्विवेदी का आरोप है कि ग्राम सिरपुर स्थित सर्वे क्रमांक 156/1 की 1.8200 हेक्टेयर भूमि पर राजस्व रिकॉर्ड में आज भी शासकीय तोपखाना, मिलिट्री विभाग की संरचनाएं, मकान और अन्य निर्माण दर्ज हैं। इसके बावजूद वर्ष 2008 से नगर निगम में इस संपत्ति का कर खाली भूखंड बताकर जमा किया जाता रहा।
आरोप है कि इस कथित खेल से 5 करोड़ रुपए से अधिक के संपत्तिकर की चोरी हुई, जबकि निगम के नियमों के अनुसार ऐसे मामले में 5 गुना तक दंड लगाया जा सकता है। इस आधार पर लगभग 25 करोड़ रुपए की पेनल्टी बनना बताई जा रही है।
निगम के रिकॉर्ड ही कर रहे खुलासा
द्विवेदी ने दावा किया कि तत्कालीन उपायुक्त आलोक शर्मा ने 9 जनवरी 2020 को जारी पत्र में स्वयं स्वीकार किया था कि भूमि पर मिलिट्री तोपखाना स्थित है और यह प्रस्तावित बगीचे की भूमि है। पत्र में स्पष्ट उल्लेख था कि जब तक वहां मौजूद संरचनाएं हटाई नहीं जातीं, तब तक कॉलोनी निर्माण की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसके बावजूद संपत्तिकर निर्धारण में निर्माणों को नजरअंदाज कर खाली भूखंड का कर लिया गया।
कार्रवाई के बजाय दबा दी शिकायत
द्विवेदी ने आरोप लगाया कि इस पूरे मामले की शिकायत निगम की तत्कालीन अधिकारी लता अग्रवाल को भी दी गई थी, लेकिन उस पर कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। उनका दावा है कि शिकायत को दबा दिया गया।
उन्होंने बताया इस पूरे मामले की शिकायत महापौर परिषद सदस्य निरंजनसिंह चौहान को भी भेजी गई है, ताकि निगम के भीतर कथित राजस्व घोटाले की निष्पक्ष जांच हो सके।
पहले भी सवालों के घेरे में रही पीएम आवास योजना
जनशक्ति नगर का नाम इससे पहले भी प्रधानमंत्री आवास योजना के कथित दुरुपयोग को लेकर सुर्खियों में रहा है। आरोप है कि गरीब और निम्न आय वर्ग के लिए बने ईडब्ल्यूएस फ्लैट और आवासीय प्लॉट खुलेआम किराए पर देकर दुकानों, कार्यालयों, होटल और रेस्टोरेंट के रूप में उपयोग किए जा रहे हैं। इसके बावजूद संबंधित विभागों ने अब तक प्रभावी कार्रवाई नहीं की।
104 से 133 प्लॉट... फर्जीवाड़े की एक और परत- मामले में यह आरोप भी लगाए गए हैं कि वर्ष 2001 में स्वीकृत 104 प्लॉटों की संख्या बढ़ाकर 133 कर दी गई। फर्जी शपथ-पत्र, विवादित रजिस्ट्रियां, नियमों के विपरीत विकास अनुमति और अपात्र लोगों को लाभ पहुंचाने जैसे आरोप पहले से जांच की मांग का विषय बने हुए हैं।
अब निगाह जांच और कार्रवाई पर
मामले में शिकायतकर्ताओं ने स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच, कथित 5 करोड़ से अधिक के संपत्तिकर की वसूली, नियमानुसार लगभग 25 करोड़ रुपए तक की दंडात्मक कार्रवाई तथा पूरे प्रकरण में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है। यदि आरोप प्रमाणित होते हैं, तो यह इंदौर नगर निगम के सबसे बड़े राजस्व घोटालों में से एक साबित होगा।
हाई कोर्ट के आदेश पर भी नहीं हुआ सीमांकन
आरोप है कि 2013 में हाई कोर्ट द्वारा सीमांकन के निर्देश दिए जाने के बावजूद प्रक्रिया को लंबित रखा गया, ताकि खुलासा न हो सके। शिकायतकर्ताओं के मुताबिक नगर एवं ग्राम निवेश विभाग द्वारा स्वीकृत डिमार्केशन प्लान तक उपलब्ध नहीं कराया गया।
यदि निगम के रिकॉर्ड में निर्माण दर्ज थे, तो संपत्तिकर खाली भूखंड के आधार पर कैसे निर्धारित हुआ? अधिकारियों को जानकारी थी, तो वर्षों तक करोड़ों का राजस्व क्यों नहीं वसूला? यदि शिकायतें मिली थीं, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? इन सवालों ने निगम, राजस्व विभाग और अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
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