क्या ‘सागर’ है एक साजिश!: शराब के विष में क्या कोई राजनीतिक सत्ता षड्यंत्र है; पुलिस को आशंका
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मदिरा और राजनीति का आपस में चोली-दामन का संबंध है। अब सरकार भी बिना शराब के चल नहीं सकती। सरकार बनाने की नींव ही चुनावी दारू से बनाई जाती है। देश में कोई भी राजनीतिक दल हो, सत्ता में आने के लिए वह शराब को अपना चुनावी अस्त्र बनाता ही है। सरकार बनाने के बाद उसे चलाने के लिए दारू के गोरखधंधे को खूब पोषित करता है।
पहले चुनाव जीतने और बाद में सरकार के राजस्व के साथ सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार का सागर खड़ा करने का आसान तरीका राजनेताओं और ब्यूरोक्रेसी के लिए शराब ही है। इसीलिए कहा जाता है राजनीति व सत्ता के लिए शराब अमृत का पर्याय बन चुकी है। यह राजनेताओं के लिए मनी पॉवर और मसल पॉवर का स्टेटस सिंबल भी बन गया है।
बीते कुछ दशक की सरकारों में मध्य प्रदेश तो मदिरा का सागर बन चुका है या कहें कि बना दिया गया है। ऐसे में शराब जहर में बदल जाए तो सरकार हिलने भी लगती है इस कारण से। अतीत और वर्तमान राजनीति की गहरी समझ रखने वाले नेताओं का अनुमान कहता है कि सागर के जहरीले शराबकांड में सत्ता की राजनीति भी छिपी हो सकती है।
जिस तरह से प्रदेश में सत्ता का संघर्ष संगठन के भीतर और बाहर दोनों ओर से व साथ में विरोधियों द्वारा गठित तौर पर किया या करवाया जा रहा है, उसके कारण मुख्यमंत्री के लिए बार-बार प्रतिकूल परिस्थिति निर्मित हो रही है, ऐसी चर्चाएं लगातार सुनाई देती हैं।
सागर शराबकांड के मामले में भी अब एक अनुमान राजनीतिक षड्यंत्र का चर्चा में आ रहा है। हालांकि इसका कोई प्रामाणिक आधार अभी तक नहीं आया है, फिर भी जिस तरह के राजनीतिक षड्यंत्रों की चर्चाएं जनचर्चा का विषय बनी हुई हैं, उस आधार पर कहा जाने लगा है कि शराबकांड में जहरीली राजनीति भी हो सकती है।
मुख्यमंत्री को कमजोर करने के लिए विरोधी कुछ भी कर सकते हैं। ऐसे तर्क देने वाले बताते हैं कि जैसे ही मुख्यमंत्री को तत्काल दिल्ली बुलाया गया तो इसे सागर के शराबकांड से जोड़कर प्रचारित किया गया। यहां तक कहा गया कि अब सरकार नहीं बचेगी।
कल से लेकर आज तक इसी तरह की चर्चाएं खूब वायरल कराई जा रही हैं या हो रही हैं। सागर शराबकांड में जिस तरह के तथ्य सामने आए, वे बताते हैं कि शराब में मिलावट सोच-समझकर षड्यंत्रपूर्वक की गई थी।
उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश के सागर जिले में जहरीली शराब से मौतों का मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है। मृतकों में अवैध शराब कारोबार से जुड़ा एक आरोपी भी शामिल है। सागर एसपी अनुराग सुजानिया के मुताबिक जांच में जहरीली शराब में इस्तेमाल स्पिरिट के स्रोत का पता लगाने पर खास जोर है।
पूछताछ में कथित तौर पर सामने आया कि करणी सेना के संभागीय अध्यक्ष चंद्रभान सिंह, उसके सहयोगी मनीष लोधी और रिश्तेदार शिवांजय ने मिलकर अवैध शराब तैयार करने की साजिश रची थी।
जहरीली शराब या सियासी संरक्षण का खेल?
