हिमाचल का बूढ़ा केदार
KHULASA FIRST
संवाददाता

निर्जला एकादशी पर उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब, मान्यता- बूढ़ा केदार में स्नान के बिना यात्रा अधूरी, यहां देवी-देवता भी करते हैं पवित्र स्नान
खुलासा फर्स्ट, मंडी (सराज) ।
हिमाचल प्रदेश की सराज घाटी में स्थित प्राचीन धार्मिक स्थल बूढ़ा केदार एक बार फिर आस्था का केंद्र बन गया। ज्येष्ठ माह की निर्जला एकादशी पर हजारों श्रद्धालुओं ने यहां पहुंचकर पवित्र जल में स्नान किया और भगवान शिव के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की।
समुद्र तल से ऊंचाई पर स्थित इस पवित्र तीर्थ की सबसे अनोखी विशेषता यह मानी जाती है कि यहां केवल श्रद्धालु ही नहीं, बल्कि सराज घाटी, कुल्लू और मंडी क्षेत्र के स्थानीय देवी-देवताओं की पालकियां भी विशेष अवसरों पर स्नान के लिए पहुंचती हैं।
माता शिकारी देवी की पावन पर्वत श्रृंखला के आंचल में बसे इस तीर्थ का धार्मिक महत्व सदियों पुराना माना जाता है। मंदिर के पुजारी जोत राम शर्मा के अनुसार उत्तराखंड के पंचकेदारों के बाद बूढ़ा केदार का विशेष स्थान माना जाता है।
यहां भगवान शिव प्राकृतिक गुफा में स्वयंभू शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं और यह स्थान प्राचीन काल से तपोभूमि के रूप में श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा है।
महाभारत काल से जुड़ी है पौराणिक मान्यता... स्थानीय परंपराओं के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद पांडव अपने ही स्वजनों के वध से उत्पन्न पाप से मुक्ति की तलाश में भगवान शिव की खोज करते हुए इस क्षेत्र में पहुंचे थे। मान्यता है कि भगवान शिव उनके सामने प्रकट होने के बजाय अंतर्ध्यान हो गए और नंदी ने भी सूक्ष्म रूप धारण कर भूमिगत प्रवेश कर लिया।
इसके बाद पांडवों ने इसी पवित्र जल में स्नान कर भगवान शिव की आराधना की, जिससे उन्हें पापों और दोषों से मुक्ति प्राप्त हुई। यही कारण है कि बूढ़ा केदार को प्रायश्चित और आत्मशुद्धि का महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है।
18 फुट गहरे पवित्र कुएं को लेकर भी है विशेष मान्यता... बूढ़ा केदार परिसर में लगभग 18 फुट गहरा एक प्राचीन कुआं स्थित है, जिसके जल से गौमय जैसी सुगंध आने की मान्यता प्रचलित है। श्रद्धालु इस जल को अत्यंत पवित्र मानते हैं और स्नान के साथ इसका आचमन भी करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस जल में स्नान करने से मनुष्य के पापों का क्षय होता है तथा आध्यात्मिक शुद्धि प्राप्त होती है।
बर्फबारी के बीच भी नहीं टूटती आस्था...यह क्षेत्र अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित होने के कारण नवंबर से अप्रैल तक भारी बर्फबारी से ढका रहता है। मार्ग कठिन होने के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था कम नहीं होती। माघी सहित कई पर्वों पर लोग कई फीट बर्फ के बीच भी यहां स्नान करने पहुंचते हैं।
अप्रैल से नवंबर तक हिमाचल के अलावा पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली से बड़ी संख्या में श्रद्धालु, साधक और शिव-काली उपासक यहां साधना एवं दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
चारधाम यात्रा के बाद यहां स्नान की भी परंपरा... स्थानीय निवासी हिमा राम शास्त्री बताते हैं कि क्षेत्रीय धार्मिक परंपरा के अनुसार चारधाम यात्रा पूरी करने वाले अनेक श्रद्धालु बूढ़ा केदार पहुंचकर स्नान करते हैं।
ऐसी मान्यता है कि इस पवित्र तीर्थ में स्नान करने और इसके बाद माता शिकारी देवी के दर्शन करने से यात्रा पूर्ण मानी जाती है तथा भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। हालांकि यह स्थानीय लोकमान्यता है और इसका कोई सार्वभौमिक धार्मिक विधान या शास्त्रीय अनिवार्यता स्थापित नहीं है।
दशमी और निर्जला एकादशी के अवसर पर यहां आयोजित शाही स्नान का विशेष महत्व माना जाता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु और विभिन्न क्षेत्रों के देवी-देवताओं की पालकियां भी शामिल होती हैं।
ऐसे पहुंच सकते हैं बूढ़ा केदार... बूढ़ा केदार पहुंचने के लिए मंडी से थुनाग और जंजैहली होते हुए कटारू तक सड़क मार्ग उपलब्ध है। कटारू से छोटी गाड़ियों अथवा टैक्सी के माध्यम से रुहाड़ा पहुंचा जा सकता है।
इसके बाद लगभग दो घंटे की पैदल यात्रा कर श्रद्धालु बूढ़ा केदार धाम पहुंचते हैं। तीर्थ क्षेत्र में श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए सराय की व्यवस्था है, जबकि कटारू और आसपास के क्षेत्रों में होटल तथा होम-स्टे भी उपलब्ध हैं।
निर्जला एकादशी पर उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ ने एक बार फिर यह साबित किया कि हिमालय की गोद में बसे यह प्राचीन शिवधाम केवल हिमाचल ही नहीं, बल्कि उत्तर भारत के प्रमुख आस्था केंद्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है।
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