कब तक गोपाल की वेणु बजेगी: पंजाब क्यों, नटराजन को एमपी में ही सक्रिय करना था न
KHULASA FIRST
संवाददाता

पसंद की नेता के राजनीतिक हश्र के बाद अब संभल जाएं राहुल गांधी
अपने गिरेबां में झांकें कांग्रेस सुप्रीमो केसी वेणुगोपाल को लेकर पार्टी में जबरदस्त गुस्सा
राज्यसभा चुनाव में पार्टी की शर्मनाक स्थिति के लिए अब ‘भस्मासुर’ की शुरू हुई तलाश
आखिरी उम्मीद भी हुई ध्वस्त, अब हाई कोर्ट का आसरा, तुरंत राहत की दूर तक कोई आस नहीं
नटराजन को कांग्रेस ने ही दे दिया ‘वनवास’, पंजाब प्रभारी की जगह एमपी में देना थी अहम जिम्मेदारी
राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के बड़े नेताओं की भूमिका संदिग्ध, भाजपा से मिलीभगत के संकेत
मीनाक्षी के साथ ही राजनीतिक शिष्टाचार व नेतृत्व के बड़प्पन की भी हुई हार, गलत परिपाटी की नींव डली
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
आखिर कांग्रेस में कब तक ‘गोपाल’ की ‘वेणु’ बजती रहेगी और कब तक पार्टी उनकी धुन पर ‘डोलती’ रहेगी? ये यक्ष प्रश्न कांग्रेस में आलाकमान के ‘आंख-कान-नाक’ बने पार्टी के वरिष्ठ नेता केसी वेणुगोपाल की पार्टी में भूमिका को लेकर खड़ा हुआ है।
निमित्त बना है- मध्य प्रदेश का राज्यसभा चुनाव। इस चुनाव ने निष्ठावान कांग्रेसी के अंतर्मन को झकझोर दिया है। तयशुदा जीत का पराजय में यूं बदल जाना औसत कांग्रेसी स्वीकार नहीं कर पा रहा है।
मीनाक्षी नटराजन को लेकर पार्टी में जो शर्मनाक हालात बने उसका जिम्मेदार अब पार्टी के अंदर ही तलाशना शुरू हो गया है। पार्टी में ये बात जोर-शोर से मुखर है कि अपने ही बड़े नेताओं ने सत्तारूढ़ दल से मिलकर नटराजन की हार की ये पटकथा लिखी है।
पार्टी से ये मांग भी जोर पकड़ रही है कि अपनी पसंद की नेता का हश्र देखने के बाद अब राहुल गांधी को संभल जाना चाहिए। अपने ‘इर्द-गिर्द’ के नेताओं पर अब उन्हें आंख मूंदकर भरोसा छोड़ना होगा अन्यथा कांग्रेस हर मोर्चे पर यूं ही शर्मसार होती रहेगी।
प्रश्नचिह्न तो आलाकमान के उस फैसले पर भी खड़ा हुआ है, जिसमें नटराजन को मध्य प्रदेश में ही अहम जिम्मेदारी के साथ सक्रिय करने के बजाय पंजाब रवाना किया गया। कांग्रेस के जमीनी नेता-कार्यकर्ताओं का कहना है कि नटराजन के पक्ष में राज्य में सहानुभूति थी। उनकी राज्य के दौर के साथ एमपी में ही भूमिका तय करना थी।
राज्यसभा चुनाव में मिली शिकस्त के बाद अब कांग्रेस में ‘अपने ही गिरेबां’ में झांकने की मांग बलवती हो रही है। बोला जा रहा है कि आखिर कब तक हम अपनी पराजय के लिए भाजपा पर दोषारोपण करते रहेंगे?