1. सागर के बंडा-शाहगढ़ क्षेत्र में जहरीली शराब से हुई मौतों ने केवल शराब माफिया ही नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र और राजनीतिक संरक्षण पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। नकली शराब का नेटवर्क कई स्तरों पर फैला था और इसकी सप्लाई, पैकेजिंग तथा बिक्री की जांच अब अंतरराज्यीय स्तर तक पहुंच गई है। मामले का सबसे गंभीर पहलू आबकारी विभाग की कथित चूक और आदेशों में बदलाव है।
2. संदिग्ध शराब को लेकर चेतावनियों के बावजूद फील्ड स्तर पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई और विभागीय निर्देशों में भी कथित तौर पर बदलाव हुआ। यही वजह है कि अब सवाल केवल शराब बनाने वालों पर नहीं, बल्कि उन्हें रोकने में नाकाम रहे तंत्र पर भी उठ रहे हैं। दूसरी ओर सागर पुलिस की ओर से सामने आए ललितपुर कनेक्शन को उत्तर प्रदेश के आबकारी अधिकारियों ने खारिज किया है।
3. इसी विरोधाभास ने मामले को और राजनीतिक बना दिया है। कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आरोप लगाया है कि ललितपुर कनेक्शन के नाम पर किसी बड़े नाम या स्थानीय प्रभावशाली नेटवर्क को बचाने की कोशिश हो सकती है।
उन्होंने आबकारी विभाग के परस्पर विरोधी आदेशों पर भी सवाल उठाए हैं। हालांकि ये राजनीतिक आरोप हैं, अभी जांच में सिद्ध तथ्य नहीं। मामले में एक और महत्वपूर्ण कड़ी सामने आई है।
4. ताजा जांच में शराब के नेटवर्क, उसके भंडारण और आरोपियों के प्रभाव की पड़ताल की जा रही है। एक आरोपी के राजनीतिक संपर्कों की चर्चा भी रिपोर्टों में हुई है। प्रशासन ने आरोपियों की अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर कार्रवाई शुरू कर दी है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह केवल शराब माफिया का आपराधिक कारोबार था या इसके पीछे स्थानीय राजनीतिक संरक्षण, आबकारी तंत्र और प्रभावशाली लोगों का कोई गठजोड़ भी था? इसका जवाब जांच ही देगी।
5. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं और अधिकारियों पर कार्रवाई भी की है। इसलिए इस जांच की विश्वसनीयता इस बात से तय होगी कि वह शराब बनाने और बेचने वालों के साथ-साथ संरक्षण देने वाले संभावित राजनीतिक या प्रशासनिक प्रभावशाली लोगों तक भी पहुंचती है या नहीं।
सागर की त्रासदी अब सरकार के सामने केवल अपराधियों को पकड़ने की चुनौती नहीं है, असल परीक्षा उस पूरे सिस्टम की है, जिसने कथित तौर पर इस अवैध कारोबार को पनपने दिया।
बड़ा नेटवर्क तलाशने के लिए न्यायिक जांच शुरू
पुलिस का दावा है कि स्पिरिट को मक्का के खेत में लाकर वहीं शराब तैयार की गई। एसपी के मुताबिक स्पिरिट की व्यवस्था मनीष लोधी ने कथित तौर पर रवि लखेरा के साथ मिलकर की थी। पुलिस ने रवि लखेरा को हिस्ट्रीशीटर और तस्कर बताया है।
अब जांच का सबसे बड़ा सवाल यही है कि स्पिरिट का वास्तविक स्रोत क्या था, इसे किसने उपलब्ध कराया और जहरीली शराब तैयार करने तथा बाजार तक पहुंचाने के पीछे पूरा नेटवर्क कितना बड़ा है।
मामले में पुलिस द्वारा साजिश की जो कड़ी बताई गई, उसकी पुष्टि आगे की जांच और न्यायिक प्रक्रिया में होना बाकी है। मुख्यमंत्री द्वारा न्यायिक जांच के आदेश के बाद अब इस पूरे नेटवर्क के साथ संभावित राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण की भूमिका भी जांच के दायरे में आने की उम्मीद है।
मुख्य आरोपी का शॉर्ट एनकाउंटर, पैर में लगी गोली
बंडा के बहुचर्चित जहरीली शराब कांड के मुख्य आरोपी और गढ़ी मलहरा शराब दुकान के ठेकेदार रवि लखेरा को पुलिस ने मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार कर लिया। बरायठा क्षेत्र के जंगल में घेराबंदी के दौरान आरोपी ने पुलिस टीम पर फायरिंग कर दी।
जवाबी कार्रवाई में उसके पैर में गोली लगी, जिसके बाद पुलिस ने उसे पकड़ लिया। पुलिस के मुताबिक, जहरीली शराब कांड के बाद से रवि लखेरा फरार चल रहा था। उसकी तलाश में लगातार दबिश दी जा रही थी। गुरुवार रात पुलिस को सूचना मिली कि वह बरायठा के जंगल में छिपा हुआ है।
पुलिस टीम ने मौके पर पहुंचकर घेराबंदी की और उसे पकड़ने का प्रयास किया। इसी दौरान आरोपी ने पुलिस पर गोली चला दी। जवाबी फायरिंग में उसके पैर में गोली लगी। घायल आरोपी को शुक्रवार तड़के सागर के बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया, जहां उसका उपचार जारी है। पुलिस ने रवि लखेरा की गिरफ्तारी पर 20 हजार रुपए का इनाम घोषित किया था। जहरीली शराब कांड की जांच आगे बढ़ने के साथ उसका नाम मामले में प्रमुखता से सामने आया था।
बड़ा राजनीतिक सवाल
सागर शराबकांड अब केवल "जहरीली शराब से मौत’ का मामला नहीं रह गया। इसने तीन स्तरों पर सवाल खड़े कर दिए हैं- नकली शराब का अंतरराज्यीय नेटवर्क, स्थानीय लाइसेंसी शराब व्यवस्था में सेंध और आबकारी-पुलिस की निगरानी में उदासीनता या मिलीभगत।
और सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यह है कि अगर नकली शराब की सप्लाई, बिक्री और पैकेजिंग का नेटवर्क इतना संगठित था तो वह प्रशासन की निगरानी से इतने लंबे समय तक कैसे बचा रहा? यही सवाल न्यायिक जांच में सबसे महत्वपूर्ण हो सकता है। यह स्पष्ट है कि बिना राजनीति के इतना बड़ा नेटवर्क काम नहीं कर सकता।
आरोपियों का किसी संगठन से संबंध होने के बावजूद उन्हें इलाके के सत्ताधारी नेताओं का समर्थन या संरक्षण किसी न किसी रूप में होता ही है, जैसा कि आमतौर पर नजर आता है। इसलिए अनुमान लगाने वाले यह भी कह रहे हैं कि सरकार को कमजोर करने वाले राजनेताओं के समर्थक आरोपी लोग हो सकते हैं।
इस कारण षड्यंत्र से इनकार नहीं किया जा सकता। हो सकता है कि साजिश इतने खतरनाक पैमाने की नहीं होकर सरकार को बदनाम करने के लिए हो, इसलिए एक-दूसरे के विरोधी नेता अपने हिसाब से अलग-अलग राजनेताओं के नाम हवा में उछल रहे हैं।
देसी चर्चाओं में एक पुराने मुख्यमंत्री से लेकर सामाजिक जुड़ाव वाली राजनीति का भी हवाला दिया जा रहा है। जो भी हो, शराब अब सरकार और राजनेताओं के लिए कब अमृत से जहर में बदल जाए, कह नहीं सकते।
इसलिए पहले की सरकार की तरह वर्तमान की सरकार को शराब पर बंदिश लगाने के लिए कुछ तो सोचना चाहिए। शराब जहर है। समाज के लिए यह और ज्यादा घातक है। बिना जहर वाली शराब भी देश में समाज और कई परिवारों को खुलकर उजाड़ रही है। शराब के भ्रष्टाचार से घर भरने के लालच पर कहीं तो रोक लगनी चाहिए।
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