कमलदल के तो ‘पाप’ हैं ही, लेकिन दूसरे के पाप गिनाने से हमारे स्वयं के ‘पाप’ कम नहीं होंगे। पार्टी में ये गुस्सा चौतरफा फैला हुआ है। फिलहाल सतह पर नजर नहीं आ रहा, लेकिन हर दूसरा कांग्रेसी अब ये ही बोलता नजर आ रहा है कि हमें अपने ही दल के अंदर के भस्मासुर तलाशने होंगे, जो पद-प्रतिष्ठा से लबालब होने के बाद अपने ही दल को खत्म करने पर आमादा हैं।
नटराजन के मसले पर सुप्रीम कोर्ट से मिली हार के बाद इस आक्रोश ने गति पकड़ ली है। पार्टी का प्रदेश नेतृत्व भले ही दिल्ली में विरोधस्वरूप सत्ता के खिलाफ बैरिकेड्स लांघ रहा है, लेकिन जमीन पर कार्यकर्ता अपने ही दल में सुधार की जरूरत महसूस कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट कांग्रेस की आखिरी उम्मीद थी, लेकिन वहां से स्पष्ट कर दिया गया कि ये उसके अधिकार क्षेत्र का मामला नहीं है। इसके लिए हाई कोर्ट की चौखट पर दस्तक दीजिए।
खुलासा फर्स्ट ने कल ही आगाह कर दिया था कि मामला अब अदालती अदावत में उलझ गया है और सर्वविदित है कि कोर्ट में ऐसे मामलों में वक्त कितना लगता है? कोर्ट के निर्णय पर भले ही मल्लिकार्जुन खड़गे से लेकर दिग्विजय सिंह तक सवाल खड़े करें, लेकिन जगहंसाई तो इसी बात की हो रही है कि आखिर कांग्रेस सुधरेगी कब?
नतीजतन अब कांग्रेस से ही सवाल उठने लगे हैं कि आखिर कब तक राज्यों में हरीश चौधरी जैसे नेता ‘सर्वेश्वर’ और केंद्रीय स्तर पर केसी वेणुगोपाल ही ‘पत्थर की लकीर’ बने रहेंगे?
कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को अब ये देखना ही होगा कि नियुक्ति के बाद से राज्य में आखिर प्रदेश प्रभारी की भूमिका क्या रही? क्या वे उस कार्य को अंजाम दे पाए, जिसके लिए मनोनीत हुए थे? पार्टी उनकी सदारत में संवरी या टूटी-बिगड़ी?
अब अगर उन्हें हटा भी दिया जाए तो क्या होना? उन्हें जो करना था, वे एमपी में भी पंजाब की तर्ज पर कर गुजरे। ‘अर्थ’ के जरिये वे सूबे में भी पार्टी का ‘अनर्थ’ कर ही गुजरे।
अब तो राहुल गांधी के संभलने का वक्त है। अन्यथा ऐसी कई मीनाक्षी नटराजन जैसी नेता पार्टी की मेन स्ट्रीम राजनीति से दूर ही रहेंगी।
एमपी में पार्टी के लिए ज्यादा मुफीद रहतीं मीनाक्षी..!
कांग्रेस के एक बड़े वर्ग का मानना है कि ताजा हालातों के बाद मीनाक्षी नटराजन मध्य प्रदेश में पार्टी के लिए ज्यादा मुफीद रहतीं। बजाय उनको राज्य से पंजाब ‘वनवास’ भेजने के।
पार्टी के एक बड़े धड़े का मानना है कि नटराजन के प्रति न सिर्फ राजनीतिक क्षेत्र, बल्कि जनसामान्य में भी सहानुभूति पैदा हुई थी।
उनकी सादगी, ईमानदारी, पार्टी के प्रति निष्ठा, ‘बिगड़ैल मध्य प्रदेश कांग्रेस’ के लिए ज्यादा फायदेमंद थी, बनिस्बत पंजाब के।
सूबे में ही उन्हें अहम जिम्मेदारी देकर राज्य के हर हिस्से में उनके अगर दौरे होते तो वे एक ‘निर्दोष महिला’ चेहरे के साथ पार्टी के लिए ज्यादा असरकारक होतीं और भाजपा के लिए मारक साबित होतीं, क्योंकि ये जनसामान्य भी महसूस कर रहा है कि प्रदेश के राज्यसभा चुनाव में मीनाक्षी नटराजन के साथ-साथ राजनीतिक शिष्टाचार व सत्तारूढ़ नेतृत्व के बड़प्पन की भी हार हुई है और सूबे में एक गलत परिपाटी की नींव डाली गई।
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